विश्व बाजार के उथल-पुथल के केंद्र में अमेरिका
शांग-जिन वेई ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि विश्व भर के देश एक ही प्रकार के झटकों के संगम का सामना कर रहे हैं. अमेरिका की अस्थिर टैरिफ नीति के कारण वैश्विक व्यापार प्रणाली निरंतर टूट रही है. पश्चिम एशिया में सैन्य संघर्षों से व्यापार मार्गों पर असर हुआ है. तेल उत्पादन में व्यवधान का जोखिम भी दुनिया झेल रही है. इसके अलावा डॉलर-आधारित परिसंपत्तियों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं. संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का एक्सपेंडिचर बिल पहले से ही कमजोर अमेरिकी वित्तीय स्थिति को और खराब करने जा रहा है. साथ ही वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का भू-राजनीतिक कारणों से व्यापक पुनर्गठन जारी है.
संयुक्त राज्य अमेरिका ने फिर से पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकलने का फैसला किया है. इस वजह से जलवायु और पर्यावरण से जुड़े खतरे बढ़ गये हैं.
कोलंबिया बिजनेस स्कूल में प्रोफेसर लेखक शांग जिन वेई आगे लिखते हैं कि सीधे शब्दों में, हाल के झटके उस आधार को खतरे में डाल रहे हैं, जिस पर एशियाई और यूरोपीय देशों ने अपने आर्थिक मॉडल बनाए हैं. नियम आधारित खुला व्यापार अनीति का शिकार हो गया है. नीति निर्धारक अमेरिका स्वयं उद्दंड बन गया है.
उदाहरण के लिए, ट्रम्प के भ्रामक रूप से लेबल किए गए "पारस्परिक टैरिफ" स्पष्ट रूप से सबसे पसंदीदा राष्ट्र (MFN) सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं, जो विश्व व्यापार संगठन (WTO) के किसी भी सदस्य को औपचारिक मुक्त-व्यापार समझौते के बिना विभिन्न देशों के लिए अलग-अलग व्यापारिक बाधाएं बनाए रखने से रोकता है. ट्रम्प ने WTO के "बाध्यकारी दरों" से अधिक टैरिफ दरें न बढ़ाने की अमेरिकी प्रतिबद्धता का भी उल्लंघन किया है—जो वैश्विक प्रणाली का एक और आधार है.
इसी तरह, अमेरिका उस डॉलर-केंद्रित प्रणाली को कमजोर कर रहा है, जिस पर एशियाई और यूरोपीय देश लंबे समय से तरलता, व्यापार वित्तपोषण और वित्तीय जोखिम प्रबंधन के लिए निर्भर रहे हैं. अमेरिका की वित्तीय स्थिति में अपेक्षित गिरावट, ट्रम्प की मनमानी टैरिफ नीति के साथ मिलकर, डॉलर की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा कर रही है.
फिलीस्तीन पर अवसरवाद
मनोज झा ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि शायद कोई भी छवि इतनी हृदयविदारक नहीं है जितनी कि फिलस्तीनी बच्चों की है. ये बच्चे भारत की पीढ़ियों को पोषित करने वाले पारले जी बिस्कुट के लिए तरस रहे हैं. गाजा की मलबे से भरी सड़कों पर ये सबसे सस्ते भारतीय बिस्कुट अब कीमती वस्तुएं बन गए हैं. ये बिस्कुट उन माता-पिता की पहुंच से बाहर हैं जो अपने बच्चों के लिए बुनियादी भोजन भी मुहैया कराने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
यह दर्दनाक वास्तविकता हमारी साझा मानवता और हर जगह बच्चों की रक्षा करने के हमारे कर्तव्य की एक कठोर याद दिलाती है. यदि किसी को बंदूक और बच्चों के बीच चुनना हो, तो हमेशा बच्चों को चुनना होगा. चाहे वह किसी की भी बंदूक हो, चाहे वह किसी के भी बच्चे हों. फिर भी, 12 जून को इजरायल-हमास संघर्ष के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र की युद्धविराम प्रस्ताव पर भारत का तटस्थ रहना फिलस्तीनी मुद्दे के प्रति हमारी ऐतिहासिक एकजुटता के साथ विश्वासघात को दर्शाता है.
मनोज झा लिखते हैं समकालीन भारत की विदेश नीति सैद्धांतिक के बजाय अवसरवादी हो गई है. यह हमारी मूलभूत नैतिक परंपरा में नाटकीय बदलाव को दर्शाती है. यह लेन-देन आधारित दृष्टिकोण, हाल के दो फलस्तीन-संबंधी प्रस्तावों पर हमारे तटस्थ रुख में स्पष्ट है.
पूर्व प्रकाशित लेख के हवाले से लेखक अपनी बात जारी रखते हैं कि यह एक ऐसी सरकार के कार्यों को दर्शाता है जो मानती है कि "चुनावी बहुमत इतिहास सहित किसी भी चीज को रौंदने का लाइसेंस है." इजरायल के साथ करीबी संबंधों के माध्यम से कथित रणनीतिक लाभों का पीछा करते हुए, भारत न तो वह अवसर हासिल कर सका है जो वह चाहता था और न ही अपनी नैतिक नेतृत्व की स्थिति को बनाए रख सका. यह विडंबना काफी स्पष्ट है. यह समझ से परे रुख हमें महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर कूटनीतिक रूप से अलग-थलग कर चुका है, जो उस "वसुधैव कुटुंबकम" दर्शन के विपरीत है जिसे हम कथित रूप से अपनाते हैं.
मोदी ने इंदिरा को पीछे छोड़ा
रामचंद्र गुहा ने टेलीग्राफ में इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी का तुलनात्मक विश्लेषण पेश किया है. उन्होंने इन दो प्रधानमंत्रियों के बीच पांच उल्लेखनीय समानताएं बतलाई हैं. सबसे पहले, मोदी ने, इंदिरा की तरह, अपनी राजनीतिक सत्ता का उपयोग एक विशाल व्यक्तित्व पूजा (पर्सनैलिटी कल्ट) बनाने के लिए किया है, खुद को पार्टी, सरकार, राज्य और राष्ट्र का एकमात्र प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हुए. यह पूजा सार्वजनिक खजाने से पोषित होती है और उनके आसपास के चाटुकारों द्वारा और चमकाई जाती है.
दूसरे, इंदिरा की तरह, मोदी ने उन संस्थानों को कमजोर करने के लिए कठिन परिश्रम किया है जिनकी स्वतंत्रता लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली के लिए महत्वपूर्ण है. यह इंदिरा ही थीं जिन्होंने पहली बार "प्रतिबद्ध नौकरशाही" और "प्रतिबद्ध न्यायपालिका" की बात की थी, एक विचार जिसे मोदी ने अपना लिया है. हालांकि, इंदिरा के विपरीत, मोदी ने औपचारिक आपातकाल घोषित नहीं किया है, लेकिन उन्होंने संवैधानिक लोकतंत्र की प्रक्रियाओं के प्रति समान अवहेलना दिखाई है.
इंदिरा ने प्रेस को डराकर सच्चाई को दबाने के लिए मजबूर किया; मोदी इसे झूठ बोलने के लिए बाध्य करते हैं. नौकरशाही 1970 के दशक की तुलना में अब और भी कम स्वतंत्र है; जांच एजेंसियों का उपयोग राजनीतिक विरोधियों को चुप कराने के लिए और भी अधिक बार किया जाता है.
रामचंद्र गुहा तीसरी समानता बताते हैं कि मोदी ने इंदिरा की तरह एकतरफा निर्णय लेने का तरीका अपनाया है जो संविधान की भावना का उल्लंघन करता है. इंदिरा के शासन के दौरान केवल एक व्यक्ति था जिसकी सलाह को वे गंभीरता से लेती थीं; पहले यह पी.एन. हक्सर थे, फिर संजय गांधी. मोदी के साथ भी यही है; यह केवल अमित शाह हैं, जिन पर वे भरोसा करते हैं.
चौथी समानता है कि इंदिरा की तरह मोदी ने भारतीय संघवाद को कमजोर करने की कोशिश की है. जहां इंदिरा ने गैर-कांग्रेसी दलों द्वारा संचालित राज्य सरकारों को बर्खास्त करने के लिए अनुच्छेद 356 का उपयोग किया, वहीं मोदी ने तकनीकी रूप से गैर-पक्षपातपूर्ण गवर्नर के कार्यालय को हथियार बनाकर निर्वाचित सरकारों को कमजोर किया है. मोदी और शाह के नेतृत्व में बीजेपी ने अपनी कुख्यात 'वॉशिंग मशीन' का उपयोग विपक्षी दलों को तोड़ने और जनादेश का उल्लंघन करते हुए बीजेपी की राज्य सरकारें स्थापित करने के लिए किया है.
पांचवें, इंदिरा की तरह, मोदी ने अपने शासन को मजबूत करने के लिए अतिराष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया है. लेखक का मानना है कि मोदी के शासनकाल में धार्मिक कट्टरता का जहर दूर, गहरा और व्यापक रूप से फैल गया है. यह कट्टरता रोजमर्रा के जीवन में, वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों (जिनमें गृह मंत्री और कभी-कभी प्रधानमंत्री शामिल हैं) और बीजेपी के मुख्यमंत्रियों (विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और असम के) के भाषण और आचरण में तेजी से प्रकट हो रही है.
इजराइल-ईरान युद्ध विराम के आगे खत्म नहीं हुआ है खतरा
महेश सचदेव ने द हिन्दू में लिखा है कि संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा घोषित इजरायल-ईरान शत्रुता की समाप्ति, उस भयावह नाटक के समापन का मंच तैयार करती है जो 7 अक्टूबर, 2023 को हमास द्वारा अपने ऑपरेशन तूफान अल-अक्सा शुरू करने के साथ शुरू हुआ था. युद्ध की धुंध और एक-दूसरे को पछाड़ने की होड़ के कारण तात्कालिक परिदृश्य अस्पष्ट है, लेकिन यदि कोरियोग्राफरों ने उचित सावधानी नहीं बरती, तो समापन निश्चित रूप से उतना ही विघटनकारी होगा जितना कि मुख्य कृत्य रहा है.
पिछले 21 महीनों में, अमेरिका के समर्थन से इजरायल रक्षा बलों (IDF) ने शानदार, हालांकि महंगी सैन्य जीतों का एक सेट हासिल किया है. गाजा में, IDF ने हमास को तबाह कर दिया है, भले ही कुछ इजरायली बंधक अभी भी हमास की कैद में हैं.
महेश सचदेव लिखते हैं कि लेबनान के हिजबुल्लाह को पंगु बना दिया गया है जिसके बारे में माना जाता है कि वह एक लाख मिसाइलों के साथ दुनिया का सबसे दुर्जेय नॉन स्टेट एक्टर बना हुआ है. हिजबुल्लाह का नेतृत्व अव्यवस्था में है और इसका शस्त्रागार खत्म हो चुका है. सीरिया का अल-असद शासन, जो 54 वर्षों से इजरायल का कट्टर विरोधी था, उसकी जगह एक कमजोर इस्लामवादी सरकार ने ले ली है जो इजरायल के लिए कोई खतरा नहीं है.
यमन के अल-हौथी ने समुद्री यातायात को बाधित करने और इजरायल पर मिसाइलें दागने में सफलता हासिल की, लेकिन IDF और अमेरिकी सैन्य जवाबों के असमान्य प्रतिक्रियाओं ने उन्हें दबा दिया है. अंत में, 12 दिनों की उच्च-तीव्रता वाली हवाई झड़पों के बाद इजरायल और अमेरिका ने दावा किया कि उन्होंने उस परमाणु विकल्प को "नष्ट" कर दिया है, जिसे ईरान ने दो दशकों से अधिक समय तक जिद्दी तौर पर आगे बढ़ाया था.
तेहरान को अपनी मिसाइल शक्ति के रणनीतिक नुकसान और इसके शीर्ष सैन्य कर्मियों और परमाणु वैज्ञानिकों की लक्षित हत्याओं का भी सामना करना पड़ा है. अपनी सैन्य रणनीतियों को एकनिष्ठता से आगे बढ़ाते हुए, इजरायल की अति-दक्षिणपंथी सरकार ने घरेलू विरोध को कुचल दिया है और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में इसे कानूनी कटघरे में खड़ा करने की कोशिशों को दरकिनार कर दिया है.
सोच नैशनल व्यवहार लोकल
गीता रविचंद्रन ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि कई साल पहले, आईटी बूम के शुरुआती वर्षों में उन्होंने बेंगलुरु के एक मेडिकल स्टोर पर एक साइनेज देखा था. इसमें कन्नड़ बोलने वालों को 1 प्रतिशत की छूट की पेशकश की गई थी. यह एक छोटा सा प्रोत्साहन लगा, जिसका उद्देश्य उस शहर की भाषा सीखने के लिए था. तब से भाषाई विभाजन के दोनों पक्षों की आवाजें और अधिक तीखी और समझौता न करने वाली हो गई हैं.
यह निर्विवाद है कि देश भर में नौकरी की तलाश में स्थानांतरित होने वाले लोग उस राज्य की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं, जहां वे जाते हैं. देश भर के प्रवासी आबादी में अकुशल और उच्च योग्यता प्राप्त दोनों तरह के कर्मचारी शामिल हैं. इस परिवेश में, प्रचारित भाषा विवादों में अक्सर शिक्षित कर्मचारी स्थानीय लोगों के खिलाफ होते हैं, जो बुनियादी सेवाएं प्रदान करते हैं. हिंसा की घटनाएं और स्थानीय लोगों के लिए नौकरी आरक्षण की मांग इसके परिणाम हैं. यह भी सच है कि कुछ मुखर लोगों के लिए, जो नई भाषा सीखने से इनकार करते हैं, कई पेशेवर, छात्र और गृहिणियां उस क्षेत्र की भाषा में निपुणता हासिल कर लेते हैं, जहां वे काम करते हैं और रहते हैं. अंततः, स्थानीय भाषा का उपयोग करने की इच्छा व्यवसाय को आसान बनाती है.
गीता आगे लिखती हैं कि वास्तव में, भाषा द्वारा बनाई जा सकने वाली बाधा को दूर करने के लिए प्रभावी समाधान मौजूद हैं. कई नियोक्ता बाहर से आए लोगों के लिए भाषा सीखने के अवसर प्रदान करते हैं. बुनियादी संवादी कौशल सामाजिक लेन-देन को सुगम बना सकते हैं और इन्हें अनौपचारिक सेटिंग्स में सीखा जा सकता है. तत्काल अनुवाद सेवाएं प्रदान करने वाले तकनीकी उपकरण एक आइकन के क्लिक पर उपलब्ध हैं. भाषाएं अंतःक्रियाओं और नवाचारों के माध्यम से विकसित होती हैं.
हम अब जेन अल्फा द्वारा अंग्रेजी के नए उपयोगों और संशोधनों के साक्षी हैं, जो पुरानी पीढ़ी के लिए बकवास जैसा लगता है. यह एक अनुस्मारक है कि जिस भाषा पर हम आज गर्व करते हैं, वह भविष्य में कुछ अपरिचित में बदल सकती है. प्रत्येक भाषा की अपनी वीरतापूर्ण कहानियां, इसके गीत और भजन हैं, जो पीढ़ियों से चले आ रहे हैं. शायद यही एक कारण है कि भाषा एक भावनात्मक मुद्दा बन जाती है. भाषाई संघर्ष और मतभेद की कहानियां सोशल मीडिया के कारण चर्चा में आती हैं. हालांकि, कई सकारात्मक कहानियां सार्वजनिक डोमेन तक नहीं पहुंचतीं. ये उन लोगों की कहानियां हैं जो बाहर से आए हैं और उस स्थान की साहित्यिक और सांस्कृतिक विकास में योगदान देते हैं, जिसे उन्होंने अपना घर बनाया है.
