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संडे व्यू: आधी सदी बाद भी ‘शोले’ का दबदबा, भारत के लिए अमेरिका-चीन चुनौतीपूर्ण

पढ़ें इस रविवार अतानु बिस्वास, विवेक मुखर्जी, रामचंद्र गुहा, अरुंधति रॉय, सुजान चेनॉय के विचारों का सार.

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आधी सदी के बाद भी पॉप कल्चर पर ‘शोले’ का दबदबा

अतानु बिस्वास ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि ‘शोले’ अपनी 50वीं वर्षगांठ पर नए संस्करण में पुनः रिलीज हुआ है. इसमें बिना सेंसर वाला अंत है जहां ठाकुर गब्बर को मारता है. यह पुनः रिलीज शोले की समयातीत अपील को दर्शाता है, जिसके संवाद (“ये हाथ हमको दे दो ठाकुर”) और किरदार (जय, वीरू, गब्बर) भारत की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं. आर.डी. बर्मन का साउंडट्रैक और वेस्टर्न-समुराई प्रभावों वाला कथानक आज भी प्रेरित करता है. शोले 2 की चर्चा रोमांचक मगर जोखिम भरी है.

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