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संडे व्यू: परिसीमन पर राजनीतिक संकट, दोस्ती नहीं होती कूटनीति

पढ़ें इस रविवार करन थापर, पी चिदंबरम, तवलीन सिंह, रामचंद्र गुहा और पुष्पेश पंत के विचारों का सार.

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राजनीतिक संकट के बीच परिसीमन की दुविधा

करन थापर ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा है कि यह अपेक्षित था कि जैसे-जैसे हम जनगणना के करीब आते गये परिसीमन का भूत हमें परेशान करने लगा. हालांकि केंद्र सरकार इससे जुड़ी चिंताओं को खारिज कर रही है लेकिन उन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं है. न ही उन्हें ऐसा करना चाहिए. परिसीमन जनसंख्या में परिवर्तन के हिसाब से निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण है. इसका मतलब यह है कि जिन राज्यों में जनसंख्या दूसरों की तुलना में तेजी से बढ़ी है वहां निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या बढ़ जाएगी. दूसरे शब्दों में कुछ राज्यों को सीटें अधिक मिलेंगी जबकि अन्य को कम सीटें मिलेंगी.

करन थापर एक अध्ययन के हवाले से बताते हैं कि दक्षिण भारतीय राज्यों में निर्वाचन क्षेत्र कम हो जाएंगे. केरल और तमिलनाडु में आठ-आठ सीटें कम हो जाएंगी. कर्नाटक में दो सीटें कम होंगी. पश्चिम बंगाल में चार, ओडिशा में तीन और पंजाब, उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश में एक-एक सीट कम हो जाएगी. कई उत्तरी राज्यों में इसका विपरीत असर होगा. उत्तर प्रदेश में 11 सीटें, बिहार में 10, राजस्थान में छह और मध्यप्रदेश में चार सीटें बढ़ जाएंगी.

योगेंद्र यादव कहते हैं कि हिन्दी भाषी क्षेत्र जो वर्तमान में 543 में 226 सीटों पर नियंत्रण रखता है बढ़कर 259 हो जाएगा. इसी तरह दक्षिणी राज्यों की 132 सीटों में से 26 की कमी हो जाएगी. इसका स्पष्ट अर्थ है कि संसद में उनके प्रतिनिधित्व का आकार और प्रभाव भी कम हो जाएगा. परिसीमन के साथ लोकसभा की सीटें बढ़ा दिए जाने से थोड़ा फर्क जरूर पड़ेगा लेकिन इससे दक्षिण की चिंताएं दूर नहीं होंगी. टाइम्स ऑफ इंडिया में एक गणना की थी जिसके मुताबिक 543 सीटों में से 129 सीटें पांच दक्षिणी राज्यों के पास हैं जो 24 फीसद है. अगर लोकसभा सीटों की कुल संख्या 790 कर दी जाए तो इन दक्षिणी राज्यों के पास 152 सीटें हो जाएंगी लेकिन उनका प्रतिशत घटकर सिर्फ 19 रह जाएगा.

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दोस्ती नहीं होती कूटनीति

पी चिदंबरम ने फिनांशियल एक्सप्रेस में शेक्सपियर के हवाले से लिखा है कि ‘दोस्ती में खुशामद होती है’. प्रधानमंत्री को लगता है कि अपने मित्र राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खुशामद करते हुए आप्रवासन और निर्वासन, वीजा, व्यापार संतुलन, शुल्क, परमाणु ऊर्जा, दक्षिण चीन सागर, ब्रिक्स, क्वाड और मुक्त व्यापार समझौता यानी एफटीए जैसे मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ाई जा सकती है. राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी दोनों के पास ही चार साल हैं. यह स्पष्ट है कि सभी मुद्दे चार वर्षों में हल नहीं किए जा सकते. अगली अमेरिकी सरकार चाहे रिपब्लिकन हो या डेमोक्रेट, शायद ट्रंप के रास्ते पर न चलना चाहे. भारत के लिए पहला सबक है कि अपने संबंध व्यक्तिगत दोस्ती से परे रखें.

चिदंबरम लिखते हैं कि मोदी ने पॉडकास्टर लेक्स फ्रीडमैन को दिए इंटरव्यू में ट्रंप की ‘विनम्रता’ और ‘लचीलेपन’ की प्रशंसा की है. उन्होंने कहा है कि अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप ‘पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा तैयार’ हैं और ‘उनके दिमाग में एक स्पष्ट रोडमैप है जिसमें अच्छी तरह से परिभाषित कदम हैं, हर कदम को उन्हें उनके लक्ष्यों की ओर ले जाने के लिए डिजाइन किया गया है.’ मोदी ने कहा, ‘मुझे सचमुच विश्वास है कि उन्होंने एक मजबूत, सक्षम टीम बनायी है और मुझे लगता है कि वे लोग राष्ट्रपति ट्रंप के दृष्टिकोण को लागू करने में पूरी तरह सक्षम हैं.’

ट्रंप की इस तारीफ से सारे अमेरिकी भी सहमत नहीं होंगे. ट्रंप ने अपने दृष्टिकोण को लागू किया तो यह भारत के लिए अच्छी खबर नहीं है. अमेरिकी भारतीय नागरिकों के लिए भारत में रहने वाले अपने परिवारों को अमेरिका में बुलाना तक मुश्किल हो जाएगा. बिना दस्तावेज वाले अनुमानित 7 लाख भारतीय वापस भेज दिए जाएंगे. भारत को टैरिफ घटाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा. चाहे पनामा नहर या फिर ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जे का मंसूबा हो, भारत के लिए उसका समर्थन करना मुश्किल होगा. रूस अगर यूक्रेन के और अधिक क्षेत्र पर कब्जा करे, चीन अगर ताइवान पर कब्जा करे तो भारत का रुख क्या होगा? चीन को अक्साई चिन या अरुणाचल प्रदेश पर कब्जा करने से कौन रोकेगा?

असहमति और आलोचना

तवलीन सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस में एक सवाल के साथ लिखा है कि आखिरी बार आपने कब सुना था कि नरेंद्र मोदी के किसी मंत्री ने बिना हमें याद दिलाए कुछ बातें कही हों कि जो हासिल हुआ है वह ‘हमारे प्रधानमंत्री के दूरदर्शी नेतृत्व’ के तहत हुआ है. हालिया साक्षात्कार में प्रधानमंत्री ने कहा है कि उनका मानना है कि आलोचना ‘लोकतंत्र की आत्मा’ है. ऐसा लगता है कि आपने यह नहीं देखा है कि आप अब इतने ऊंचे पर बैठे हैं कि आपके सबसे करीबी साथी भी आपको किसी भी चीज के बारे में सच बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. निजी तौर पर वे स्वीकार करेंगे कि नीतियों या उनके कार्यान्वयन में खामियां हैं लेकिन सार्वजनिक रूप से वे उस तरह की दासता दिखाते हैं जो आप उत्तर कोरिया जैसे अधिनायकवादी देशों में देखते हैं जहां ‘प्रिय नेता’ को सच बताने के बहुत बुरे परिणाम हो सकते हैं.

तवलीन सिंह लिखती हैं कि उन्हें तब बुरा लगता है जब उच्च शिक्षित मंत्रियों को खुद को नीचा दिखाते हुए देखती हैं. खासकर विदेशियों के साथ इंटरव्यू में ऐसा होता है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध से जुड़े सवालों के जवाब में वे मंत्र की तरह दोहराते हैं कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, इसलिए इस तरह की मौलिक लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं को चुनौती नहीं दी जा सकती. वे अक्सर जोड़ देते हैं कि हम ‘लोकतंत्र की जननी’ भी हैं. ग्रीस को आम तौर पर लोकतंत्र की जननी माना जाता है.

भारत के ‘स्वतंत्र’ न्यूज चैनल भारत से जुड़ी स्टोरी में इतना आक्रामक राष्ट्रवाद और गुस्सा भरा देशभक्त डाल देते हैं कि वह रिपोर्टिंग से ज्यादा पैम्फलेटिंग जैसी लगेगी. लेखिका को याद नहीं आता कि इन चैनलों पर कब कोई ऐसी न्यूज़ स्टोरी देखी जिसमें प्रधानमंत्री की आलोचना की गयी हो. प्रधानमंत्री के मीडिया मैनेजरों ने यह साफ कर दिया है कि जो पत्रकार सरकार की नीतियों की आलोचना करने की हिम्मत करेंगे उन्हें इंटरव्यू या प्रवेश मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी होगा. प्रधानमंत्री से सिर्फ उन्हीं पत्रकारों को मुलाकात का मौका मिलेगा जो कुछ हद तक चापलूसी दिखाते हैं.

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भाषा पर युद्ध

रामचंद्र गुहा ने टेलीग्राफ में लिखा है कि डीएमके और बीजेपी नेताओं के बीच वाकयुद्ध को प्रेस में दो भाषाओं -तमिल और हिन्दी- के बीच की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत किया गया है. गलत ना होते हुए भी यह अधूरा है. यह बहस भारत के दो बहुत अलग विचारों का प्रतिनिधित्व करती है- एक, जो संस्कृति के साथ-साथ राजनीति में भी विविधता और अंतर का स्वागत करता है. दूसरा, जिसका अघोषित आदर्श वाक्य है मानकीकरण, समरूपीकरण, केंद्रीकरण. तमिलनाडु में हिन्दी थोपे जाने का विरोध बहुत पुराना है. 1930 के दशक के उत्तरार्ध में जब तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी में कांग्रेस सरकार ने स्कूलों में हिन्दी पढ़ाना अनिवार्य करने का फैसला किया.

बाद में मद्रास के प्रधानमंत्री (तब यही कहा जाता था) सी राजगोपालाचारी ने अपना रुख पूरी तरह बदल लिया. 1950 के दशक तक उन्होंने तर्क देना शुरू कर दिया कि अगर किसी की मातृभाषा के अलावा दूसरी भाषा पढ़ाई जानी है तो वह हिन्दी के बजाए अंग्रेजी होनी चाहिए. आज भी तमिल राजनेता यही तर्क देते हैं.

रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि 1965 में लाल बहादुर शास्त्री ने केंद्र और राज्यों के बीच संवाद की भाषा के रूप में अंग्रेजी के बजाए हिन्दी को लागू करने की कोशिश की. व्यापक विरोध के बाद यह निर्णय वापस हुआ. कांग्रेस की प्रतिष्ठा को इतना नुकसान हुआ कि तमिलनाडु में लंबे समय के लिए सत्ता से दूर होना पड़ा. एमके स्टालिन और उनके सलाहकार जानते हैं कि 1960 के दशक में जिस राजनीति से तत्कालीन राष्ट्रीय पार्टी को हराया गया था वह राजनीति आज भी कारगर है. बीजेपी तमिलनाडु में पैठ बनाने के लिए बेताब है. काशी तमिल संगमम, नये संसद भवन में ‘संगोल’ की स्थापना और तमिलनाडु में हिन्दुत्व उद्धारक के रूप में एक पूर्व आईपीएस अधिकारी को खड़ा करने में संसाधनों को झोंक दिए जाने के उदाहरण मौजूद हैं.

तमिलनाडु ने त्रिभाषा फॉर्मूला को स्वीकार नहीं किया. त्रिभाषा फॉर्मूला हिन्दी विस्तारवाद का अनजाना उपकरण रहा है. इसी कारण से वर्तमान शासन इसे बढ़ावा दे रहा है. हालांकि प्रधानमंत्री इस विषय पर चुप रहे हैं लेकिन गृहमंत्री ने अक्सर जोर दिया है कि हिन्दी और केवल हिन्दी ही भाषा होनी चाहिए.
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फिर उभर रहा साम्राज्यवाद

पुष्पेश पंत ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो महीने पहले दूसरी बार राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी तभी से वे लगातार आक्रामक रुख अपना रहे हैं. उनके द्वारा हस्ताक्षरित कार्यकारी आदेशों की झड़ी ने पूरी दुनिया को खलबली में डाल दिया है. उन्होंने न केवल विरोधियों के खिलाफ बल्कि सहयोगियों के खिलाफ भी अभूतपूर्व व्यापार युद्ध छेड़ दिया है, टैरिफ को हथियार बना दिया है, सभी को यह याद दिला दिया है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता. समकालीन कूटनीति की भाषा तेजी से शेखी बघारने और शेखी बघारने वाली धौंस में बदल गयी है. भारत, जिसने पिछले एक दशक से अमेरिका के साथ विशेष रणनीतिक संबंध विकसित किए हैं, गलत कदम उठा रहा है.

पुष्पेश पंत ने आगे लिखा है कि यह सच है कि प्रधानमंत्री मोदी मीडिया की चकाचौंध में उस अपमान से बच गये है जो कुछ कम भाग्यशाली राष्ट्राध्यक्षों और सरकार प्रमुखों को झेलना पड़ा है. डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने, पनामा नहर और ग्रीन लैंड पर कब्जा करने, अटलांटिक गठबंधन को तोड़ने और पहले से ही कमजोर नियम-आधारित विश्व व्यवस्था को तहस-नहस करने की धमकी दी है जिससे राष्ट्रों की संप्रभुता को समानता के बारे में अंतरराष्ट्रीय कानूनी कल्पना ध्वस्त हो गयी है. ‘शक्ति ही अधिकार है’ उनका कथन है. इससे भारत का क्या होगा?

वास्तविकता की गंभीरता से जांच करने का समय आ गया है. बहुपक्षीय मंच जहां भारत नमो के नेतृत्व में अपने वजन से अधिक प्रदर्शन कर रहा था, लगभग समाप्त हो चुका है. हम जो देख रहे हैं वह साम्राज्यवाद का फिर से उभरना है. अमेरिकी प्रतिबंधों के खतरे ने भारत को तेल और गैस के साथ-साथ सैन्य हार्डवेयर के आयात में विविधता लाने के लिए बाध्य किया है जिससे रूस पर हमारी निर्भरता कम हो गयी है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में एक अधीनस्थ या सहायक भूमिका स्वीकार करने के लिए तैयार हैं.

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