मन्नू जी (Mannu Bhandari) से आखिरी मुलाकात हंस के दफ्तर में हुई थी. उस समय वह न लिख पाने की गहरी टीस से जूझ रही थीं. अनेक कहानियां, उपन्यास उनके मन-मस्तिष्क में उमड़ रहे थे लेकिन कागजों तक आने में कोई बाधा थी, जिसे तोड़ने की कोशिश में वह खुद टूटती जा रही थीं. अपना दर्द, अपनी टीस को साथ लेकर वह हम सब से सदा के लिए विदा हो गईं.
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