उर्दू किसी भाषा के लिए चुनौती नहीं
फैजान मुस्तफा ने टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा है कि भारत की भाषाई विरासत के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने जो कुछ कहा है वह यह याद दिलाने का अवसर है कि भारत में उर्दू का विकास समन्वयपूर्ण रहा है. उर्दू न किसी भाषा के लिए चुनौती बनी और न ही किसी भाषा ने इसे अपने लिए चुनौती माना. हिन्दी के साथ उर्दू का रिश्ता मजबूत भी रहा है और जटिल भी. दोनों भारत भूमि पर जन्मी, पली, बढ़ी भाषाएं हैं. उर्दू तो मोहब्बत की जुबान रही है. सियासत ने इसे धर्म से जोड़ दिया. वास्तव में भाषा का धर्म से कोई लेना-देना नहीं होता. यह बात हमेशा से कही जाती रही है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इस विषय को गहरा और महत्वपूर्ण बना दिया है.

