रात के दो हैं,
दूर-दूर जंगल में सियारों का हो-हो,
पास-पास आती हुई घहराती गूंजती
किसी रेल-गाड़ी के पहियों की आवाज!!
किसी अनपेक्षित
असंभव घटना का भयानक संदेह,
अचेतन प्रतीक्षा,
कहीं कोई रेल-एक्सीडेण्ट न हो जाए
कवि मुक्तिबोध की ये मशहूर पंक्तियां अचानक से मेरे दिमाई में उस समय कौंध गई जब में 2 जून की रात ओडिशा के बालासोर और भद्राक के बीच ट्रेन हादसे की खबर को पढ़ा. जाहिर सी बात है कि मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ इस ट्रेन हादसे की भविष्यवाणी नहीं कर रही थी . लेकिन इन पंक्तियों ने एक अलग तरह के ‘रेल-हादसे’के बारे में शंका जताई थी , खैर हम उस पर आगे बात करेंगे.

