एक खुले समाज की खूबसूरती यही है कि इसकी आजादी कट्टरपंथियों को शांत करती है. उन्हें जल्दी ही पता चल जाता है कि उनका छाती पीटने वाला भावनात्मक दिखावा न सिर्फ लोगों को लुभाने में नाकामयाब हो जाता है, बल्कि कुछ देर बाद मजाक का विषय भी बन जाता है.
पहले BJP जिसे एक सफलता के पक्के फॉर्मूले के तौर पर देख रही थी, अब वही फॉर्मूला उनके लिए फिसलन भरी जमीन में तब्दील हो गया है.
ऐसा ही कुछ RSS चीफ मोहन भागवत के भड़काऊ रुख को लेकर हुआ, जिन्होंने देश के युवाओं को भारत माता की जय बोलना सिखाने के अपने सुझाव पर यू टर्न ले लिया.
क्योंकि बलपूर्वक नियंत्रण, लोकतंत्र के खिलाफ है, तो भगवा ताकतों ने भी एक नारे को जबरदस्ती लोगों के गले में उतारने की अपनी कोशिशों के उलटे परिणामों के बारे में जरूर सोचा होगा.

