बांग्लादेश में नया दौर
सुनंदा के. दत्ता-रे का टेलीग्राफ में लिखा यह लेख बांग्लादेश के 13वें आम चुनाव में बीएनपी की जीत और उसके परिणामों पर केंद्रित है. खास तौर से इस बात का उल्लेख है कि नए शासक को अपने पिता जियाउर रहमान की तरह भारत से औपचारिक सम्मान के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ेगा, क्योंकि नरेंद्र मोदी की पूर्व-बधाई से भारत ने चुनाव प्रक्रिया की अखंडता को मान्यता दी है. यह बीएनपी की ऐतिहासिक भावना को भी स्वीकार करता है, जो 1971 में स्वतंत्रता घोषणा से जुड़ी है. हालांकि, भारत-बांग्लादेश संबंध जटिल हैं—भूमि, जल, व्यापार, विद्रोही, चीन-पाकिस्तान प्रभाव आदि कई स्तरों पर चलते हैं. हिंदुओं की हत्याएं सांप्रदायिक नफरत से कम, स्थानीय विवादों से ज्यादा लगती हैं.
सुनंदा ने बीबीसी पत्रकार मार्क टुली को याद करते हुए चुनाव को महत्वपूर्ण बताया है जिसमें 'जुलाई चार्टर' पर जनमत संग्रह भी शामिल था. बांग्लादेश के हिंदू अल्पसंख्यक (लगभग 8%, 1.3 करोड़) अब बीएनपी के पीछे खड़े होने को मजबूर हैं, क्योंकि अवामी लीग बाहर है और जमात-ए-इस्लामी स्वतंत्रता-विरोधी रही है. यह जुल्फिकार अली भुट्टो की 1971 की चेतावनी को दोहराता है कि बांग्ला पहले बंगाली है या मुस्लिम.
लेख भारत के मुस्लिमों की स्थिति की तुलना करता है, जहां ह्यूमन राइट्स वॉच ने बीजेपी की कट्टरता, मकानों की तोड़फोड़, लिंचिंग आदि की आलोचना की है. संविधान से 'धर्मनिरपेक्षता' हटाकर 'बहुलवाद' लाने की संभावना पर चर्चा है. लेखक की सलाह है कि भारत को कड़ी तटस्थता अपनानी चाहिए, क्योंकि बांग्लादेश अपना सबसे फायदेमंद रास्ता खुद तलाश रहा है. कोई भी बांग्लादेशी यह नहीं मान सकता कि दक्षिण एशिया में सिर्फ भारत मायने रखता है, जैसा शेख हसीना मानती थीं. चुनाव परिणाम को कैसे संभाला जाता है, उस पर बहुत कुछ निर्भर करता है—जनसंख्या विनिमय जैसी चरम संभावनाएँ भी खारिज नहीं की जा सकतीं.
ट्रेड डील: खोदा पहाड़ निकली चुहिया
पी. चिदंबरम ने जनसत्ता में लिखा है कि भारत-अमेरिका के बीच हाल ही में घोषित अंतरिम व्यापार समझौता कोई वास्तविक द्विपक्षीय व्यापार समझौता नहीं बल्कि एक खोखला और असमान ढांचे का दस्तावेज है. 6 फरवरी 2026 को जारी संयुक्त बयान में अमेरिका द्वारा पहले लगाए गए 25% अतिरिक्त शुल्क में कुछ राहत (जैसे 18% तक कम करना) देने की बात है, लेकिन यह भी सशर्त और सीमित है. इसमें भारत से अमेरिकी ऊर्जा, कृषि उत्पादों, विमान, हथियार आदि की भारी खरीद (500 अरब डॉलर तक) करने की अपेक्षा है, जबकि भारत के संवेदनशील क्षेत्रों जैसे कृषि, दवा और आईटी में अमेरिका से कोई ठोस रियायत नहीं मिलती.
चिदंबरम संयुक्त बयान को पारस्परिकता की कमी वाला बताते हुए चेतावनी देते हैं कि यदि भारत रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखता है या अन्य स्रोतों से आयात करता है, तो अमेरिका फिर से शुल्क बढ़ा सकता है, जिससे भारत की आर्थिक स्वतंत्रता और किसानों-उद्योगों के हित खतरे में पड़ जाएंगे.
लेखक इस समझौते को खोखला पहाड़ की उपमा देते हुए कहते हैं कि यह दिखावे में बड़ा लगता है, लेकिन वास्तव में अमेरिका के पक्ष में झुका हुआ है, जहां भारत को केवल सीमित और अस्थायी राहत मिलती है, जबकि अमेरिका अपनी महत्वपूर्ण वस्तुओं के निर्यात को बढ़ावा देता है. चिदंबरम सवाल उठाते हैं कि पारस्परिकता कहां है, भारत अमेरिकी उत्पादों पर समान शुल्क क्यों नहीं घटा सकता, और यह ढांचा भारत की उद्योग-कृषि नीतियों पर अमेरिकी दबाव बढ़ाएगा. चिदंबरम केंद्र सरकार की इस घोषणा को अतिरंजित बताते हुए आलोचना करते हैं और भारत को सतर्क रहने, राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने की सलाह देते हैं, क्योंकि लेखक के मुताबिक यह समझौता असल में भारत के लिए कोई बड़ी जीत नहीं, बल्कि अमेरिकी प्राथमिकताओं को मजबूत करने वाला कदम प्रतीत होता है.
सेक्सुअलिटी पर सोच बदलने की जरूरत
निष्ठा गौतम ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा है कि कि आधुनिक कामुकता (सेक्सुअलिटी) अक्सर संरचनात्मक असमानता और प्रभुत्व को दोहराती है, जिसे हम दबाने के बजाय प्रभुत्व से अलग करने की जरूरत है. कैथरीन मैककिनन के हवाले से वे कहती हैं कि सेक्सुअलिटी महिलावाद के लिए वही है जो मार्क्सवाद के लिए काम है—सबसे अपना, लेकिन सबसे ज्यादा छीना हुआ. आज के समय में पोर्नोग्राफी कामुकता की 'शिक्षक' बन गई है, जो युवा पुरुषों को पारस्परिकता की बजाय प्रभुत्व, तमाशा और अपमान से उत्तेजना जोड़ना सिखाती है. फ्रायड के 1912 के निबंध का जिक्र करते हुए वे बताती हैं कि जहां प्यार होता है, वहां इच्छा नहीं, और जहां इच्छा होती है, वहां प्यार नहीं—यह मानसिक विभाजन अब सांस्कृतिक पैटर्न बन चुका है.
निष्ठा लिखती हैं कि पोर्नोग्राफी में महिलाओं का अपमान और नीचा दिखाना मुख्य धारा बन गया है, जो न्यूरोसाइंस के अनुसार दोहराव से मस्तिष्क में उत्तेजना के रास्ते बनाता है.लेखिका एपस्टीन फाइल्स का उदाहरण देकर दिखाती हैं कि कैसे शक्तिशाली पुरुषों के लिए प्रभुत्व इच्छा से ऊपर है, और यह सामान्य लोगों में भी प्रतिबिंबित होता है.
समाजशास्त्री माइकल किमेल के अनुसार, पुरुषत्व अक्सर स्थिति के खतरे के जवाब में प्रदर्शन किया जाता है, और आर्थिक-सामाजिक बदलाव में कुछ पुरुष यौन प्रभुत्व से अपनी कमजोर शक्ति की भरपाई करते हैं. हालांकि, सभी पुरुष इच्छा को प्रभुत्व में नहीं बांधा जा सकता—इच्छा प्लास्टिक है. पोर्नोग्राफी से प्रेरित अंतरंगता अंधेरे को दिखाती है, लेकिन संस्कृति इसे पारस्परिकता और कोमलता की ओर पुनः प्रशिक्षित कर सकती है. अंत में वे पूछती हैं: क्या हम ऐसी कामुक जीवन की कल्पना कर सकते हैं जहां इच्छा और गरिमा दुश्मन न हों?
कामगारों को सशक्त बनाता है लेबर कोड
हिन्दू में आर मुकुंदन ने भारत की चार नई श्रम संहिताओं—वेज कोड, इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, सोशल सिक्योरिटी कोड और ओएसएच कोड—को श्रमिकों के सशक्तिकरण और वित्तीय सुरक्षा के लिए निर्णायक कदम बताया गया है. ये संहिताएँ पुरानी खंडित श्रम कानूनों को इकट्ठा कर आधुनिक, सरल और श्रमिक-केंद्रित ढांचा बनाती हैं, जो आर्थिक विकास के लाभों को अधिक न्यायपूर्ण तरीके से श्रमिकों तक पहुँचाती हैं. सबसे बड़ा सुधार मजदूरी की नई परिभाषा है: अब कुल पारिश्रमिक का कम से कम 50% मजदूरी माना जाएगा, जिससे पहले की प्रथा (केवल 30-35% बेसिक पे दिखाकर सामाजिक सुरक्षा योगदान कम करना) समाप्त हो जाएगी. इससे पीएफ, पेंशन और ग्रेच्युटी में योगदान बढ़ेगा. फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों को भी एक साल की सेवा के बाद ग्रेच्युटी का अधिकार मिलेगा.
आर मुकुंदन लिखते हैं कि अब गिग, प्लेटफॉर्म और असंगठित श्रमिकों को पहली बार औपचारिक मान्यता मिलती है, जिससे उन्हें बीमा, पीएफ, कल्याण योजनाएँ और लाभों की पोर्टेबिलिटी प्राप्त होगी. वेज कोड न्यूनतम मजदूरी, समय पर भुगतान, मनमानी कटौती पर रोक और पारदर्शिता सुनिश्चित करता है. ये बदलाव बड़े निगमों पर वित्तीय बोझ बढ़ाते हैं, लेकिन लेखक इसे सकारात्मक मानते हैं क्योंकि इससे श्रमिकों की क्रय शक्ति, उपभोग और बचत बढ़ेगी, जो अर्थव्यवस्था में मल्टीप्लायर प्रभाव पैदा करेगी.
ट्रेड यूनियनों की हड़तालों की आलोचना करते हुए वे कहते हैं कि विरोध अक्सर सुधारों के खिलाफ होता है. पुराने कानून जटिल थे; नई संहिताएँ अनुपालन आसान बनाती हैं. अंत में, लेखक इन्हें संरचनात्मक हस्तक्षेप बताते हैं जो पूंजी से श्रम की ओर मूल्य पुनर्वितरण को बढ़ावा देती हैं. सफल कार्यान्वयन से हर श्रमिक विकास कहानी का सक्रिय भागीदार बनेगा, जिससे वित्तीय गरिमा, सामाजिक न्याय और समावेशी विकास सुनिश्चित होगा.
नौकरियां खत्म कर रहा है एआई
जसप्रीत बिंद्रा ने टाइम्स ऑफ इंडिया में चेतावनी दी है कि एआई न केवल नौकरियाँ खत्म कर रहा है, बल्कि नौकरियाँ पाने के पारंपरिक तरीके को ही पूरी तरह तोड़ रहा है. लेख में हाइपरराइट के सीईओ मैट शुमर के वायरल पोस्ट का उदाहरण है, जहाँ GPT-5.3 कोडेक्स जैसे एआई एजेंट ने जटिल कोडिंग टास्क चार घंटे में पूरा किया और उसमें 'स्वाद' व 'निर्णय क्षमता' दिखाई—जो पहले केवल मानवीय विशेषता मानी जाती थी.
एआई अब सहायक उपकरण से आगे बढ़कर स्वतंत्र कार्यकर्ता बन चुका है. कोडिंग, कानूनी ड्राफ्टिंग, वित्तीय विश्लेषण जैसे काम अब मिनटों में हो जाते हैं. पारंपरिक व्हाइट-कॉलर कर्मचारियों के लिए यह बड़ा खतरा है. यदि आपकी वैल्यू सिर्फ 'करने' (doing) में है, तो एआई आपको अनावश्यक बना देता है.
बिंद्रा लिखते हैं कि एंथ्रोपिक के फाउंडर डारियो अमोदेई का अनुमान है कि पांच साल में आधी एंट्री-लेवल व्हाइट-कॉलर नौकरियाँ खत्म हो सकती हैं. लिंक्डइन के अनीश रमन कहते हैं कि 'नौकरी की सीढ़ी का निचला पायदान टूट रहा है'. भारत में दशकों पुराना मॉडल—स्कूल से इंजीनियरिंग/एमबीए, फिर जूनियर रोल्स से कॉर्पोरेट चढ़ाई—अब असफल हो रहा है. एआई जूनियर लेवल के काम (डिबगिंग, रिपोर्ट्स, डेटा एंट्री) सबसे अच्छा करता है, इसलिए कंपनियाँ नए लोगों को ट्रेन करने में निवेश नहीं करेंगी. लेखक युवाओं को सलाह देते हैं कि मानविकी (ह्यूमैनिटीज) को फिर से अपनाएँ. सवाल पूछने, नैतिकता, दर्शन और क्रिटिकल थिंकिंग सीखें, क्योंकि जवाब अब कमोडिटी हैं. कॉलेज में ही एआई को अपना अप्रेंटिस बनाकर मिड-लेवल स्किल्स हासिल करें और पोर्टफोलियो बनाएँ. उद्यमिता अपनाएँ—हर डिसरप्शन में नई कंपनियाँ शुरू करने का मौका है. एआई लिटरेसी को अपनाएँ—हर काम में एआई के साथ काम करना नई आवश्यकता है. लेखक सहमत हैं—पुरानी सीढ़ी चली गई है; अब नया प्रोफेशनल बनने का तरीका सीखने का समय है.
बाहर नहीं अंदर से है हिन्दू धर्म को खतरा
देवदत्त पटनायक ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि हिंदू धर्म का असली खतरा बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है—प्राचीन ब्राह्मणवादी शुद्धता-अशुद्धता की अवधारणा, जिसे अहिंसा ने मजबूत किया और अछूतपन को बनाए रखा. अहिंसा को हिंदू धर्म का सर्वोच्च गुण माना जाता है, लेकिन यह सामाजिक पदानुक्रम को नैतिक श्रेष्ठता के आवरण में छिपाती है. समकालीन भारत में अहिंसा दो रूपों में दिखती है: गांधीवादी अहिंसा (राजनीतिक रणनीति के रूप में, अब हिंदुत्व द्वारा कमजोरी मानी जाती है) और आहार अहिंसा (शाकाहार को नैतिक श्रेष्ठता का प्रतीक बनाना, जैन प्रभाव से प्रेरित).
लेखक बताते हैं कि शाकाहार हिंसा-मुक्त नहीं—कृषि में कीट-चूहों की हत्या, बैलों की कटाई और शूद्र किसानों की मेहनत छिपाई जाती है. वैदिक ग्रंथों, महाभारत और रामायण में मांसाहारी ऋषि और शिकारी हैं, लेकिन आधुनिक व्याख्या इसे नजरअंदाज करती है. शुद्धता का जुनून मंदिरों, कॉर्पोरेट कैंटीन, एयरलाइंस, तीर्थस्थलों, RSS और साबरमती आश्रम तक फैला है. गैर-शाकाहारी को अशुद्ध मानकर अपमान और प्रतिबंध (ऑफिस टिफिन, हाउसिंग सोसाइटी, पड़ोस) लगाए जाते हैं. जाति को अस्वीकार किया जाता है, लेकिन अछूतपन को जीवनशैली विकल्प के रूप में रीकोड किया जाता है.
आदिवासी समुदायों को हिंसक ठहराया जाता है, जबकि प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगपति सात्त्विक कहलाते हैं. अहिंसा हिंसा को समाप्त नहीं करती, बल्कि छिपाती है. जाति नकारी जाती है, लेकिन अछूतपन सावधानी से पुनर्कोड होता है. इससे सामाजिक प्रभुत्व आध्यात्मिक परिष्कार बन जाता है, जबकि असमानता पवित्र थाली पर बनी रहती है. यह ब्राह्मणवादी, बौद्ध-जैन प्रभाव और अभिजात आदतों का मिश्रण है, जो असमानता को चुनौती दिए बिना जारी रखता है.
