चीन है युद्ध का विजेता
इयान ब्रेमर हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखते हैं कि ईरान पर अमेरिका-इजरायल के युद्ध में सबसे बड़ा विजेता चीन है. पहले माना जाता था कि पश्चिम एशिया में तेल उत्पादक क्षेत्र में युद्ध चीन की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित करेगा, क्योंकि वह दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है. लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है. चीन ने इस युद्ध को बेहतर तरीके से झेला है. उसके पास पर्याप्त तेल भंडार, मजबूत रिफाइनिंग क्षमता, रूस से पाइपलाइन गैस और घरेलू उत्पादन है. कोयला और नवीकरणीय ऊर्जा के भंडार भी उसे सुरक्षा देते हैं.
ब्रेमर बताते हैं कि युद्ध के कारण हार्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान से तेल की कीमतें बढ़ी हैं, जिससे चीन की क्लीन टेक निर्यात (इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर, बैटरी) की मांग बढ़ेगी. इससे दीर्घकालिक रूप से तेल-गैस से दूर जाने की प्रक्रिया तेज होगी. रणनीतिक रूप से, युद्ध ने अमेरिकी सैन्य क्षमता को कमजोर किया है. अमेरिका के लंबी दूरी के मिसाइल और इंटरसेप्टर स्टॉक घट गए हैं. इनके पुनर्निर्माण में वर्षों लगेंगे, जिससे चीन पर निर्भरता बढ़ेगी — खासकर क्रिटिकल मिनरल्स के लिए. इससे ट्रंप का चीन के साथ बातचीत का दबदबा कमजोर होगा.
शी जिनपिंग ने सावधानी बरती है. उन्होंने न तो रूस को पूर्ण समर्थन दिया, न ही ट्रंप की ईरान बमबारी की निंदा की. बीजिंग ने युद्ध में सीधा हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाया है. चीन पश्चिम एशिया का सबसे बड़ा तेल खरीदार बना हुआ है और व्यापार तीन गुना बढ़ चुका है. चीन ने जोखिम से दूर रहकर लंबी अवधि की मजबूती हासिल की है. हालांकि, अगर युद्ध लंबा खिंचा तो कुछ जोखिम भी हैं. फिलहाल, चीन इस युद्ध के मुट्ठी भर विजेताओं में शामिल है.
चुनाव पर भारी पड़ने लगे हैं धनपति
विनीता एन. द्वारा द हिन्दू में संचालित इस चर्चा में एम.आर. माधवन और आर. रंगराजन चुनावों की बढ़ती लागत और लोकतंत्र पर इसके प्रभाव पर विचार रखते हैं. तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी के आगामी विधानसभा चुनावों के संदर्भ में लेखक चिंता जताते हैं कि चुनाव अब महंगे हो गए हैं. पार्टियां विज्ञापन, रैलियां, सोशल मीडिया और आउटरीच पर भारी खर्च कर रही हैं, जिससे धन की भूमिका निर्णायक हो गई है.
विनीती लिखती हैं कि आंकड़ों के अनुसार लोकसभा के लगभग 93% सांसद करोड़पति हैं. यह आंकड़ा राजनीतिक शक्ति तक पहुंच को असमान बना रहा है. बड़े दल और धनी उम्मीदवार आसानी से चुनाव लड़ सकते हैं, जबकि छोटी पार्टियां और स्वतंत्र उम्मीदवार पैसे के अभाव में पीछे रह जाते हैं. इससे लोकतंत्र का मूल सिद्धांत — समान अवसर — कमजोर हो रहा है.
लेखक चुनावी खर्च को पारदर्शी बनाने, चुनावी बॉन्ड जैसी व्यवस्थाओं की समीक्षा, खर्च की ऊपरी सीमा तय करने और छोटे दलों को राज्य वित्तीय सहायता देने जैसे सुधार सुझाते हैं. वे कहते हैं कि बिना सुधार के चुनाव “धनिकों का खेल” बनते जा रहे हैं, जहां उम्मीदवारों की योग्यता और विचारों से ज्यादा उनकी वित्तीय क्षमता मायने रखती है. निष्कर्ष में, दोनों विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर चुनावी प्रक्रिया को सस्ता, पारदर्शी और समावेशी नहीं बनाया गया तो भारत का लोकतंत्र धीरे-धीरे प्लूटोक्रेसी की ओर बढ़ सकता है. चुनावी सुधार अब अनिवार्य है, ताकि सच्चा प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके.
बीजेपी और कांग्रेस के नेतृत्व में आमने-सामने की लड़ाई
पी. चिदंबरम इंडियन एक्सप्रेस में लिखते हैं कि अप्रैल 2026 भारत की राजनीति के लिए बेहद रोचक समय साबित होने वाला है. 9, 23 और 29 अप्रैल को असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं. खासकर केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में पहली बार भाजपा ने लेफ्ट-ऑफ-सेन्टर दलों को सीधा चुनौती दी है. लेखक के अनुसार, इन तीनों राज्यों में मुख्य लड़ाई लेफ्ट-ऑफ-सेन्टर (यूडीएफ-एलडीएफ केरल, डीएमके गठबंधन तमिलनाडु, टीएमसी पश्चिम बंगाल) और राइट-ऑफ-सेन्टर (भाजपा) के बीच होगी. लेफ्ट-ऑफ-सेन्टर दल संविधान, संघवाद, सेकुलरिज्म, सामाजिक न्याय, मीडिया की स्वतंत्रता और समावेशी विकास में विश्वास रखते हैं. वहीं भाजपा हिंदुत्व, वैदिक परंपराओं, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, केंद्रवाद और “वन नेशन वन गवर्नमेंट” की विचारधारा पर चल रही है.
केरल: यूडीएफ और एलडीएफ के बीच 50 साल पुरानी सत्ता परस्पर वैकल्पिक बदलाव की परंपरा है. 2021 में एलडीएफ को दोबारा सत्ता मिली थी, लेकिन अब बदलाव की हवा है. बाढ़ और लैंडस्लाइड प्रबंधन में लापरवाही ने एलडीएफ को नुकसान पहुंचाया है. भाजपा के लिए केरल की जनता का “डीएनए” समझना मुश्किल है — एकांकड़े में सीटें मिलने की उम्मीद.
तमिलनाडु: डीएमके गठबंधन मजबूत है. एआईएडीएमके में दरारें हैं. भाजपा 27 सीटों पर लड़ रही है, लेकिन पिछले चुनावों की तरह ज्यादा असर नहीं दिखा रही. तमिलगा वेट्री कझगम (विजय) और नाम तमिझर काची वोट बांट सकते हैं, फिर भी डीएमके की वापसी संभावित. पश्चिम बंगाल: ममता बनर्जी बनाम मोदी-शाह. लड़ाई सांस्कृतिक और भावनात्मक स्तर पर पहुंच गई है. बंगाली गौरव, भाषा और सेकुलर परंपरा अगर बनी रही तो टीएमसी चौथी बार जीत सकती है. चिदंबरम का निष्कर्ष है कि इन चुनावों के नतीजे न सिर्फ राज्य स्तर पर, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डालेंगे — खासकर भाजपा की छवि पर, जो इन क्षेत्रों में “अजनबी” मानी जाती है.
समाज जैसा है वैसा ही देखने की चुनौती
डी. राजा ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है कि जोतिराव फुले की 200वीं जयंती उनके विचारों की प्रासंगिकता को मजबूत करती हैं. फुले ने भारतीय समाज में असमानता को वर्ग शोषण, जाति व्यवस्था और पितृसत्ता के आपस में जुड़े तंत्र के रूप में देखा था. ये अलग-अलग समस्याएं नहीं, बल्कि एक-दूसरे को मजबूत करने वाली व्यवस्थाएं हैं. फुले ने जाति व्यवस्था की विचारधारा पर हमला किया. उन्होंने इसे ईश्वरीय या प्राकृतिक नहीं माना, बल्कि ऐतिहासिक विजय और ज्ञान-पावर के एकाधिकार का परिणाम बताया. अपनी पुस्तक गुलामगिरी में उन्होंने शूद्रों और अति-शूद्रों की स्थिति को अमेरिकी दासों से जोड़ा. आज भी जाति भूमि, शिक्षा, रोजगार और सम्मान तक पहुंच तय करती है. दलितों पर अत्याचार जारी हैं, जबकि सांस्कृतिक एकता के नाम पर इन वास्तविकताओं को नजरअंदाज करने की कोशिश हो रही है.
डीराजा आगे लिखते हैं कि फुले ने केवल जाति तक सीमित नहीं रहकर आर्थिक शोषण पर भी ध्यान दिया. शेतकर्याचा आसूड़ में उन्होंने किसानों की दुर्दशा उजागर की. सावित्रीबाई फुले के साथ उन्होंने महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार खोले, जब समाज इसमें विरोधी था. आज भी पितृसत्ता, महिलाओं पर हिंसा और स्वायत्तता पर रोक जारी है.
लेखक चिंता जताते हैं कि वर्तमान में संवैधानिक मूल्यों (समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व) को कमजोर किया जा रहा है. सामाजिक न्याय की जगह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को प्राथमिकता दी जा रही है. आरएसएस-भाजपा से जुड़ी विचारधारा पदानुक्रम को सामान्य बनाती है. फुले की विरासत अम्बेडकर तक पहुंची, जिसने संविधान को आकार दिया. राजा का निष्कर्ष है कि आज फुले से जुड़ना राजनीतिक जरूरत है. यह शोषितों को केंद्र में रखने, समानता को पदानुक्रम से ऊपर रखने और न्याय को सामाजिक जीवन का आधार बनाने की परंपरा को पुनः प्राप्त करने का सवाल है. फुले हमें समाज को जैसा है, वैसा देखने की चुनौती देते हैं.
कूटनीति के केंद्र में पाकिस्तानी सेना
अदिति फडणीस ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत और सीजफायर के प्रयासों में पाकिस्तान की भूमिका दिखाई दे रही है, लेकिन असली ताकत प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ या विदेश मंत्री इशाक डार नहीं, बल्कि फील्ड मार्शल आसिम मुनीर हैं. पाकिस्तानी सेना ही इस पूरी कूटनीति के केंद्र में है. मुनीर पाकिस्तान के इतिहास के दूसरे फील्ड मार्शल हैं. वे चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (COAS) के साथ-साथ चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) भी हैं. 27वें संवैधानिक संशोधन के तहत उन्हें आजीवन सुरक्षा, न्यूक्लियर कमांड और पांच साल (2030 तक) का कार्यकाल मिला है. उन्हें हटाने के लिए दो-तिहाई बहुमत चाहिए, जबकि प्रधानमंत्री को साधारण बहुमत से हटाया जा सकता है.
अदिति जिक्र करती हैं कि किस तरह मुनीर का उदय हुआ — इमरान खान ने उन्हें ISI चीफ पद से हटाकर अपमानित किया था. शहबाज शरीफ के आने के बाद मुनीर को वापस सत्ता के शीर्ष पर लाया गया. उन्होंने अफगानिस्तान, मध्य एशिया, खाड़ी और ईरान नीति को पूरी तरह बदला. वे हाफिज-ए-कुरान हैं और सऊदी अरब में लंबा समय बिताकर इस्लामिक डिप्लोमेसी को नई दिशा दी है. पाकिस्तान-सऊदी सामरिक रक्षा समझौता भी उनका कमाल है.
2025 में गुलमर्ग हमले और भारत के ऑपरेशन सिंदूर के बाद मुनीर को फील्ड मार्शल बनाया गया. ट्रंप प्रशासन के साथ उनके संबंध इतने गहरे हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने उन्हें व्हाइट हाउस में निजी लंच दिया और कई बार उनकी तारीफ की. अब पाकिस्तान तुर्की की मदद से सोशल मीडिया पर खुद को “शांति दूत” के रूप में प्रोजेक्ट कर रहा है. भारत कम जोखिम-कम लाभ वाली नीति (SIP) पर चल रहा है, जबकि पाकिस्तान हाई रिस्क-हाई रिटर्न वाली वेंचर कैपिटलिस्ट शैली अपना रहा है.
वैश्विक संकट में राजसी दौरे
सुनंदा के. दत्ता-रे ने टेलीग्राफ में लिखा है कि वर्तमान वैश्विक संकट में राजसी दौरों का महत्वपूर्ण रोल है. वे कनाडा के संदर्भ में चर्चा करते हैं, जहां किंग चार्ल्स और क्वीन कैमिला का दौरा ट्रंप के कनाडा को “51वें राज्य” बनाने की धमकी के बीच हुआ. ट्रंप के ईरान-इजरायल संघर्ष में भूमिका, नेतन्याहू के साथ संबंध और सीजफायर की अनिश्चितता पर सवाल उठाते हुए लेखिका कहती हैं कि दोनों ही पक्ष (इजरायल और अमेरिका) समान रूप से दोषी हैं.
सुनंदा के दत्ता रे ने आगे लिखा है कि गाजा, वेस्ट बैंक, लेबनान और यमन में तनाव जारी है. ट्रंप की “पोम्प एंड पेजेंट्री” की चाहत और कनाडा पर दबाव के जवाब में प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने किंग चार्ल्स को संसद खोलने के लिए आमंत्रित किया, ताकि कनाडा की संप्रभुता और ब्रिटिश विरासत को रेखांकित किया जा सके. कनाडा में गणतंत्र बनाम राजतंत्र की बहस, क्यूबेक के अलगाववाद और मूल निवासियों (इनुइट) के ऐतिहासिक दर्द का भी उल्लेख है.
लेखक ब्रिटिश राजघराने की परंपरा की याद दिलाते हैं कि क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय ने भी संकट के समय अमेरिका का दौरा कर तनाव कम किया था. निष्कर्ष रूप में राजसी दौरों का मकसद उथल-पुथल शांत करना, संप्रभुता का प्रदर्शन करना और अस्थिर दुनिया में स्थिरता का संदेश देना होता है. किंग चार्ल्स का यह छोटा दौरा इसी “फाइन बैलेंस” का हिस्सा है — ट्रंप जैसे गणतंत्रवादी लेकिन राजसी भव्यता के शौकीन राष्ट्रपति को भी प्रभावित करने का प्रयास.
पश्चिम एशिया में आकार लेता नया शक्ति संतुलन
ज़ाग्रोस एंडेर्यारी (PJAK की विदेश नीति समिति के सदस्य) दटाइम्स ऑफ इंडिया में लिखते हैं कि इजरायल-अमेरिका गठबंधन और ईरान के बीच 40 दिनों तक चला युद्ध अब अस्थायी सीजफायर पर पहुंच गया है. यह युद्ध केवल सैन्य टकराव नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन को फिर से आकार देने वाला बड़ा खेल है. 19वीं सदी की तरह ईरान फिर से महाशक्तियों का केंद्र बन गया है. अमेरिका-इजरायल ने हवाई हमलों से ईरान की सैन्य, ऊर्जा और आर्थिक क्षमता को कमजोर किया है. उनका लक्ष्य ईरान को इजरायल के लिए खतरा बनने से रोकना है. ईरान ने भी सीजफायर के जरिए समय खरीदा है ताकि वह अपनी क्षमता को फिर से बहाल कर सके.
लेखक चेतावनी देते हैं कि अगर ज़मीनी युद्ध हुआ तो वह लंबा और थकाऊ होगा, जिससे ईरान की आंतरिक स्थिति और बिगड़ सकती है. युद्ध ने ईरान को भारी नुकसान पहुंचाया है. पुनर्निर्माण में वर्षों लगेंगे और आर्थिक निर्भरता बढ़ सकती है. लेखक का मानना है कि इस स्थिति में अमेरिका अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के जरिए ईरान के राजनीतिक भविष्य को प्रभावित कर सकता है. ईरान फिर से अमेरिका (दक्षिण), रूस (उत्तर) और चीन (पूर्व) के बीच प्रतिस्पर्धा का मैदान बन सकता है.
लेखक जोर देते हैं कि रेजिम चेंज की बजाय लोकतांत्रिक परिवर्तन ईरान के लिए सही रास्ता है. ईरानी जनता का यह युद्ध उनके हितों में नहीं है. “महिला, जीवन, स्वतंत्रता” आंदोलन के बाद ईरानी कुर्द सबसे संगठित विपक्षी ताकत बनकर उभरे हैं. हाल ही में छह प्रमुख कुर्द पार्टियों का गठबंधन हुआ है, जो लोकतंत्र, विकेंद्रीकरण और बहुलतावादी समाज के लिए महत्वपूर्ण है. ईरान का भविष्य “नए ग्रेट गेम” की बजाय लोकतांत्रिक बदलाव पर निर्भर करता है. कुर्द और अन्य प्रगतिशील ताकतों की एकता ही युद्ध के बाद के संकट से निपटने और लोकतांत्रिक ईरान बनाने की कुंजी है.
