इतिहास खुद को बहुत अजीब तरीके से दोहराता है, पूरे मणिपुर में फैले सांप्रदायिक दंगों को देखकर यह साफ हो गया है. दूसरे दंगों की तरह जो देश के अलग–अलग हिस्सों में समय-समय पर भड़कते रहते हैं, उससे अलग मणिपुर राज्य (Manipur) ने समय के साथ इन दंगों के लिए संस्थागत इको सिस्टम तैयार कर लिया है और इसे एक्टिव बनाए रखा है. भारत के प्रख्यात राजनीतिक विज्ञानी पॉल ब्रास इसे 'संस्थागत दंगा प्रणाली' बताते हैं.
हालांकि, इनमें एक बारीक फर्क है. भारत के दूसरे हिस्सों से उलट, मणिपुर में मौजूदा दंगे धार्मिक संघर्षों से नहीं भड़के हैं. यह राज्य के अति आक्रामक एकीकरणवादी प्रयासों और बहुसंख्यक मैतेई समुदाय की मानसिकता वाले समूह में आदिवासियों को मिलाने और अनुच्छेद 371C के तहत मिले अंतर-राज्य संवैधानिक प्रावधानों को भंग करने के कारण हुए हैं. 371C प्रावधान आदिवासियों को भूमि अधिकार और पहचान की रक्षा का अधिकार देता है, और इसे भंग किए जाने के कारण ही दंगा भड़का है.

