नेतन्याहू को रोक नहीं सके ‘कमजोर’ बाइडन और ‘मजबूत’ ट्रंप
आकाश जोशी ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि एक हफ्ते पहले तक जब इजराइल ने ईरान की परमाणु सुविधाओं पर हमला नहीं किया था, स्थिति भिन्न थी. मई में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की क्षेत्रीय यात्रा में इजराइल की यात्रा शामिल नहीं थी. उन्होंने कतर से उपहार के तौर पर 400 मिलियन डॉलर का बोइंग 747 प्राप्त किया और इस पर खुशी जताई. वे सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की तारीफ कर रहे थे. उन्होंने सीरिया का दौरा किया और सीरियाई राष्ट्रपति अहमद अल शर्रा (जो कभी अमेरिका द्वारा प्रतिबंधित व्यक्ति थे) की प्रशंसा की और अब्राहम एकॉर्ड के विस्तार के लिए समर्थन मांगा.
जून में अमेरिकी विदेश संबंध समिति ने कथित तौर पर सीरिया को प्रतिबंधित राष्ट्रों या दुष्ट राज्यों की सूची से हटा दिया. यह सब तेहरान के साथ एक नये परमाणु समझौते पर चल रही बातचीत के अलावा था, जो परमाणु अप्रसार और ईरान की नागरिक परमाणु जरूरतों के बीच संतुलन बनाता.
आकाश जोशी लिखते हैं कि मध्य पूर्व में शांति के मायावी लक्ष्य की दिशा मे बढ़कर ट्रंप अमेरिका को फिर से महान बनाते दिख सकते थे. अब स्थिति बदल गयी है. बेंजामिन नेतन्याहू की कार्रवाइयों का बिना शर्त समर्थन कर अमेरिका न केवल पश्चिमी एशिया को नुकसान पहुंचा रहा है बल्कि यह स्वयं अमेरिका को भी विदेश और घरेलू स्तर पर कमजोर कर रहा है और उसे हानि पहुंचा रहा है.
7 अक्टूबर 2023 को हमास के आतंकवादी हमले के लिए इजराइल की प्रतिक्रिया ने अब तक 55 हजार फिलीस्तीनी जानें ली हैं. नागरिकों का दुख, भुखमरी की कगार पर होना, बच्चों की हत्या और सहायता रोकना दुनिया ने देखा है. अमेरिकी विश्वविद्यालयों के छात्रों और शिक्षकों ने इन अत्याचारों का विरोध किया है और अपनी ही सरकार की इस बात के लिए आलोचना की है कि वह इन सब गलत के साथ खड़ी रही है. ‘कमजोर’ बाइडन और ‘मजबूत’ ट्रंप दोनों तरह के नेता इजराइल और नेतन्याहू को नियंत्रित करने में असमर्थ प्रतीत होते हैं.
अहमदाबाद विमान हादसे के बाद उठे बड़े सवाल
अमित सिंह ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा है कि एअर इंडिया फ्लाइट एआई-171 की त्रासदी ने भारत के एविएशन सेफ्टी फ्रेमवर्क से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को उजागर किया है. फौरी तौर पर कुछ अवलोकन ध्यान देने योग्य हैं.
इनमें शामिल हैं टेक ऑफ के दौरान धूल के गुब्बार का वीडियो एविडेंस, इकलौते जीवित व्यक्ति का तेज धमाके की बात कहना और लैंडिंग गियर एक्सटेंडेड मोड में रहना. इससे पता चलता है कि चालक दल पर अत्यधिक दबाव रहा होगा.
तनाव के दौरान प्रक्रियात्मक चूक संभव है. इसका मतलब यह है कि क्रू रिसोर्स मैनेजमेंट और परिदृश्य आधारित प्रशिक्षण को बेहतर करने की आवश्यकता है. 2020 के बाद किसी घातक दुर्घटना नहीं होने के दावे के बीच ताजा विमान दुर्घटना बड़े सवाल उठाते हैं.
अमित सिंह लिखते हैं कि हालांकि भारत अपने स्टेट सेफ्टी प्रोग्राम के स्तर पर 4 कार्यान्वयन का दावा करता है, इसका एसएसपी फाउंडेशन मूल्य अभी भी अप्रकाशित है. कोझिकोड दुर्घटना के बाद पारदर्शी बहस या सुधार की कमी क साथ यह अंतर यह सुझाव देता है कि जोखिम की पहचान और शमन के तंत्र अपेक्षित रूप से कार्य नहीं कर सकते. भारत विमानन क्षेत्र में निरंतर वृद्धि को खुलेपन जवाबदेही और सीखने पर आधारित एक मजबूत सुरक्षा संस्कृति के साथ मेल खाना चाहिए. केवल सकारात्मक संकेतकों पर ध्यान देना या चयनात्मक रिपोर्टिंग झूठी सुरक्षा की भावना को बढ़ावा देने का जोखिम उठाती है.
विमानन सुरक्षा बुनियादी ढांचे और प्रमाणन से परे है. यह सिस्टम और लोगों की उस स्थिति में प्रतिक्रिया देने की तत्परता के बारे में है जब चीजें योजना के अनुसार नहीं होतीं. एअरलाइंस और नियामकों के लिए यह क्रू रिसोर्स मैनेजमेंट प्रोटोकॉल, सिनैरियो बेस्ड ट्रेनिंग (परिदृश्य आधारित प्रशिक्षण) और पोस्ट इंसिडेंट लर्निंग फ्रेमवर्क की समीक्षा करने का अवसर है.
असफलताओं की भी जिम्मेदारी लें मोदी
पी चिदंबरम ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि नरेंद्र मोदी ने हाल ही में प्रधानमंत्री के रूप में अपने 11 साल पूरे किए हें. वे देश के तीसरे सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले प्रधानमंत्री बन गये हैं. यह उनकी दृढ़ता और अपनी पार्टी के लिए चुनाव जीतने की क्षमता का प्रमाण है. हर सरकार में अच्छाइयां व खामियां होती है और राजग सरकार भी इसका अपवाद नहीं है. यूपीए के दस साल में औसत जीडीपी वृद्धि दर 7.46 फीसदी (पुरानी सीरीज़) और 6.7 फीसद (नयी सीरीज़) रही थी. वर्ष 2014-15 के बाद से वास्तविक जीडीपी की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर 6.1 फीसदी रही और 2019-20 के बाद वह घटकर 5.1 फीसद हो गयी. यूपीए सरकार में प्रति व्यक्ति आय 10 साल में 2.64 गुणा हो गयी. वहीं एनडीए सरकार में यह 10 सालों में केवल 1.89 गुणा बढ़ी.
चिदंबरम लिखते हैं कि पहलगाम में हुए आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की कमजोरियां उजागर हुईं. न तो भारत ने अपने पड़ोसी देशों में प्रतिनिधिमंडल भेजा, न ही इन देशों ने सार्वजनिक रूप से कोई बयान दिया. कई देशों ने आतंकी हमले की निन्दा की लेकिन किसी ने पाकिस्तान को आतंक का प्रायोजक नहीं कहा. पारंपरिक युद्ध में पाकिस्तान पर भारत की बढ़त पर भी संदेह पैदा हुआ है.
अमेरिका ने क्वाड और आधारभूत समझौतों के बावजूद भारतीय उत्पादों पर शुल्क लगाए और भारत-पाकिस्तान को एक ही श्रेणी में रख दिया. आईएमएफ के कार्यकारी बोर्ड और विश्व बैंक के निदेशक मंडल के 25 सदस्यों में से एक भारत के होने के बावजूद दोनों निकायों ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान को बड़े ऋण की मंजूरी दी. भारत ने पाकिस्तान से चार दिवसीय संघर्ष मुख्य रूप से फ्रांस, रूस और इजराइली सैन्य साजो सामान से लड़ा. देश की सारी शक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों में केंद्रित है. सरकार की उपलब्धियों का श्रेय उन्हें दिया जा सकता है तो असफलताओं की जिम्मेदारी भी उन्हें ही लेनी चाहिए.
सोनम के लिए अरेंज मैरेज को ‘ना’ कहना मुश्किल था!
नमिता भंडारे ने हिन्दुस्तान टाइम्स में हनीमून हत्याकांड को स्त्रीवादी नजरिए से देखने की कोशिश की है. 2018 में हुए एक सर्वे के हवाले से उन्होंने लिखा है कि 93 फीसद भारतीय आज भी अरेंज्ड मैरेज को चुनते हैं. केवल 3 प्रतिशत ही प्रेम विवाह करते हैं. 80 साल की उम्र के जीवित लोगों में 94 फीसदी ने अरेंज्ड मैरेज की थी. 1920 के दशक में यह फीसद 90 ही था. इसका मतलब यह है कि आज के युवा भी सवा सौ साल पहले वाली व्यवस्थित शादी के पैटर्न को फॉलो कर रहे हैं.
सोनम की पसंद एक ऐसा पुरुष था जो न केवल उससे तीन साल छोटा था बल्कि वह निम्न जाति का भी था. उससे शादी करना परिवार और वंश के लिए अपमान माना जाता. इसके अलावा लेखिका ने लिखा है कि हमें बताया गया कि वह उसके पिता के व्यवसाय में कर्मचारी था. इसलिए वर्ग का अंतर भी था. चार महीना पहले सोनम ने अरेंज्ड मैरेज के लिए राजा से मुलाकात की थी. सवाल यह है कि सोनम ने अरेंज्ड मैरेज के लिए ‘हां’ क्यों कहा?
नमिता भंडारे लिखती हैं कि 2021 में सम्मान के नाम पर 33 हत्याएं दर्ज की गई थीं. ऐसे में महिलाओं को शादी के लिए ‘ना’ कहने की स्वतंत्रता मायने रखती है. एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि जब दुनिया में हर दिन 140 महिलाएं और लड़कियां अपने अंतरंग साथियों द्वारा मार दी जाती हैं तो ऐसी घटनाएं अब समाचार नहीं रहीं. जब भूमिकाएं उलट जाती हैं तो यह एक विसंगति बन जाती है और पितृसत्ता यह सवाल पूछकर जवाब देती है- क्या महिलाएं बहुत आगे बढ़ रही हैं?
जांच अभी पूरी होने से बहुत दूर है लेकिन भीड़ पहले से ही सोनम का सिर मांग रही है- और इसमें उसका भाई भी शामिल है जिसने उसे 100 फीसद दोषी घोषित कर दिया है. “मैं सुनिश्चित करूंगा कि उसे सजा मिले” उसने कथित तौर पर राजा के परिवार से कहा. यह आश्चर्यजनक नहीं होना चाहिए कि सोनम के जीवन में पुरुष उस पर नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं.
इमर्जेंसी के दौरान नहीं भुलाए जा सकने वाले पल
रामचंद्र गुहा ने टेलीग्राफ में आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ को अपने छात्र जीवन से जोड़ा है जब वे दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज में पढ़ते थे. गर्मी छुट्टी के दौरान देश में इमर्जेंसी लगी थी. तब वे स्नातक के पहले वर्ष में थे. जुलाई के तीसरे सप्ताह में जब वे विश्वविद्यालय परिसर लौटे तो लेखक इस बारे में ज्यादा नहीं सोच पा रहे थे कि इंदिरा गांधी द्वारा अपने विरोधियों को जेल में डालने का उनके देश के वर्तमान या भविष्य से क्या लेना-देना है?
इसका कारण लेखक बताते हैं कि सत्रह साल की उम्र में उनका ध्यान मुख्य रूप से इस बात पर था कि भारतीय क्रिकेट टीम में स्थान पक्का कैसे किया जाए. सेंट स्टीफेंस में लेखक के दोस्त भी पूरी तरह राजनीतिक थे. राजनीति के प्रति यह उदासीनता कॉलेज प्रशासन द्वारा सक्रिय रूप से प्रोत्साहित की जाती है. दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के पदों के लिए चुनाव बहुत जोर-शोर से लड़े जाते हैं. लेकिन, स्टीफनियनों को वोट देने की अनुमति नहीं दी जाती है.
रामचंद्र गुहा लिखते है कि जुलाई 1975 में गर्मी की छुट्टियों के बाद जब लेखक कॉलेज लौटे तो उन्होंने पाया कि यह पूरी तरह से अपरिवर्तित था. विपक्षी नेताओं की नजरबंदी और प्रेस की सेंसेरशिप ने हमें जरा भी प्रभावित नहीं किया. हम पहले की तरह हंसते, बात करते और खेलते थे. 1975 की दूसरी छमाही में लेखक का ध्यान ऑफ ब्रेक गेंदबाजी के साथ लेग कटर विकसित करने की ओर था. 1975-76 की सर्दियों का एक दिन हमें यह अहसास कराती है कि हम सभी कितने गैर राजनीतिक थे. एक पूर्व छात्र राज्य टेलीविजन द्वारा कमीशन किए गये एक वृत्त चित्र फिल्म के लिए कॉलेज आया था. एक छात्र सीनियर कॉमन रूम की सीढ़ियों पर गिटार बजा रहा था. यह पूरा वृत्त चित्र ‘कैंपस में शांति और सौहार्द’ पर केंद्रित था.
लेखक ने संजय गांधी के बढ़ते प्रभाव का भी जिक्र किया. आपातकाल के दौरान कई घटनाओं ने राजनीतिक जीवन को तनिक भी जागृत नहीं किया. लेखक ने याद दिलाया है कि पोर्ट ऑफ स्पेन में भारतीयों की जीत के बाद एआईआर के कमेंटेटर ने जब यह कहा कि “ये इंदिरा का देश है. यह उनके बीस सूत्री कार्यक्रम का देश है!” तब लेखक को यह बात बहुत आपत्ति जनक लगी थी.
लेखक ने जवाहरलाल नेहरू की बहन विजया लक्ष्मी पंडित के सड़क पर उतरने और इंदिरा की तानाशाही के खिलाफ नारे लगाने की याद दिलाई है. मोरिस चौक की उस सभा ने क्रिकेट और सेंट स्टीफंस के बाहर की दुनिया में लेखक की रुचि को जगा डाला. संजय गांधी की अमेठी और इंदिरा गांधी की रायबरेली से हार ने सबको चौंका दिया था!
