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सरकारी दफ्तरों में काम नीति देखकर नहीं, बाबुओं की मर्जी से होता है

भारत को सशक्त नीतियों के साथ-साथ ऐसे मजबूत नीतिकारों की जरूरत है जो दफ्तरों में बाबू राज को तोड़ सकें.

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मैं काफी लंबे वक्त से कानूनी मसलों और पब्लिक पॉलिसी पर काम कर रहा हूं. इस दौरान एक चीज जो मुझे लगातार खटकती रही, वह है राजनीतिक प्रशासकों की तरफ से उचित सलाहों का न मिलना.

बड़े अधिकारी भी कई बार गलत दिशा में भटक जाते हैं, नतीजन गलत फैसले लिए जाते हैं. इससे पता चलता है कि सरकार में एकजुटता और इच्छाशक्ति की कमी है.

ज्यादातर सरकारी नीतियों में अधिकारियों की व्यक्तिगत राय और सीमित समझ दिखाई पड़ती है और फिर लागू होने के बाद ये नीतियां सरकार के खिलाफ ही चली जाती हैं.
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