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ये गोरक्षक नहीं हैं, हफ्ता वसूली और मांस का धंधा करते हैं

गोमाता की सेवा करने का दंभ भरने वाला ये दल आखिर कौन चला रहा है? बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार विवेक अवस्थी 

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अर्थशास्त्र जब धर्मशास्त्र के ऊपर चढ़ बैठता है तब गोरक्षा आंदोलन के नेता जूतों की दुकान खोल लेते हैं : हरिशंकर परसाई

अपने समय के सबसे बड़े व्यंगकार में से एक हरिशंकर परसाई जी ने जब ये पंक्ति लिखी थी तब शायद ही उन्हें अंदाजा होगा कि उनकी मौत के 21 साल बाद भी ये प्रासंगिक होगी.

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