और अब बारी है डिजिटल वीडियो डिस्क की, जिसे डीवीडी कहा जाता है, और कुछ दिन बाद कहा जाएगा एक थी डीवीडी. 1,999 में बेहतर क्वालिटी के जरिए ये डीवीडी सबका मनोरंजन कर रही थी और अब अपने अंत की ओर बढ़ रही है. वजह - डीवीडी कारोबार में कम होता फायदा.
मुंबई के लोकल रेलवे स्टेशन जैसे कि ग्रांट रोड, अंधेरी और फ्लोरा बिजनेस डिस्ट्रिक्ट पहले डीवीडी कारोबार के लिए जाने जाते थे लेकिन अब वहां पेन ड्राइव में फिल्में डालकर बेची जाती हैं जो कहीं किसी खटारे लैपटॉप पर चलती है.
लेकिन डीवीडी के जाने से ज्यादा हाय-तौबा नहीं मची है, दरअसल डीवीडी से हमें कभी ग्रामोफोन और रिकॉर्ड्स जितना प्यार हुआ ही नहीं. और न ही कभी वीडियो कैसेट और लेजर डिस्क से हमें ज्यादा प्यार हुआ.
अब हमारे मोहल्ले में मौजूद डीवीडी लाइब्रेरी, जो दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे शहरों में भी भारी तादाद में मौजूद थे, की कमी खल रही है. सिर्फ कुछ ही डीवीडी किराए पर देने वाले बचे हैं.
लेकिन कब तक?

