गाजा की तबाही पर चुप्पी
इंडियन एक्सप्रेस में प्रताप भानु मेहता ने लिखा है कि गाजा में पनप रही नैतिक तबाही पर चुप्पी उसकी भयावहता के अनुपात में बढ़ रही है. मानवता नैतिक पतन की ओर बढ़ रही है. अंतरराष्ट्रीय कानून की नाजुक उपलब्धियां, जो ऐसी क्रूरता को अस्वीकार्य मानती थीं, खत्म हो रही हैं. गाजा में हो रहे अत्याचारों को अधिक स्वीकार किया जा रहा है, और इसे कानूनी-नैतिक रूप से परिभाषित करने की बहस तेज है, पर यह और अदृश्य हो रहा है. कोई भी युद्धविराम अब देर से होगा. विश्व तबाही के बाद “शांति” का दावा करेगा. गाजा पर चुप्पी गहरे विश्लेषण की मांग करती है.
ब्रूस रॉबिन्स के तर्कों के हवाले से मेहता लिखते हैं कि अत्याचारों पर नैतिक आक्रोश ऐतिहासिक रूप से दुर्लभ है. हिंसा को पहले मौसम की तरह सामान्य माना जाता था. स्लॉटरहाउस-फाइव में कहा गया, “ऐसा ही होता है.” समूह पहचान नैतिक मांगों को दबाती है; निंदा भी सीमित होती है ताकि ढांचे न हिलें. नैतिक चिंता अब रोग मानी जाती है, और अत्याचारों की बात करने वाले को श्रेष्ठता प्रदर्शन करने वाला ठहराया जाता है.
गाजा की स्थिति अभूतपूर्व है. राज्य न केवल अत्याचारों को नकारते हैं, बल्कि चुप्पी की अपेक्षा करते हैं. अमेरिका गाजा पर बोलने की वैश्विक निगरानी करता है. भारत में इजरायल की आलोचना “गलत पक्ष” से जोड़ी जाती है. पश्चिम एशिया में आलोचना पर रोक है. यूरोप ने इजरायल को “राज्य का कारण” बना लिया. होलोकॉस्ट का सबक—“फिर कभी नहीं”—भुलाया जा रहा है. यहूदी-विरोधी भावना का राजनीतिक दुरुपयोग आलोचना को दबाने में हो रहा है. पश्चिमी लोकतंत्र अपनी स्वतंत्रताएं इजरायल की नीतियों के लिए कुर्बान कर रहे हैं. सामाजिक आंदोलन भी सार्वभौमिक सिद्धांत व्यक्त नहीं कर पा रहे. गाजा पर चुप्पी यह कहती है- केवल ताकत राज करती है.
मणिपुर में नाजुक शांति, सुधार की जरूरत
द हिन्दू ने अपने संपादकीय में लिखा है कि राष्ट्रपति शासन, जो कभी केंद्र का राजनीतिक हथियार था, 1990 के दशक के बाद कम हुआ है. एस.आर. बोम्मई फैसले, क्षेत्रीय दलों के प्रभाव और दुरुपयोग के प्रति जनता की नाराजगी ने इसे दुर्लभ बनाया, जो अब केवल संवैधानिक संकट या गंभीर सुरक्षा चुनौतियों, जैसे मणिपुर, तक सीमित है. शुक्रवार को मणिपुर में राष्ट्रपति शासन 13 अगस्त से छह महीने और बढ़ाया गया. केंद्र जातीय संघर्ष का समाधान खोजने में जूझ रहा है, इसलिए इस विस्तार पर विवाद कम है. एन. बिरेन सिंह के इस्तीफे और भाजपा सरकार के पतन के बाद नाजुक शांति आई है. उग्रवादी समूहों पर कार्रवाई से हिंसा घटी, और मई 2023 से विस्थापित कुछ परिवार घर लौटे.
द हिन्दू लिखता है कि कूकी-जो और मैतेई समुदायों के बीच गहरी खाई बनी हुई है. बफर जोन समुदायों को अलग करते हैं, और कूकी-जो अलग प्रशासन की मांग पर अडिग हैं, जबकि मैतेई संगठन “बाहरी” की कहानी थोपते हैं.
मई 2023 की हिंसा, जिसमें 200 से अधिक मरे और हजारों विस्थापित हुए, ने सामान्य स्थिति बहाल करना कठिन बनाया. केंद्र को समावेशी संवाद शुरू करना होगा, जिसमें कूकी-जो, मैतेई और नागा शामिल हों. विश्वास बहाली के लिए संयुक्त पहल और समान विकास जरूरी हैं. सैन्यीकरण हिंसा रोक सकता है, लेकिन सुलह नहीं. नागरिक समाज, खासकर महिला समूह, मध्यस्थता में मदद कर सकते हैं. राष्ट्रपति शासन समय देता है, लेकिन बिना शिकायतों के समाधान और लोकतांत्रिक शासन के, मणिपुर टूटा रहेगा. केंद्र को सुरक्षा और संवाद के साथ निर्णायक कदम उठाने होंगे. शांति का रास्ता हर समुदाय के सम्मान से शुरू होता है.
न्याय और मजबूत लोकतंत्र का आह्वान
हिन्दुस्तान टाइम्स में करन थापर ने लिखा है कि हमारा लोकतंत्र गर्व करने योग्य है, पर इसकी असफलताएँ भी उतनी ही सत्य हैं. पिछले सप्ताह, बारह नागरिकों की 19 साल बाद बरी होने की घटना ने हमारे विवेक पर गहरा दाग छोड़ा. बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2006 के मुंबई ट्रेन विस्फोट मामले में इन निर्दोष लोगों को बरी करते हुए अभियोजन की विफलता को उजागर किया. “आरोपियों का अपराध साबित करना कठिन है,” अदालत ने कहा. ये बारह लोग, सभी एक समुदाय से, यातना से ली गई स्वीकारोक्तियों और अविश्वसनीय गवाहों के आधार पर सजा काट रहे थे. एटीएस की “झूठी छवि” बनाने की कोशिश ने जनता का विश्वास तोड़ा, जबकि असली अपराधी आजाद हैं.
करन थापर लिखते हैं कि एक आरोपी, कमाल अंसारी, जेल में मर गया. यह केवल जांच की विफलता नहीं, बल्कि हमारे लोकतांत्रिक आदर्शों की हार है. हमारा अपराधबोध इनकी गलत कैद और हमारी चुप्पी दोनों में है. क्या हम इसे सुधार सकते हैं? इसके लिए जवाबदेही जरूरी है—दोषी जांचकर्ताओं पर कार्रवाई, बरी लोगों को मुआवजा और माफी, और जांच एजेंसियों की सख्त निगरानी.
यह आवश्यक है कि न्यायिक सुधार हो और सबूतों की गहन जांच के साथ-साथ त्वरित अपील को समझा जाए. क्या हम इस चुनौती का सामना करेंगे? इतिहास बताता है कि हम अक्सर अपनी गलतियों से नहीं सीखते. सुप्रीम कोर्ट का स्थगन राज्य की अनिच्छा दर्शाता है. फिर भी, यह सुधार का अवसर है. हमें सत्य और निष्पक्षता को प्राथमिकता देनी होगी. यह बरी होना न्याय और एक मजबूत लोकतंत्र के लिए आह्वान है. समय है कार्रवाई का.
कश्मीर से किए गये वादे कब होंगे पूरे?
रामचंद्र गुहा ने टेलीग्राफ में लिखा है कि अगस्त 2015 में उन्होंने कश्मीर घाटी का दौरा किया और पत्रकार शुजात बुखारी से मुलाकात की, जिन्होंने उन्हें अपने गृह राज्य आने का आग्रह किया था. श्रीनगर में यह चर्चा ज्ञानवर्धक थी, लेकिन जून 2018 में उनकी हत्या और अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 का निरस्तीकरण एक निर्णायक मोड़ था. एक गैर-निर्वाचित राज्यपाल के कानूनी हेरफेर के माध्यम से जम्मू और कश्मीर को पूर्ण राज्य से केंद्र शासित प्रदेश में बदल दिया गया—यह भारत के इतिहास में पहली बार हुआ. भाजपा, जो लंबे समय से अनुच्छेद 370 का विरोध करती थी, ने अपना एजेंडा पूरा किया और एक वफादार को उपराज्यपाल नियुक्त किया.
रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि संसद में सरकार ने पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा किया, लेकिन छह साल बाद भी यह वादा अधूरा है, जो नौकरशाही देरी नहीं, बल्कि राजनीतिक इरादे को दर्शाता है. मोदी-शाह सरकार ने चुनावी प्रक्रिया में हेरफेर किया, पांच साल तक चुनाव टाले, निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन कर जम्मू को कश्मीर पर प्राथमिकता दी, और प्रेस को दबाया. इन प्रयासों के बावजूद, हाल के विधानसभा चुनावों में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने बहुमत हासिल किया.
अब्दुल्ला की केंद्र के प्रति सुलह की नीति तब टकराव में बदली जब उपराज्यपाल ने 13 जुलाई को शहीद दिवस के स्मरण पर रोक लगा दी, जो 1931 में महाराजा हरि सिंह के निरंकुश शासन के खिलाफ 21 कश्मीरियों की हत्या को चिह्नित करता है. 2019 के बाद इस अवकाश को हटा दिया गया, जबकि हरि सिंह का जन्मदिन अवकाश घोषित किया गया—यह कदम सांप्रदायिक पक्षपात को दर्शाता है. सरकारी विफलताओं के अलावा, भारतीय समाज भी दोषी है. मुकेश अंबानी का 2019 में जम्मू-कश्मीर में निवेश का वादा अधूरा है, और औद्योगिक उपेक्षा से युवाओं का पलायन बढ़ रहा है.
दिल्ली की मुख्यधारा मीडिया अक्सर कश्मीर की वास्तविकता को तोड़-मरोड़ कर पेश करती है, जबकि सोशल मीडिया और जनभावना कश्मीरियों को बदनाम करती है, जैसा कि पहलगाम हमले के बाद छात्रों पर हमलों में देखा गया. तत्काल राज्य का दर्जा बहाल करना महत्वपूर्ण है, साथ ही आर्थिक और सामाजिक समावेश को बढ़ावा देना ताकि कश्मीरी वास्तव में भारत गणराज्य का हिस्सा महसूस करें.
अभिमन्यु सिंड्रोम: अलग-थलग पड़ता भारत
डेक्कन हेराल्ड में राजीव श्रीनिवासन ने लिखा है कि भारत की आर्थिक और सैन्य शक्ति के रूप में उभरने की संभावना को प्रमुख शक्तियां रोक रही हैं. यह स्वाभाविक है. हर उभरती शक्ति को यह सामना करना पड़ता है. भारत के उदय के लिए मौलिक बदलाव जरूरी हैं. स्थापित शक्तियां विशेषकर अमेरिका और चीन वैश्विक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए व्यापार बाधाएं, तकनीकी प्रतिबंध और भू-राजनीतिक चालें अपनाती हैं जैसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के प्रभाव को सीमित करना और पड़ोसियों के माध्यम से घेराबंदी. इसे ‘अभिमन्यु सिंड्रोम’ कह सकते हैं. यह महाभारत के अभिमन्यु से प्रेरित है, जो चक्रव्यूह में प्रवेश तो कर गया, पर बाहर न निकल सका.
भारत ने वैश्विक मंच पर आर्थिक विकास, सैन्य आधुनिकीकरण और कूटनीतिक महत्वाकांक्षा के साथ कदम रखा है, लेकिन बाहरी प्रतिरोध और आंतरिक कमजोरियों के जाल में फंसकर अलगाव का जोखिम उठा रहा है.
श्रीनिवासन लिखते हैं कि आर्थिक रूप से, भारत को ‘मेक इन इंडिया’ को मजबूत कर सेमीकंडक्टर और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में नवाचार करना होगा. सैन्य रूप से, हिंद-प्रशांत में नौसेना और साइबर क्षमता बढ़ानी होगी, क्वाड जैसे गठबंधनों के साथ स्वायत्तता संतुलित रखते हुए. कूटनीतिक रूप से, वैश्विक दक्षिण में नेतृत्व और सॉफ्ट पावर का उपयोग प्रभाव बढ़ा सकता है. आंतरिक रूप से, आर्थिक असमानता, नौकरशाही जटिलताएं और सामाजिक ध्रुवीकरण कमजोरियां हैं.
चक्रव्यूह तोड़ने के लिए समावेशी विकास, शासन सुधार, विघटनकारी प्रौद्योगिकियों को अपनाना और सामाजिक एकता जरूरी है. भारत का उदय ऐतिहासिक है, पर निश्चित नहीं. अभिमन्यु की तरह, भारत को चक्रव्यूह से निकलने की कला सीखनी होगी, वरना अलगाव का खतरा है. यह नेतृत्व और जनता पर निर्भर है.
