भारत ट्रंप के खिलाफ खड़ा हो
प्रताप भानु मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वैश्विक व्यापार व्यवस्था को नष्ट करने से यह सवाल उठता है कि देशों को इस क्षण कैसे प्रतिक्रिया देनी चाहिए? भारत में एक दृष्टिकोण है जो ट्रंप को खुश करके इस क्षण को अवसर में बदलना चाहता है.
इस नजरिए से भारत को टैरिफ कम करना चाहिए. हम बाहरी दबाव में वहां पहुंचे, यह ठीक है. और, अगर यह भारत को ट्रंप के साथ जल्दी से खुश कर देता है तो यह और भी बेहतर होगा. लेकिन, यह दृष्टिकोण अदूरदर्शी है और ट्रंप के कार्यों की प्रकृति को गलत तरीके से समझता है. जबरन वसूली के आगे झुकने के बजाए ट्रंप की निरंकुशता के खिलाफ वैश्विक सामूहिक प्रतिरोध को कलात्मक रूप से खड़ा करना भारत के दीर्घकालिक हित में होगा.
प्रताप भानु मेहता लिखते हैं कि मुक्त व्यापार के विचार को वाम और दक्षिणपंथी दोनों ने बदनाम किया है. यह एक शानदार बौद्धिक विचार है. समाजों को घरेलू राजनीतिक वैधता और सुरक्षा के बारे में विवेकपूर्ण निर्णयों में व्यापार को भी शामिल करने की आवश्यकता है. टैरिफ कम करने के बारे में हमारे पास एक अलग अकादमिक तर्क हो सकता है लेकिन यह सोचना भोलापन होगा कि दिखावे के बावजूद ट्रंप जो करने की कोशिश कर रहे हैं वह टैरिफ कम करने और व्यापार खोलने की होड़ है. वह जो कर रहे हैं वह साम्राज्यवादी शक्ति का खेल है.
जब ट्रंप कहते हैं कि उनका लक्ष्य पारस्परिक टैरिफ है तो ऐसा लग सकता है, लेकिन यह कुछ और ही है. कानून या नियम अपने स्वभाव से सक्षम या विवश करने वाले उपकरण होते हैं. वे परिणामों को निर्धारित नहीं करते हैं. ट्रंप के टैरिफ पारस्परिकता के बारे में नहीं है. वे द्विपक्षीय आधार पर व्यापार को संतुलित करने के बारे में है जो एक बेतुका विचार है.
भारत के लिए अवसर है ट्रंप टैरिफ
लवीश भंडारी ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि अमेरिका ने आखिरकार वह टैरिफ लागू कर दिया है जिसकी धमकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दे रहे थे. सभी उत्पादों पर 10 फीसदी टैरिफ और व्यापार साझेदारों द्वारा लगाए जा रहे शुल्क के बराबर का टैरिफ लागू होने पर अमेरिका को निर्यात होने वाला हमारा काफी सामान पहले से महंगा हो जाएगा. भारत उन देशों में काफी ऊपर है जिन्हें अमेरिका अनुचित कारोबारी आचरण करता हुआ बताता है. भारत ने अमेरिकी धमकियों पर खामोश रहकर समझदारी ही दिखाई है.
और मुझे लगता है कि अमेरिका की कार्रवाइयों पर वह संयम भी बरतेगा. भारत ने अब तक समझदारी दिखाई है और वह आगे भी कोई जवाबी कार्रवाई नहीं करना ही समझदारी होगी.
लवीश भंडारी लिखते हैं कि भारत ट्रंप की धमकियों का इस्तेमाल अपने फायदे में करे और शुल्क घटाए. इससे देश के उद्योग जगत और अर्थव्यवस्था को कई लाभ होंगे. पहला, दूसरे देश भी अमेरिका पर जवाबी शुल्क लगाते हैं या अपने शुल्क कम नहीं करते तो भारत के लिए निर्यात के नए बाजार हासिल करने का मौका होगा.
दूसरा, भारत को अपने उद्योग जगत की मदद के लिए अन्य क्षेत्रों की तलाश करनी होगी. देश की औद्योगिक नीति को अब बचाव नहीं बल्कि सहारे के मंत्र पर चलना होगा. शुल्क और दूसरे अवरोधों के जरिए उद्योगों को बचाने के बजाए हमें अन्य तरीकों से कारोबारों की मदद की राह तलाशनी होगी. उत्पादन से संबद्ध प्रोत्साहन योजना ऐसी ही व्यवस्था है.
देश में जमीन की कीमतें बेजा तरीके से ऊंची हैं. किसानों को उत्पीड़न से बचाना भी इसकी एक वजह है. इसी तरह देश में बिजली वितरण कंपनियों की खामियों के कारण बिजली बहुत महंगी है. कृषि और घरेलू उपभोक्ताओं को रियायती दरों पर बिजली मुहैया कराना भी इसकी एक वजह है. उद्योग जगत पर यह बोझ नहीं थोपा जाना चाहिए.
मुसलमानों को हाशिए पर रखना जारी
शशि थरूर ने एनडीटीवी में लिखा है कि मुगल सम्राट औरंगजेब को लेकर नागपुर में हाल ही में हुई अशांति स्मरण कराती है कि भारत में इतिहास पर बहस केवल सुदूर अतीत तक ही सीमित नहीं है. यह उथल-पुथल एक राजनीaurangzeb controversyतिक उपकरण के रूप मे इतिहास की स्थायी शक्ति को रेखांकित करती है. सत्ताधारी बीजेपी के साथ जुड़े हिन्दू राष्ट्रवादी प्रदर्शनकारियों द्वारा विवादास्पद मुगल सम्राट औरंगजेब का पुतला जलाने के बाद झड़पें हुईं जिनका नाम भारत के विविध स्पेक्ट्रम में अलग-अलग भावनाओं को जगाता है. प्रदर्शनकारियों ने उनकी साधारण कब्र को नष्ट करने की मांग की जिससे कई मुस्लिम और धर्मनिरपेक्ष हिन्दू दोनों ही नाराज हो गए.
थरूर लिखते हैं कि औरंगजेब अपनी मृत्यु के सदियों बाद भी ऐसी उग्र प्रतिक्रिया क्यों भड़का रहा है? खास तौर से हिन्दू राष्ट्रवादी हलकों में औरंगजेब अत्याचार का प्रतीक है. उस पर मंदिरों को नष्ट करने, हिन्दुओं पर इस्लामी करों को फिर से लागू करने, सिख आध्यात्मिक नेतां को मारने और हिन्दू परंपराओं को दबाने वाली नीतियों को लागू करने का आरोप है.
हालांकि कुछ भारतीय मुसलमानों के लिए उसे उसकी धर्मपरायणता और सैन्य गौरव के लिए याद किया जाता है जिसने मुगल साम्राज्य को काबुल से ढाका तक के क्षेत्रों में फैलाकर उसके शिखर तक पहुंचाया. आज जो वैचारिक लड़ाई चल रही है- चाहे औरंगजेब पर हो या इस्लामी शासन की व्यापक विरासत पर- इतिहास और राष्ट्रवाद के बीच के अंतर्संबंध को दर्शाती है. औरंगाबाद का नाम बदलकर छत्रपति संभाजीनगर करना और नई दिल्ली में औरंगजेब रोड को एक अधिक स्वादिष्ट विकल्प से बदलना अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं.
वे भारतीय संस्कृति, नामों और स्थानों पर सदियों से चले आ रहे इस्लामी प्रभाव को खत्म करने के व्यापक अभियान में अच्छी तरह से फिट बैठते हैं. सद्भाव में अंतर-धार्मिक सह-अस्तित्व के आदर्श को त्याग दिया गया है. राष्ट्रीय आख्यान में मुसलमानों को हाशिए पर रखा जाना जारी है.
‘उपद्रवी’ धर्म को परिभाषित नहीं कर सकते
पुष्पेश पंत ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि दिल्ली में हाईकोर्ट के जज के आवास में लगी आग ने नोटों के बंडलों से कहीं अधिक को राख में बदल दिया है. यह आग लंबे समय तक सुलगती रहेगी. हम लंबे समय से इस दिखावे की दुनिया में जी रहे हैं कि हमने खुद को संविधान दिया है जिसने राज्य की प्रकृति को परिभाषित किया है. हमने नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित किया है और नियंत्रण व संतुलन की एक प्रणाली स्थापित की है- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का बंटवारा.
वर्दीधारी उच्च पदस्थ पुलिस अधिकारियों में अचानक से तानाशाही का कीड़ा लग गया है. उत्तर प्रदेश के कई जिलों में सार्वजनिक स्थानों पर नमाज अदा करने की योजना बनाने वालों को चेतावनी दी है बल्कि धमकी दी है कि उनका पासपोर्ट जब्त किया जाएगा, ड्राइविंग लाइसेंस रद्द किए जाएंगे और उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा. यूपी बुलडोजर न्याय देने के लिए भी कुख्यात हो चुका है.
पुष्पेश पंत लिखते हैं कि भारत में संवैधानिक विकास औपनिवेशक स्वामियों द्वारा ऊपर से थोपे गये सुधारों का परिणाम था. इस बात पर कोई आम सहमति नहीं थी कि नवजात राष्ट्र को किस मार्ग पर चलना चाहिए. पीछे मुड़कर देखने पर डॉ अंबेडकर और पंडित नेहरू की दूरदर्शिता के बारे में बहुत कुछ कहना आसान है. हालांकि यह भारतीय राज्य की प्रकृति के बारे में प्रमुख मतभेदों को छिपाना होगा. हर कोई धर्मनिरपेक्षता या समाजवाद पर सहमत नहीं था.
गंगा, यमुना, कावेरी और पेरियार में बहुत पानी बह चुका है. न तो भारत और न ही दुनिया पहले जैसी रही. 2014 के बाद से उपनिवेशवाद के अवशेषों और स्वतंत्रता संग्राम के अधूरे कामों के बारे में बहस फिर से शुरू हो गयी है. कोई भी इस उम्मीद में अपना सिर तपती रेत में नहीं दबा सकता कि तूफान हमें अपंग किए बिना गुजर जाएगा.
विनाश की परियोजना
रामचंद्र गुहा ने टेलीग्राफ में लिखा है कि भारत में सार्वजनिक चर्चा मे ‘राष्ट्रीय मीडिया’ जितना भ्रामक कोई भी शब्द नहीं है. इस श्रेणी में आने वाले समाचार-पत्र पत्रिकाएं और टीवी चैनल उस राष्ट्र के बारे मे संकीर्ण दृष्टिकोण रखते हैं जिसका वे प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं. वे भारत को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से देखते हैं, और अक्सर एनसीआर से ही. सत्ता के साथ उनकी भौगोलिक निकटता उन्हें लुभाती भी है और संतुष्ट भी करती है. इसलिए समाचार पत्रों के विचार पृष्ठों में कैबिनेट मंत्रियों द्वारा उपदेशात्मक लेखों की भरमार है. टेलीविजन द्वारा भारत की विविधता और जटिलता को विभिन्न दलों के राजनेताओं के बीच शोरगुल में बदल दिया गया है. इसलिए राष्ट्रीय समाचार पत्रों में जगह कम होती जा रही है.
रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि बीते कुछ वर्षों में राष्ट्रीय मीडिया के बारे में संदेह लगातार बढ़ता जा रहा है. हाल ही में एक बड़े पैमाने पर सामने आ रहे राष्ट्रीय घोटाले पर लेखों के दो बेहतरीन संकलनों से इसकी पुष्टि हुई. एक ऐसा घोटाला जो निश्चित रूप से एनसीआर में एक सुसज्जित टेलीविजन स्टूडियो में कभी भी बहस का विषय नहीं बनेगा. यह घोटाला ग्रेट निकोबार द्वीप की योजनाबद्ध तबाही है जिसका जिक्र 3 मार्च 2025 के फ्रंट लाइन पत्रिका के विशेष अंक में है.
भारत के विभिन्न भागों में प्रकाशित स्वतंत्र वेबसाइटों और पत्रिकाओं द्वारा प्रकाशित लेख इसमें शामिल हैं. केंद्र सरकार की जिस परियोजना के खतरनाक निहितार्थों को इन निबंधों ने उजागर किया है उसका नाम ऑरवेलियन है- ‘ग्रेट निकोबार द्वीप का समग्र विकास’. वर्तमान में इसकी लागत 80 हजार करोड़ रुपये आंकी गयी है. इस नाजुक द्वीप पर एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और मुख्य भूमि से कई लाख प्रवासियों को समायोजित करने के लिए एक टाउनशिप का निर्माण किया जाएगा.
यह नई परियोजना द्वीप की प्राकृतिक और सांस्कृतिक अखण्डता पर भारत सरकार द्वारा जानबूझकर योजनाबद्ध हमला है. बंदरगाह का निर्माण विशालकाय लेदरबैक कछुए के घोंसले के स्थानों को नष्ट करके और इसके अलावा बहुत से अन्य पारिस्थितिक नुकसान पहुंचाकर किया जाएगा. टाउनशिप लगभग 139 वर्ग किमी के समृद्ध प्राकृतिक जंगल को नष्ट कर देगा. वर्तमान मानव आबादी 8500 है जो करीब चालीस गुणा बढ़ जाएगी. विभिन्न लेखकों के हवाले से रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि यह परियोजना द्वीप में तबाही लेकर आने वाली है.
