केरल के एक मुस्लिम कपल ने, जिनकी सिर्फ बेटियां हैं, अपनी शादी को स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत री-रजिस्टर किया है ताकि अपनी बेटियों के प्रॉपर्टी के अधिकारों को बचा सकें. इस खबर के आने के बाद से ही इस्लामिक कानून की पेचीदगियों पर सवालिया निशान लगाए जाने लगे, क्यों ऐसा हुआ? इस्लामिक कानून में बेटियों के लिए उत्तराधिकार के क्या नियम हैं? इन सभी सवालों का जवाब इस आर्टिकल में आपको मिलेगा. भारतीय मुसलमानों की एक बड़ी आबादी से जुड़े उत्तराधिकार कानूनों को लेकर मौजूदा नासमझी और अति सरलीकरण पर भी रौशनी डाली जाएगी.
इस खबर ने कई सवालों को जन्म दिया. सबसे पहला, और बड़ा सवाल जो लोगों के लिए समझना मुश्किल है, वह यह है कि पहली नजर में, पर्सनल लॉ की कई अजीब व्यवस्थाओं के पीछे क्या तर्क हैं? दूसरा सवाल, कि इस्लामी कानून के भीतर ऐसे हालात से कैसे निपटा जाए? क्या देश के सामान्य कानून के तहत शादी को रजिस्टर/री-रजिस्टर करना ही ऐसे हालात से निपटने का इकलौता रास्ता है?

