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खोखले नारों और भाषा की सियासत में उलझकर रह गई हिंदी

कई ‘देशभक्त’ हिंदी का गुणगान करते मिल जाते हैं. यह अलग बात है कि उनके पास हिंदी को देने लिए कुछ नहीं होता है.

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संसदीय राजभाषा समिति के नौवें खंड की रिपोर्ट की सिफारिशों पर राष्ट्रपति का आदेश आते ही मीडिया विमर्श दो खेमों में बंट गया.

अपने को हिंदी-भक्त बताने वाले एक तबका ने यह दावा किया कि हिंदी को हिंदू और हिंदुस्तान से जोड़े बिना न तो सच्चा राष्ट्रवाद प्राप्त हो सकता है, न ही देश का डिजिटल विकास. इस वर्ग ने पुरजोर दलील दी कि यूं तो हिंदी में राष्ट्रभाषा बनने की एक अद्भुत प्राकृतिक क्षमता है, लेकिन चूंकि अभी तक देश में सच्ची देशभक्त सरकार नहीं आई है, इसलिए ये जिम्मेदारी भी अब मोदी सरकार को ही उठानी है.

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