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रेत-समाधि: आश्चर्यजनक रूप से अनगढ़ माने जाने वाले शब्दों से गगनभेदी गाथा

Ret Samadhi आमजन की बेचैनी और छटपटाहट भी है और प्रतिरोध भी.

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“आवाज आई-

तुम्हारी आवाज ही क्यों?

मेरी क्यों नहीं?

अगर मेरी नहीं तो तेरी नहीं.

तेरी नहीं तो किसी की नहीं”

(इसी किताब से)

भाषा व शब्दों का भंडार अपनी जगह और साहित्य व संवेदना की समझ अपनी जगह. कहानियों के भीतर कहानी और विचार के भीतर विचार वाली पुस्तक ‘रेत समाधि’ में साहित्यिक समाधि लगानी होगी. डूबना होगा संवेदना और सरोकार के रेतीले-समन्दर में. और शायद इतना ही काफी है इस गाथाई सिसकियों और अकुलाहट को समझने के लिए.

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