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सेना और सोशल सर्विस: आर्मी को 'पक्षपातपूर्ण' कामों में घसीटने के क्या नतीजे होंगे?

सेना के मोटो 'स्वयं से पहले सेवा' को शायद ज्यों का त्यों मानने की गलती की जा रही है.

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क्या लोकतांत्रिक देशों में सेना के जवानों (Indian Army) को गैर पेशेवर कामों में जैसे सरकारी और सामाजिक नीतियों के प्रचार में लगाया जाना चाहिए ? क्या नागरिक-सामाजिक काम करने से सैनिकों के व्यवहार के अनुचित होने, या उनके अप्रभावी होने का खतरा नहीं पैदा होता? क्या ये सही भी है?

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