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बारिश तो पहले भी होती थी,फिर अब क्यों डूब जाती है मुंबई,ये है वजह

क्या आपने कभी सोचा है कि देश की आर्थिक राजधानी में हर साल मॉनसून में क्यों पानी का जमावड़ा हो जाता है?

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एक और मॉनसून, और मुंबई एक बार फिर पानी में डूब गई. क्या आपने कभी सोचा है कि देश की वाणिज्यिक राजधानी में हर साल मॉनसून में क्यों पानी का जमावड़ा हो जाता है? मुंबई में 300 से ज्यादा सालों से जोरदार बारिश और ऊंचे ज्वार-भाटा का रिकॉर्ड दर्ज है. इस दौरान बारिश की मात्रा में कोई बदलाव नहीं आया है. फिर ऐसा क्या बदलाव आया कि अब हर बारिश के बाद मुंबई में पानी जमा हो जाता है? प्रमुख कारणों में एक है तेज रफ्तार से हो रहा शहरीकरण, जिसने मुंबई को कंक्रीट जंगल में तब्दील कर दिया है.

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झीलों की नगरी बन गई कंक्रीट का शहर

मुंबई के ज्यादातर हिस्सों का नए सिरे से निर्माण किया गया है. लेकिन निर्माण करते वक्त कुछ बुनियादी आवश्यकताओं की अनदेखी की गई है. परेल के हिन्दमाता जैसे कई निचले इलाकों में भराव नहीं किया गया, जिससे उनका आकार एक गड्ढे के समान है, जो भारी बारिश में लबालब भर जाता है. (लोग भूल ही चुके हैं कि किसी जमाने में परेल में राज्यपाल निवास हुआ करता था, क्योंकि ये मुंबई के सबसे खूबसूरत इलाकों में एक था.)

इतने महत्त्वपूर्ण कारण को नजरंदाज करने की वजह तलाशना बेहद मुश्किल है. लेकिन इसकी एक वजह धन की कमी हो सकती है.

नतीजा ये है कि जब भी भारी बारिश होती है, ये इलाके पानी से सराबोर हो जाते हैं. शहर को नया आकार देने वाला अगला महत्त्वपूर्ण कारक है अंधाधुंध औद्योगीकरण, जिसके कारण वाणिज्यीकरण का जन्म हुआ. खासकर शहर के कई हिस्सों में टेक्सटाइल मिलों की भरमार है. यहां तक कि 10 साल पहले तक मुंबई में टेक्सटाइल की कम से कम 56 मिलें थीं. सभी मिलों में पानी जमा करने के लिए तालाब बना होता था. ये उपाय मिलों के निर्माण के लिए जमीन अधिग्रहण के समय ही कर लिया गया था. इसकी मुख्य वजह पाइप के जरिये पानी का बंदोबस्त करने से बचना था.

समस्या शुरू हुई, जब इन मिलों को वाणिज्यिक रूप दे दिया गया. टेक्सटाइल मिलों में हड़ताल के बहाने मिल बंद कर दिये गए. साथ ही नए निर्माण के लिए झीलों को भी भरने की अनुमति दे दी गई. धोबी तलाओ और मस्तान तलाओ जैसी झीलें प्राकृतिक जलाशय थीं. बारिश के दौरान जरूरत से ज्यादा पानी इन्हीं झीलों में जमा हो जाता था.

इन झीलों, जल निकायों, तालाबों और जलाशयों के भरने के कारण बारिश के दिनों में जरूरत से ज्यादा पानी के पास मुंबई के निचले इलाकों में जमा होने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा है.

अब अगर अधिकारी जरूरत से ज्यादा पानी निकालने के लिए पाइप लाइन बिछाएं भी, तो अंधाधुंध शहरीकरण के कारण सड़कों पर भारी जल जमाव होना आम बात है, जो पहले नहीं होता था. मुंबई की चौहद्दी 603.4 वर्ग किलोमीटर में फैली है. बारिश के दिनों इसका लगभग 50 फीसदी हिस्सा पानी में डूब जाता है. और अब तो बिल्डर हर वर्ग किलोमीटर पर निर्माण कर रहे हैं.

जरूरत से ज्यादा निर्माण के कारण पानी के जमीन के भीतर रिसाव होने की संभावना भी खत्म हो गई है. नतीजा ये है कि पानी सड़कों पर भर जाता है और बाढ़ जैसी हालत पैदा हो जाती है.

दीर्घकालीन उपाय लागू करना

हालात पर काबू पाने में अब भी देरी नहीं हुई है. शहरीकरण की योजना बनाने के कई सिद्धांत हैं. दुनियाभर में सालों से लागू किये जा रहे शहरीकरण के इन सिद्धांतों का अब भी पालन किया जा सकता है.

पहला सिद्धांत है कि अधिकारी 20 से 25 फीसदी क्षेत्र को हरियाली के रूप में विकसित करना अनिवार्य कर सकते हैं. बशर्ते कि ये हरियाली कृत्रिम बागीचे के बजाय सीधे जमीन पर विकसित की जाए.

इससे बारिश के पानी का जमीन के भीतर रिसाव हो सकेगा और भूजल स्तर भी बेहतर बना रहेगा. ये उपाय अब भी लागू किया जा सकता है.

अगला उपाय मिलों से होकर आपस में और दूर-दराज के इलाकों तक पानी की पाइपलाइन बिछाना हो सकता है. इस पाइपलाइन से तेज धार पानी पर काबू पाया जा सकता है. ये उपाय आज भी लागू किया जा सकता है, लेकिन इसकी ओर से लोग उदासीन हैं. इन उपायों को लागू करने में राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है, क्योंकि राजनीतिक पार्टियां बिल्डरों के प्रभाव में हैं. और जो भी राजनीतिक पार्टी सत्ता में आती है, वो बिल्डरों को खुश रखना चाहती है.

बचाव के लिए स्टॉर्मवाटर ड्रेनेज सिस्टम

एक और उपाय है, जिसका फायदा लम्बे समय तक मिल सकता है, और वो है, स्टॉर्मवाटर ड्रेनेज सिस्टम अपनी पूरी क्षमता के मुताबिक काम करे.

स्टॉर्मवाटर ड्रेन का संवर्धन किया गया है, जिनमें प्रति घंटे लगभग 50 मिलीमीटर तक बारिश का पानी को बहा ले जाने की क्षमता है.

लेकिन अगर हर घंटे 50 मिलीमीटर से अधिक बारिश हो, तो कोई उपाय नहीं है. ये संकेत है कि आपके स्टॉर्मवाटर ड्रेनेज सिस्टम में 50 मिलीमीटर से ज्यादा, और कम से कम 75-100 मिलीमीटर प्रति घंटे पानी बहाने की क्षमता होनी चाहिए. अगर ड्रेनेज की सफाई नहीं होती है या उनका खारापन दूर नहीं किया जाता, तो ये हादसा नहीं मानवीय गलती है.

अगर स्टॉर्मवाटर ड्रेनेज की क्षमता के अनुरूप बारिश होती है, तो निश्चित रूप से बाढ़ से बचा जा सकता है.

उदाहरण के लिए अगर ड्रेनेज की क्षमता प्रति घंटे 50 मिलीमीटर बारिश का पानी बहाने की है, तो इसे 10 घंटे में 500 मिलीमीटर पानी बहाना चाहिए. इस लिहाज से अगर 10 घंटे में 500 मिलीमीटर बारिश भी होती है, तो बाढ़ की हालत पैदा नहीं होनी चाहिए. अगर पानी का जमावड़ा हो भी जाता है, और स्टॉर्मवाटर ड्रेनेज सिस्टम सुचारू ढंग से काम कर रहा है, तो 10-15 मिनट में पानी बह जाना चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता है, तो निश्चित रूप से मशीनों के साथ समस्या है. अगर बारिश एक या दो घंटे में स्टॉर्मवाटर ड्रेनेज की क्षमता से अधिक हो रही है, तो पम्पिंग मशीनों की मदद से पानी का जमाव खत्म किया जा सकता है.

और अंत में ये सुनिश्चित करना जरूरी है कि सड़कों पर पानी न भरे. इसके लिए झीलों, छोटी नदियों, एस्चुअरी और दूसरे प्राकृतिक जलाशयों में प्राकृतिक रूप से जल बहाव की योजना होनी चाहिए. जमीन के भीतर भी पानी के रिसाव का बंदोबस्त होना चाहिए. ये भारी बारिश के पानी को अपने में समाने का प्राकृतिक साधन हैं.

इन सभी उपायों को एक साथ लागू कर बाढ़ का कहर कम से कम करना सुनिश्चित किया जा सकता है. पानी का जमाव हो भी गया तो इन उपायों की मदद से पानी 10-15 मिनट से ज्यादा समय तक जमा नहीं रहेगा.

जितना शहरीकरण, उतना जल जमाव?

जब आप मेट्रो जैसे यातायात के नए साधनों का निर्माण करते हैं, तो इससे पानी का जमाव ज्यादा होना तय है. ऐसे में पानी निकालने की व्यवस्था पर जरूर ध्यान देना चाहिए. दोनों एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए. कंक्रीट के नए निर्माण से मौजूदा स्टॉर्मवाटर ड्रेनेज प्रणाली पर भार और बढ़ेगा.

BRIMSTOWAD रिपोर्ट, चिताले कमेटी और गाडगिल कमेटी रिपोर्ट की सिफारिशों को जल्द लागू करने से शहर के हालात में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं, जिन्हें अब तक एक ‘रुकावट’ के तौर पर देखा जा रहा था.

आगामी तटीय सड़क परियोजना जमीन के आकार पर निर्भर नहीं करती. लिहाजा उनका सीधा असर पानी के जमाव पर नहीं पड़ेगा. लेकिन अगर इनके कारण मैनग्रोव्स को नष्ट करना पड़ता है, तो इसका सीधा असर पर्यावरण पर पड़ेगा.

(लेखक चन्द्रशेखर प्रभु एक आर्किटेक्ट और शहरी योजना के जानकार हैं. ये 1993-96 के बीच महाराष्ट्र हाउसिंग एंड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (NHADA) के अध्यक्ष थे. इसके अलावा 1982-93 तक मुंबई में SEEPZ (Santacruz Electronic Export Processing Zone) के भी अध्यक्ष थे. इस आर्टिकल में छपे विचार उनके अपने हैं. इसमें क्‍व‍िंट की सहमति जरूरी नहीं है.)

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