जिनके परिवार के लोग मर गये, वह ‘ख़ुश’ हैं! जिनके यहाँ शादियाँ रुक गयीं, वह भी ‘ख़ुश’ हैं! और वह भी ‘ख़ुश’ हैं, जिनके पास इलाज के लिए पैसे नहीं हैं, जिनका काम-धन्धा, खेती-बाड़ी, रोज़ी-रोज़गार चौपट हुआ पड़ा है, जिन्हें रोटी जुगाड़ना दूभर हो रहा है, वह सब भी ‘ख़ुश’ हैं! सारा का सारा देश बैंकों की लाइन में दिनों और घंटों को बर्बाद कर ‘ख़ुश’ है!
जनता की यह 'अग्नि-परीक्षा'
नहीं, नहीं, मेरा सिर नहीं फिरा है. यह ख़ुशी की नयी परिभाषाएँ हैं, जो लिखी और बाँटी जा रही हैं. 'त्याग' की ऐसी अनन्त कथाओं का महाकाव्य यह देश रच रहा है और उस पर इतरा रहा है.
सही बात है! देश के जवान सीमा पर दुश्मनों को मिटाने के लिए मरते हैं, तो देश के नागरिक क्या काले धन को मिटाने के लिए नहीं मर सकते? पवित्र कार्य है, मरना चाहिए! कहा और अनकहा वक्तव्य यही है कि यह राष्ट्रहित का महायज्ञ है, आहुति सबको देनी ही चाहिए, देनी ही होगी! कहा जा रहा है कि इससे 'ईमानदारों' और 'बेईमानों' की पहचान हो जायेगी. यानी जनता की यह 'अग्नि-परीक्षा' है! खरा एक तरफ़, खोटा दूसरी तरफ़! जो खरे हैं, वह आग से हो कर सुरक्षित बाहर निकल जायेंगे, जो खोटे हैं, उन्हें तो 'भस्म' होना ही है!
पचास से ज़्यादा मौतें : न सरकार को अफ़सोस है, न बीजेपी को
इसीलिए पैसे न होने की हताशा में पचास से ज़्यादा मौतें हो जाने का न सरकार को अफ़सोस है, न बीजेपी को. न ही सड़कों पर कहीं कोई उबाल दिखता है. बल्कि लोग यानी बहुत-से लोग मानते हैं कि सत्तर साल पुरानी बीमारी को 'जड़ से ख़त्म' करने के लिए ऑपरेशन करना ज़रूरी था. और ऑपरेशन में तकलीफ़ तो होती है, इसलिए वह झेल रहे हैं. ईमानदारी की अपनी परीक्षा में वह क्यों फ़ेल हों भला?

