(मणिपुर संकट, शांति बहाली और न्याय सुनिश्चित करने में भारत की संसदीय संरचना की अकुशलता पर दो-भाग वाले कॉलम का यह दूसरा भाग है. पहला भाग यहां पढ़ें.)
मणिपुर जातीय हिंसा (Manipur ethnic violence) की आग में अब भी जल रहा है. अपने पहले कॉलम में मैंने दलील दी थी कि हमारी संसदीय प्रणाली की बुनियादी खामियों ने बड़े पैमाने पर, और व्यापक रूप से जातीय हिंसा को भड़काया है. ये खामियां क्या हैं- बहुसंख्यवादियों का निरंकुश शासन, सांप्रदायिक सरकारें, विधायी और कार्यकारी शक्तियों का घालमेल और नियंत्रण-संतुलन की कमी.
इन संवैधानिक खामियों ने देश में सभी सरकारों को सत्तावादी बनाया है, और वे समाज की विविधता की जरूरतों को पूरा करने में नाकाम रही हैं.

