"भारत को राष्ट्रपति की जरूरत क्यों है?" यह एक सुस्त और बार-बार दोहराया जाने वाले सवाल है. भले ही राष्ट्रपति को तत्कालीन सरकार द्वारा या बहुमत की इच्छा से भी अनुमोदित किया गया हो, लेकिन केवल राष्ट्रपति के पास ही संवैधानिक और प्रत्यक्ष तौर पर असंवैधानिक विशिष्टता या भावना के कृत्यों को रोकने की शक्ति है. देश के दोनों उच्च पदों, प्रधान मंत्री और राष्ट्रपति के बीच बारीक अंतर यही है कि प्रधान मंत्री से भारत के संविधान का 'पालन/सम्मान' करने की अपेक्षा की जाती है, जबकि भारत के संविधान की रक्षा की 'जिम्मेदारी/अधिकार' राष्ट्रपति को दी गई है. चाहे सुनने में यह कितना भी घिसा-पिटा लगे राष्ट्रपति संविधान का 'अंत:करण' रक्षक है, जबकि राष्ट्रीय कैबिनेट के मंत्रियों के 'प्रधान' को स्वाभाविक तौर पर पक्षपातपूर्ण और वैचारिक प्राथमिकता दी जाती है.
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भारत को पहली आदिवासी या पहला IAS राष्ट्रपति नहीं, संविधान को बचाने वाला चाहिए
President Election 2022 : सरकार असुरक्षित और सत्तावादी हो तो वो कमजोर व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाना चाहती है

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