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संडे व्यू: क्या किसानों से दूरी बरत रही मोदी सरकार 3.0, महिलाएं चुनाव में जीत की गारंटी

पढ़ें इस रविवार प्रताप भानु मेहता, करन थापर, हरि किशन शर्मा, अदिति फडणवीस और सुनंदा के दत्ता रे के विचारों का सार.

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लोकतंत्र और राष्ट्रवाद पर सांप्रदायिकता हावी

इंडियन एक्सप्रेस में प्रताप भानु मेहता ने 2025 में दिख रहे पांच रुझानों के बारे में लिखा है. आने वाला समय षड्यंत्र का युग होगा. भारत और अमेरिका जैसे दो लोकतंत्र में यह आहट दिखती है. षड्यंत्र के सिद्धांत हमेशा राजनीतिक तर्कों पर हावी रहे हैं. किसी न किसी मुद्दे पर कम से कम आधी आबादी को लगेगा कि दुनिया बर्बादी से बस एक कदम दूर है. यह अस्तित्वहीन स्टेट, छोटे गुट, जातीय समूह जैसे नतीजों में दिखेंगी.

भानु प्रताप ने आने वाले समय को सांप्रदायिकता का युग भी बताया है. सांप्रदायिकता ने लोकतंत्र और राष्ट्रवाद को पीछे छोड़ दिया है. 1990 के दशक से लगभग दो दशकों तक सांप्रदायिक हिंसा में कमी आयी है लेकिन यह प्रवृत्ति उल्ट रही है. अब सांप्रदायिकता समाज के सबसे शक्तिशाली वर्गों की डिफॉल्ट वैचारिक चेतना भी बन चुकी है. दरारें बढ़ रही हैं, सांप्रदायिक जख्म कुरेदे जा रहे है, नफरत की राजनीति को व्यापक रूप से वैध बनाया जा रहा है इसे रोकना मुश्किल होगा.

भानु प्रताप मेहता आने वाले समय में सामाजिक आत्मज्ञान का संकट भी देखते हैं. अनिश्चितता और अंतराल जैसे शब्दों के उपयोग की वजह यह है कि हम सामाजिक और आर्थिक प्रणालियों के बारे में जितना दिखावा करते हैं उससे कहीं कम जानते हैं. 2008 के वित्तीय संकट, कोविड महामारी के घाव और यूक्रेन और इजराइल में युद्धों के बाद से दुनिया बदली है. मुद्रास्फीति के कारणों के बारे में और अर्थव्यवस्थाओं के किस हद तक दबाव को झेलने की क्षमता है, इस बारे में धारणाएं नीति निर्माताओं को भ्रमित कर रही हैं. हर देश में हर कोई यह जानना चाहता है कि हम अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के किन नियमों को बनाए रखना चाहते हैं या हमारा दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित क्या है.

अंतरराष्ट्रीय संबंधों में मूल्य की खोज अहम हो गयी है. यूक्रेन में शांति लाने और चीन अमेरिका संबंधों को स्थिर बनाने की संभावना पर उत्साह दिख सकता है. दुनिया मे तकनीकी और सांस्कृतिक रचनात्मकता दिखेगी. विकास को अधिक शांति से प्राप्त किया जाएगा. इससे उत्साह और विनाश दोनों से बचा जा सकेगा.

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भारत में भी क्यों ना हो दोहरी नागरिकता?

हिंदुस्तान टाइम्स में करन थापर ने नये साल में संकल्प लेने की वकालत की है. यह संकल्प है दोहरी नागरिकता की. अगर यह इच्छा पूरी होती है तो न सिर्फ लेखक को इसका फायदा होगा बल्कि लाखों-करोड़ों लोगों को भी लाभ होगा. अगर किसी ने माता-पिता या निवास के जरिए यह अधिकार हासिल किया है तो इसकी अनुमति क्यों नहीं दी जानी चाहिए? नागरिकता सिर्फ जन्म से मिलने वाला विशेषाधिकार नहीं है. यह बहुराष्ट्रीय माता-पिता होने का प्रतिबिंब भी हो सकता है और साथ ही अपनी पहचान की अभिव्यक्ति भी हो सकती है. उदाहरण के लिए ब्रिटिश और भारतीय माता-पिता के बच्चों को ब्रिटिश और भारतीय दोनों होने का अधिकार है. यह आग्रह करना अनुचित है कि अगर वे भारतीय बनना चाहते हैं तो उन्हें दूसरी नागरिकता का अधिकार त्यागना होगा.

करन थापर का मानना है कि जो भारतीय विदेश में रह चुके हैं और अपने नये देश के साथ पहचान बना चुके हैं, उन्हें अपनी नागरिकता छोड़े बिना उस देश की नागरिकता स्वीकार करने का अधिकार है. भारत में ऐसी अनुमति नहीं है. हालांकि लेखक यह मानते हैं कि कई बड़े प्रतिष्ठित लोकतांत्रिक देशों में भी दोहरी नागरिकता की अनुमति नहीं है. इनमें जापान, नीदरलैंड और नॉर्वे शामिल हैं.

लेकिन, दोहरी नागरिकता की अनुमति देने वाले देशों में ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, फ्रांस, आयरलैंड, स्वीडन, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हैं. हमारे पड़ोसी देशों में बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान भी दोहरी नागरिकता की अनुमति देते हैं जबकि चीन, बर्मा और नेपाल ऐसा नहीं करते.

लेखक इस चिंता की ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि दोहरी नागरिकता होने से ऐसे देशों के लोगों को भी भारतीय नागरिक होने की अनुमति मिल जाएगी जो भारतीय हितों के प्रतिकूल हैं. हालांकि लेखक का सुझाव है कि ऐसे देशों की सूची भारत बना सकता है. हालांकि लेखक इस तर्क को खारिज करते हैं कि दोहरी नागरिकता से भारतीय नागरिकता की अहमियत कम होती है. लेखक को उम्मीद है कि मोदी या गांधी दोहरी नागरिकता पर अपनी-अपनी पार्टी की संकीर्ण सोच पर पुनर्विचार करेंगे.

क्या किसानों से दूरी बरत रही मोदी सरकार 3.0?

हरिकिशन शर्मा ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि किसानों के आंदोलन को लेकर मोदी 3.0 का रुख बदला हुआ है. पिछले कार्यकाल में मोदी सरकार ने किसान यूनियनों के साथ लगातार वार्ताएं की थीं. बातचीत के लिए तीन केंद्रीय मंत्रियों- नरेंद्र सिंह तोमर, खाद्य मंत्री पीयूष गोयल और वाणिज्य राज्य मंत्री सोम प्रकाश- की एक टीम बनायी गयी थी.. इस टीम ने 14 अक्टूबर 2020 से 22 जुनवरी 2021 तक 11 दौर की बातचीत की थी. यहां तक कि 8 दिसंबर 2020 को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह किसानों से बातचीत करने दिल्ली के पूसा कॉम्पलेक्स में भी पहुंचे थे. तीन कृषि कानून वापस लेने के बाद जब फरवरी 2024 में किसानों ने फिर से दिल्ली कूच करने का आह्वान किया था तब भी तीन केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल, तत्कालीन कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा और गृह राज्य मंत्री नित्यानन्द राय की टीम ने किसान यूनियनों के साथ दो दौर की बातचीत चंडीगढ़ जाकर की थी. उसके बाद से बातचीत का सिलसिला बंद है.

लेखक हरिशन शर्मा ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के बयान के हवाले से लिखा है कि सरकार कह रही है कि वह इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करेगी. अपनी ओर से शिवराज सिंह चौहान ने किसानों को हर मंगलवार को बैठक के लिए खुला निमंत्रण दिया है और किसानों के कुछ समूहों से मुलाकात की है. पंजाब के मंत्री गुरमीत सिंह खुदियन सहित राज्यों के कृषि मंत्रियों के साथ भी केंद्रीय कृषि मंत्री ने बैठक की है.

एसकेएम (गैर राजनीतिक) और केएमएम 13 फरवरी 2024 से शंभू और खनौरी बॉर्डर पर डेरा डाले हुए हैं. हरियाणा पुलिस ने ‘दिल्ली चलो’ मार्च को रोक दिया था. इस बार आंदोलन पंजाब-हरियाणा की सीमा तक ही सीमित है. इसका भौगोलिक विस्तार 2020-21 के कृषि आंदोलन जितना व्यापक नहीं है. दूसरी बात यह है कि पंजाब और अन्य राज्यों के कई कृषि संघों का का समूह एसकेएम समेत कई प्रमुख किसान संगठन इस आंदोलन में शामिल नहीं हैं. हालांकि उन्होंने समर्थन जरूर दिया है. तीसरी बात यह है कि 2020-21 का आंदोलन केंद्र के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ था जबकि वर्तमान आंदोलन में पहले से उठाई गयी कई मांगें शामिल हैं. किसान नेता जगजीत सिंह दल्लेवाल का अनशन शनिवार को 40वें दिन में प्रवेश कर गया.

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चुनाव में जीत की गारंटी बन गयी हैं महिलाएं

बिजनेस स्टैंडर्ड में अदिति फडणवीस लिखती हैं कि पहली नजर में महिलाएं चुनाव जीतने का नया और शानदार सियासी नुस्खा बनी नजर आती हैं. नकद बांटो, परिवहन मुफ्त कर दो, सार्वजनिक स्थानों और परिवारों के भीतर सुरक्षा पक्की कर दो..बस, वोटों की झड़ी लग जाएगी. मगर, बड़ा फर्क यह आया है कि महिला मतदाता अब परिवार के पुरुषों के कहने पर वोट नहीं देतीं. रोजगार, आर्थिक आजादी, परिवार के कल्याण तथा अपने अरमानों को ध्यान में रखकर ही वोट देती हैं. बिहार में नीतीश कुमार ने 2005-06 में लड़कियों को मुफ्त साइकल देने की योजना शुरू की, जिससे उन्हें चुनावी सफलता मिली. 2006 में पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण देने का फायदा भी नीतीश कुमार को मिला. 2015 में शराबबंदी की घोषणा के बाद पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा वोट करने लग गयीं.

अदिति लिखती हैं कि जल्द ही दूसरी पार्टियां भी समझ गईं कि महिलाएं भारी वोट बैंक हैं. उज्जवला योजना के जरिए बीजेपी ने देशभर की महिलाओं तक पहुंचने की कोशिश की. आम आदमी पार्टी ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए बड़ा अभियान शुरू किया. 2002 में ममता बनर्जी की सत्ता में वापसी हो सकी इसके पीछे सभी आय वर्गों की महिलाओँ को नकद देने की घोषणा वजह थी. कांग्रेस ने 2022 में हिमाचल प्रदेश और 2023 में कर्नाटक विधानसभा चुनावों से पहले नकद राशि देने का वादा किया. मध्यप्रदेश में लाड़ली बहना, महाराष्ट्र में लाड़की बहन और हरियाणा में लाडो लक्ष्मी योजना के माध्यम से बीजेपी ने महिलाओं तक सीधे नकद भेजा.

इस समय देश के 10 राज्य महिलाओं को नकद राशि दे रहे हैं. इसके अलावा दिल्ली, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, केरल एवं पंजाब जैसे राज्यों में महिलाएं सरकारी बसों में मुफ्त सफर कर सकती हैं. गोल्डमैन सैक्स का रिसर्च कहता है कि 2024-25 में राज्यों को अपने बजट में 18 अरब डॉलर इन योजनाओं के लिए रखने पड़े जो भारत के जीडीपी का 0.5 फीसद है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़े कहते हैं कि 79 फीसदी महिलाओं के पास अपना बैंक या बचत खाता है. पांच साल पहले यह आंकड़ा 53 फीसदी ही था.

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खुले विचारों वाले डॉ. मनमोहन

सुनंदा के दत्ता रे ने टेलीग्राफ में लिखा है कि अगर चुप्पी डॉ मनमोहन सिंह का स्वभाव था तो उनके बॉस पीवी नरसिंहाराव के लिए रणनीति. पीवी नरसिंह राव चाहते तो लाइसेंस परमिट राज जारी रख सकते थे लेकिन उन्होंने समय के साथ चलना जरूरी समझा. सिंगापुर के ली कुआन यू की स्थायी दुश्मनी भी उन्होंने ली जिनका मानना था कि लोकतंत्र की समस्याओं का समाधान कम लोकतंत्र में नहीं, बल्कि व्यापक लोकतंत्र में निहित है. यह बात उन्होंने सिंगपुर के लोगों के बीच तालियों की गड़गड़ाहट के बीच कही थी. डॉ मनमोहन सिंह भी ऐसे विरोधाभासों से परिचित थे. लेखक जब होनोलुलु से लौटे तब भारत में आर्थिक संकट के बीच डॉ सिंह ने उन्हें गर्व के साथ बताया था कि केवल उनके द्वारा संपत्ति कर को समाप्त करने से ही ही अरबपतियों का उदय संभव हो सका. बाद में डॉ सिंह ने अमीर और प्रसिद्ध लोगों को चेतावनी भी दी कि बढ़ती आय और धन असमानताएं सामाजिक अशांति पैदा कर सकती हैं.

सुनंदा के दत्ता रे लिखते हैं कि डॉ मनमोहन सिंह कभी आत्म प्रचारक नहीं रहे. सब्सिडी पर प्रधानमंत्री के साथ अपने मतभेदों का सार्वजनिक रूप से कभी उल्लेख नहीं किया. नरसिंहा राव ने डॉ सिंह के सुधार प्रस्तावों को कांग्रेस के कट्टर दुश्मन लाल कृष्ण आडवाणी को समझाया. आडवाणी ने अपना आशीर्वाद दिया. महासचिव केएन गोविंदाचार्य के अनुसार नरसिंहा राव और मनमोहन सिंह ने “एक महीने में पिछली सरकारों द्वारा 43 सालों में उठाए गये कदमों से कहीं अधिक क्रांतिकारी कदम उठाए गये थे.”

लेखक आगे बताते हैं कि डॉ मनमोहन सिंह ने कभी इस बात से इनकार नहीं किया कि अपने पद पर नियुक्त होने के कुछ ही घंटों के भीतर वे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रबंध निदेशक मिशेल कैमडेसस से टेलीफोन पर बात कर रहे थे. आईएमएफ समेत कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से देश के लिए मदद पाने में डॉ सिंह कामयाब रहे. प्रधानमंत्री के रूप में भी डॉ मनमोहन सिंह बड़ी और छोटी घटनाओं के बारे में समान रूप से स्पष्ट रहे. शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग पर समझौते को लेकर हुए टकराव से वे दुखी हुए. लेखक ने बताया है कि वे कभी डॉ मनमोहन सिंह से यह पूछने की हिम्मत नही जुटा सके कि उनकी कुर्सी पर बैठे व्यक्ति के अनुसार विश्वगुरु भारत दुनिया की सबसे अधिक विकास दर के साथ फल-फूल रहा है, फिर भी भारतीय विदेश में बसने के लिए इतने बेताब क्यों हैं?

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