मानवता के खून से सने बिना नील ब्रिटेन नहीं पहुंचता”. यह प्रसिद्ध पंक्ति है यूरोपीय विद्वान ई. डब्लू. एल. टावर की. बिहार की तबाही की कहानी ऐतिहासिक है. और नील की खेती इस त्रासदी का एक अहम प्रस्थान बिंदु है. प्रसिद्ध सामाजिक इतिहासकार शाहिद अमीन ने अपने अन्य सहयोगियों के साथ हाल ही में एक किताब लिखी है-‘थम्ब प्रिंटेड: चंपारण इंडिगो पिज्न्ट्स स्पीक टू गांधी’
प्रथम दृष्टया मैं इसे पढ़ने से परहेज कर रहा था, सोचा यह बोझिल है, लेकिन जब मेरी अकादमिक निदेशिका और प्रसिद्ध मानवाधिकार लेखिका कल्पना कन्नाबीरन (CSD, दिल्ली) ने मुझे निर्देश दिया तो फिर इसे पढ़ा और समझा कि इसे नहीं पढ़े जाना एक बड़ी अकादमिक भूल होती.
