मई के लगभग प्रारम्भ से ही भारत में गर्म हवाएं चलने लगती हैं. भौगोलिक दृष्टि से इन्हें ‘लू’ कहते हैं. निःसंदेह यह अत्यधिक गर्म और जनजीवन को प्रभावित करने वाली हवाएं होती है. फिर भी, दो साल पहले मई से पहले ही ‘लू’ से भी अधिक गर्म हवा चली थी. जी हां, दुनिया के कद्दावर नेताओं में शुमार नरेंद्र मोदी के नाम की हवा.
कांग्रेस के शासन से त्रस्त जनमानस को मोदी के रूप मे एक नई उम्मीद मिली. बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए ने स्पष्ट बहुमत पाया. इस स्पष्ट जनादेश ने मोदी सरकार को जनता की उम्मीदों का नया स्वरूप भी बताया. इस 26 मई को मोदी के शपथ ग्रहण के 2 वर्ष पूरे होने वाले हैं. निश्चित रूप से इसकी समीक्ष भी जरूरी है.
भ्रष्टाचार पर कसी लगाम
भ्रष्टाचार मुक्त भारत अभियान के साथ शुरुआत करने वाली मोदी सरकार ने निश्चित ही भ्रष्टाचार पर लगाम कसी है. कालेधन को वापस लाने मे सफल न होने के बावजूद इस दिशा में सरकार के प्रयास सराहनीय है. “न खाऊंगा, न खाने दूंगा” जैसे वक्तव्य भरोसा बहाल करते हैं और सरकार को आम आदमी से जोड़ते हैं.
मोदी सरकार ने अपनी रचनात्मक योजनाओं से प्रारम्भ में ही बढ़त बना ली थी.
प्रधानमंत्री जनधन योजना, मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, बेटी बचाओ–बेटी पढ़ाओ जैसी अनेक योजनाओं ने सरकार की रचनात्मक मनोदश को प्रस्तुत किया. ‘मन की बात’ से मोदी जी ने लोगों से प्रत्यक्ष संवाद स्थापित किया.
आरोपों का दिया करारा जवाब
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ऊपर लगे तमाम आरोपों का जवाब पूरी गंभीरता से दिया. चाहे विदेश यात्रा हो, सरकार के काम में संघ के हस्तक्षेप की बात हो, पार्टी के कुछ नेताओं का बड़बोलापन हो या हाल ही में पैदा किया गया डिग्री विवाद.
प्रधानमंत्री ने बड़ी कुशलता और संगठित ढंग से विवादों से अपना दामन साफ रखा. इससे न सिर्फ प्रधानमंत्री का कद बढ़ा, बल्कि युवाओं के साथ ही अन्य वर्गों पर उनका प्रभाव बढ़ा. प्रारम्भ में कांग्रेस ने सदन में आक्रामक रवैया अपनाया. समय के साथ राहुल गांधी के कमजोर नेतृत्व ने इसमें भी ठहराव पैदा किया.
हालांकि दिल्ली व बिहार में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया, फिर भी विपक्ष संगठित होकर दबाव बनाने मे नाकाम रही है. न तो राहुल अपनी नेतृत्व क्षमता साबित कर पा रहे हैं, न ही विपक्ष में कोई मोदी के समान कद का दिख रहा है.
असम में जीत से खिला कमल और पार्टी का चेहरा
हाल ही के चुनाव परिणाम भी मोदी सरकार के दो वर्षों की स्थिति स्पष्ट करते हैं. असम का स्पष्ट जनादेश और केरल में खाता खोलने से सरकार के पास विस्तार के अवसर होंगे.
- एक ओर असम की जीत दिल्ली और बिहार की हार के जख्मों पर मरहम का काम करेगी.
- दूसरी ओर आने वाले हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड चुनाव में पार्टी के पास मनोवैज्ञानिक बढ़त होगी.
- लगातार हार से कांग्रेस की आक्रामकता में कमी आएगी और राज्यसभा का समीकरण भी बदलेगा.
- निष्कर्ष के रूप में मोदी सरकार कुछ मोर्चों पर विफलता के बावजूद फिलहाल बढ़त बनाए हुए है.
- मोदी की कार्यशैली उन्हें अलग और प्रभावी बनती है.
कालेधन की समस्या के समाधान में देरी, दिल्ली और बिहार चुनाव की हार (इन दोनों राज्यों में चुनाव मोदी के नाम पर लड़ा गया था) मोदी की राह कठिन करते हैं. इनके बावजूद प्रभावशाली नीतियों, गंभीर नेतृत्व और रचनात्मक कार्यशैली से यह सरकार उम्मीद जगाती है.
सरकार के पास वायदों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त तीन वर्षों का होना उन्हें लाभ की स्थिति में रखता है. आने वाले राज्यों के चुनाव परिणाम मोदी सरकार की लोकप्रियता के लिए लिटमस टेस्ट जैसे होंगे.
(यह लेख बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र ने लिखा है और ये उनकी निजी राय है)
