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बाइडेन युग में भारत-अमेरिका रिश्तों के नए पन्ने खुलेंगे  

बाइडेन प्रशासन के तहत भारत अमेरिका संबंधों को नए आयाम और मौके मिल सकते हैं.

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बाइडेन प्रशासन के तहत भारत -अमेरिका संबंधों को नए आयाम और मौके मिल सकते हैं. जब दोनों देशों के परस्पर संबंधों पर चर्चा होती है तो अक्सर इस बात पर ध्यान खिंचता है कि भारत चीन के प्रभुत्व का जवाब दे सकता है और इससे अमेरिका को क्यों फायदा होगा. बेशक चीन के साथ भूराजनैतिक प्रतिस्पर्धा अमेरिका और भारत, दोनों के लिए एक बड़ी चिंता है.

लेकिन चीन से जुड़ी कूटनीति के इतर भी अमेरिका और भारत के साझा हित हैं, जिसे सिर्फ सुरक्षा के परंपरागत दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए. दोनों देशों को बहुआयामी संबंधों को विकसित करना चाहिए. ऐसे संबंध जोकि बहुपक्षीयता, क्षेत्रीय मानवीय संकट, महामारी में राहत, और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में परस्पर सहयोग पर आधारित हों. इसी तरह भारत और अमेरिका के लोगों को फायदा होगा.

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यूं यह भारत और अमेरिका के लिए एक मुश्किल समय है. अमेरिका में पिछले चार सालों में समस्याएं जटिल और गहरी हुईं- वे समस्याएं जो काफी समय से खदबदा रही थीं. खासकर राजनैतिक ध्रुवीकरण और ढांचागत गैर बराबरी बढ़ी. इसके अलावा विश्व में अमेरिकी की प्रतिष्ठा भी गिरी. उसे अपने विश्वव्यापी दर्जे को हासिल करने में समय लगने वाला है. इसी बीच भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि भी आंतरिक दमन और लोकतांत्रिक मूल्यों के पतन के साथ धुंधली हुई है. इससे विश्व नेता बनने की उसकी कोशिशें बेअसर हुई हैं. संयोग से 2021 और इसके बाद भी दोनों देशों को विश्व मंच पर एक साथ काम करने का मौका मिलेगा, साथ ही अपने-अपने गुनाहों के पश्चाताप का सुयोग भी.

सुरक्षा परिषद में मिलेंगे भारत-अमेरिका को नए मौके

जनवरी 2021 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य के तौर पर अपने दो साल के कार्यकाल की शुरुआत की है. इसके जरिए उसे विश्व नेता बनने की अपनी क्षमता और इच्छा को दर्शाने का अवसर मिला है. इसी तरह बाइडेन प्रशासन को अमेरिकी नेतृत्व का सिक्का जमाने, बहुपक्षीयता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताने और सुरक्षा परिषद में अपने देश की भूमिका को दोबारा मजबूत करने के लिए काम करना चाहिए. दुनिया को ऐसे देशों की सचमुच जरूरत है जो नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए खड़े हो सकें. सुरक्षा परिषद में एक साथ काम करके भारत और अमेरिका संयुक्त रूप से दुनिया भर में मानव सुरक्षा की हिमायत कर सकते हैं.

रोहिंग्या संकट में अमेरिका दे सकता है भारत का साथ

भारत के अंगने में एक बड़ी परेशानी सिर उठा रही है. यह रोहिंग्या शरणार्थी संकट है जिस पर अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई और नेतृत्व की जरूरत है. हमारे अध्ययनों से पता चलता है कि म्यांमार सरकार ने कैसे गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन किए हैं जिनके चलते रोहिंग्या मुसलमानों को पड़ोसी देश बांग्लादेश पलायन करना पड़ा. नतीजा यह हुआ कि बांग्लादेश में नौ लाख रोहिंग्या शरणार्थी मौजूद हैं. लेकिन यह समस्या सिर्फ क्षेत्रीय नहीं. एक विश्वव्यापी आपदा है. इससे यह भी पता चलता है कि विश्व समुदाय में एक मानवीय संकट का निष्पक्ष और जिम्मेदार हल ढूंढने की बिल्कुल भी चाह नहीं है. वह इस हालत पर कितना बेपरवाह है. इस सिलसिले में भारत नेतृत्व संभाल सकता है, बशर्ते उसकी राजनैतिक इच्छा हो.

हम पहले भी दलील दे चुके हैं कि भारत को अपने पड़ोसी और मित्र बांग्लादेश की तरफ अपना हाथ बढ़ाना चाहिए और म्यांमार से अपील करनी चाहिए कि वह इस नरसंहार को रोके. अब चूंकि चीन म्यांमार का गहरा दोस्त है, भारत के बयान और कार्रवाई इन हालात को नहीं बदल सकते. लेकिन अगर अमेरिका इस संकट में भारत का साथ दे तो चीन के प्रभुत्व को कम किया जा सकता है और अंतरराष्ट्रीय मंच पर आवाज उठाई जा सकती है.

कोविड वैक्सीन के लिए भी सहयोग संभव

भारत ने हाल ही में विश्व में सबसे बड़ा कोविड वैक्सीनेशन अभियान शुरू किया है. विकासशील देशों में उसकी घरेलू वैक्सीन मैन्यूफैक्चरिंग और वितरण क्षमता सबसे अनूठी है. इसके साथ ही उसे अपनी देसी वैक्सीन की कार्यकुशलता से जुड़े संदेहों से भी जूझना पड़ रहा है. पारदर्शी डेटा के अभाव में, और अधूरे क्लिनिकल ट्रायल्स उसकी कोशिशों को कमजोर बना रहे हैं. दूसरी तरफ अमेरिका सार्वजनिक-निजी क्षेत्र की भागीदारी से तेजी से वैक्सीन बना रहा है. पर कोविड से निपटने में उसने बड़ी भारी गलतियां की हैं. तो, दोनों देशों के अनुभव और गलत कदम उन देशों के लिए मिसाल बन सकते हैं जो वैक्सीन सप्लाई के लिए संघर्ष कर रहे हैं. अगर भारत वैज्ञानिक प्रयोगों में पारदर्शिता दिखाए तो वह अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल (सीडीसी) के सहयोग से निम्न आय वाले देशों और दक्षिण एशिया में वैक्सीन मुहैय्या करा सकता है. बेशक, सीडीसी के पास बेहतरीन संसाधन हैं.

स्वच्छ ऊर्जा पर दोनों देशों को मिलकर ध्यान देना होगा

भारत के साथ जलवायु और स्वच्छ ऊर्जा अभियान में सहयोग करना ओबामा प्रशासन की प्राथमिकता थी. बाइडेन की टीम के लिए यह पहल बहुत जरूरी है, और भारत जो खुद जलवायु संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहा है, को इससे काफी फायदा होने वाला है. वैसे भी स्वच्छ ऊर्जा अभियानों को आगे बढ़ाने में दोनों देशों को घरेलू अवरोधों से जूझना पड़ रहा है. हालांकि यह पहल इस वक्त बहुत जरूरी है. इस क्षेत्र में सहयोगपरक

कार्रवाई से प्रगति होगी और रुकावट पैदा करने वाली कोशिशें नाकाम होंगी. इसलिए अमेरिका-भारत संबंधों में जलवायु सहयोग पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए. उदाहरण के लिए हाल ही में एशिया सोसाइटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों देश रीन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में निवेश पर काम कर सकते हैं, और अमेरिका इंटरनेशनल सोलर एलायंस को अपना समर्थन दे सकता है. यह सौर संसाधनों की प्रचुरता वाले देशों का एक संगठन है जिसकी कमान भारत के हाथ में है. ऐसे सहयोग से सिर्फ भारत और अमेरिका को ही नहीं, पूरी दुनिया को फायदा होगा.

खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग

2010 में अमेरिका और भारत ने साझा तकनीक के इस्तेमाल पर एक अभियान की शुरुआत की थी. इसमें विकासशील देशों में खाद्य सुरक्षा हासिल करने के लिए विशेषज्ञता प्राप्त करना भी शामिल था. दस सालों तक इस दिशा में कोई खास तरक्की नहीं हुई. अब दोनों देशों को इस तरह ध्यान खींचना चाहिए और इसमें सतत विकास को भी जोड़ना चाहिए. दस पहले भी यह उतना ही जरूरी था, जितना आज है. अमेरिका और भारत मिलकर यह काम कर सकते हैं. अगर कम विकसित देशों में दोनों इस दिशा में एक दूसरे का सहयोग करें, तो वे यह दर्शा सकते हैं कि द्विपक्षीय संबंधों का क्या असर हो सकता है.

बेशक बाइडेन प्रशासन को फिलहाल कई घरेलू मोर्चों पर अपनी ताकत झोंकनी होगी. महामारी पर शर्मनाक गलतियां, बहुत अधिक ध्रुवीकरण और घरेलू हिंसा का डर. इसी तरह भारत की आंतरिक समस्याएं भी जबरदस्त हैं. संघर्ष करती अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र की कद्र न करना. फिर भी दोनों देशों में बहुत कुछ एक जैसा है. न सिर्फ दोनों बड़े देश हैं, बल्कि उनमें गैर बराबरी गहरी जड़ जमाए हुए है. अब वक्त आ गया है कि इस रिश्ते का आधार मजबूत और उसकी पहुंच व्यापक बनाई जाए. ऐसा करने से चीन से भी मुकाबला किया जा सकता है. इसमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भारत-अमेरिका की भागीदारी से दोनों देशों के बाशिंदों का ही नहीं, पूरी दुनिया का हित होगा. पर यह दोनों के सहयोग से ही संभव है.

(बिदिशा बिस्वास वेस्टर्न वॉशिंगट में पॉलिटिकल साइंस की प्रोफेसर हैं. सुरक्षा, प्रवास और डायस्पोरा राजनीति पर लिखने वाली बिदिशा @Bee_the_Wonk पर ट्विट करती हैं. अनीश गोयल न्यू अमेरिका में सीनियर फेलो हैं और अमेरिका के डिफेंस डिपार्टमेंट में काम करते हैं. यह एक ओपनियन पीस है. यहां व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट का उनसे सहमत होना जरूरी नहीं है.)

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