ADVERTISEMENTREMOVE AD

संडे व्यू: युद्ध नहीं है क्रिकेट, AI का टेस्टिंग ग्राउंड है भारत

पढ़ें करन थापर, अमिताभ कांत, देवांशु दत्ता, प्रताप भानु मेहता, आनंद नीलकंठन और रामचंद्र गुहा के विचारों का सार

Published
story-hero-img
i
Aa
Aa
Small
Aa
Medium
Aa
Large

युद्ध नहीं है क्रिकेट

करन थापर ने हिन्दुस्तान टाइम्स में भारतीय क्रिकेट टीम के व्यवहार पर लिखे अपने लेख में बड़े सवाल उठाए हैं. विशेषकर कोलंबो में पिछले रविवार पाकिस्तानी टीम से हाथ न मिलाने को केंद्रीय विषय बनाया है. वे लिखते हैं कि क्रिकेट सज्जन का खेल है, जिसमें विरोधियों से हाथ मिलाना खेल की भावना का अभिन्न हिस्सा है. विरोधी दुश्मन नहीं, केवल प्रतिद्वंद्वी होते हैं.

हाथ न मिलाना इस भावना का उल्लंघन है और खेल को मात्र शारीरिक गतिविधि में बदल देता है. यदि राजनीतिक तनाव इतना है कि हाथ नहीं मिला सकते, तो खेलना ही नहीं चाहिए था. लेकिन खेलने के बाद ऐसा करना देश को निराश करना है. यह असभ्यता राष्ट्रवाद की कमजोरी दिखाती है, न कि ताकत.

थापर लिखते हैं कि भारत इतना मजबूत है कि कठिन समय में भी सही व्यवहार कर सकता है, लेकिन टीम ऐसा नहीं कर पाई. यह आत्मविश्वास की कमी को दर्शाता है.

यह पहली घटना नहीं, दुबई में भी ऐसा हुआ. लेकिन 1999 कारगिल युद्ध के दौरान वर्ल्ड कप में भारतीय टीम ने हाथ मिलाया था, बिना सैनिकों का अपमान किए. चेन्नई टेस्ट में पाकिस्तान की जीत पर भारतीय दर्शकों का स्टैंडिंग ओवेशन भारत की उदारता का प्रतीक था.

हर्षा भोगले ने इसे दुनिया का सर्वश्रेष्ठ नजारा कहा. दुखद है कि अब टीम ने खेल में जीत दिखाई, लेकिन क्रिकेट की भावना को समझने में असफल रही. वे बेहतर खिलाड़ी हैं, लेकिन सज्जन नहीं साबित हुए. लेखक निष्कर्ष निकालते हैं कि क्रिकेट युद्ध नहीं, बल्कि अपनी आचार संहिता वाला खेल है, जिसका सम्मान करना चाहिए.

ADVERTISEMENTREMOVE AD

AI के लिए भारत टेस्टिंग ग्राउंड

अमिताभ कांत ने टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा है कि भारत की डेटा उत्पादन और उपभोग क्षमता एआई के विकास के लिए बड़ा अवसर है. भारत को दुनिया का सबसे बड़ा डेटा उत्पादक और उपभोक्ता बताते हुए वे लिखते हैं कि यहां लाखों-करोड़ों यूजर्स रोजाना फाइनेंस, कॉमर्स, हेल्थ, एजुकेशन, मोबिलिटी और गवर्नेंस जैसे प्लेटफॉर्म्स पर इंटरैक्ट करते हैं.

ये डेटा फ्लो नियंत्रित लैब्स के बजाय वास्तविक परिस्थितियों से आते हैं. इनमें विविध आय स्तर, भूगोल, भाषाएँ और इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौतियां होती हैं. लिहाजा भारत में ट्रेन और डिप्लॉय की गई एआई सिस्टम्स को इन सभी विविधताओं में काम करना पड़ता है. जो समाधान भारत में सफल होते हैं, वे स्वाभाविक रूप से लचीले और पचा जाने योग्य होती हैं.

लेखक का मुख्य तर्क है कि भारत जैसी जटिल और विविध परिस्थितियों में काम करने वाली एआई टेक्नोलॉजी वैश्विक स्तर पर प्रयोग के लायक होती हैं. जो प्रयोग भारत में सफल है वह विश्व में निश्चित रूप से सफल होगी चाहे प्रयोग का आधार और आकार कुछ भी क्यों न हो.

भारत में सफल एआई सॉल्यूशंस दुनिया भर में प्रभावी साबित होंगी, क्योंकि वे सबसे कठिन टेस्ट पास कर चुकी होती हैं. विविधता, कम इंफ्रा और बहुभाषी फील्ड में हुए ये टेस्ट अहम हो जाते हैं. यह विचार भारत की डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की सफलता से भी जुड़ता है, जो ओपन और इंटरऑपरेबल मॉडल्स पर आधारित है.

लेखक सुझाव देते हैं कि एआई को भी इसी तरह पब्लिक इंफ्रा की तरह डिजाइन करना चाहिए—सुलभ, सस्ता और जवाबदेह—ताकि वैश्विक असमानता न बढ़े. कुल मिलाकर, लेख भारत की चुनौतियों को एआई इनोवेशन के लिए स्ट्रेंथ बताता है- भारत में सफल, तो दुनिया में सफल.

AI समिट से उपजे सवाल

देवांशु दत्ता ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि एआई इम्पैक्ट समिट का उद्देश्य उभरते भारत को प्रदर्शित करना था. देश अपनी संगठन क्षमता और वर्तमान समय के सबसे चर्चित उद्योग—एआई—में योगदान दिखाना चाहता था. समिट में मोबाइल फोन प्रतिबंध की शिकायतें आईं. हजारों प्रतिनिधि और आगंतुकों ने शिकायत की कि वेन्यू में मोबाइल नहीं ले जाने दिए गए, जिससे सामान्य संचार बाधित हुआ.

हालांकि, पिछले कुछ समिटों (जैसे G20) में ऐसा नहीं था—लोग आसानी से मोबाइल लेकर प्रवेश कर पाते थे. लेकिन समिट की सबसे चर्चित खबर गलगोटिया विश्वविद्यालय की प्रस्तुति रही. विश्वविद्यालय ने एक चीनी रोबोडॉग को अपनी एआई-संचालित रचना बताकर पेश किया, जिसे कथित रूप से 39 मिलियन डॉलर के R&D बजट पर विकसित किया गया था.

देवांशु लिखते हैं कि गलगोटिया वाली घटना विशेष रूप से उल्लेखनीय रहेगी क्योंकि यह गोल्ड रश और तकनीकी सफलताओं के इतिहास से जुड़ती है जहां उत्साह में धोखाधड़ी या अतिशयोक्ति आम रही है. यदि वाकई इतनी राशि जुटाई और खर्च की गई, तो निवेशकों को जानना चाहिए कि पैसा कहां गया.

गहनता से देखा जाए तो एक कथित शीर्ष निजी विश्वविद्यालय से ऐसी उच्च-प्रोफाइल घटना भारत में एआई के क्षेत्र में रिसर्च व अनुसंधान की गुणवत्ता पर गंभीर संदेह पैदा करती है. यह निवेशकों के विश्वास को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है.

समिट में बड़े निवेश वादे (250 बिलियन डॉलर से अधिक) और दिल्ली घोषणा पर सहमति जैसे सकारात्मक पहलू थे, लेकिन ये विवाद भारत की एआई महत्वाकांक्षाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं. एआई में निवेश करते समय सावधानी बरतनी चाहिए—क्योंकि तेज उत्साह में पारदर्शिता, अखंडता और वास्तविक नवाचार की कमी घातक साबित हो सकती है.

वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था बदल रहा है एआई

प्रताप भानु मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने लेख में वैश्वीकरण विरोध के आर्थिक कारणों पर केंद्रित दो सिद्धांतों की चर्चा की है. पहला सिद्धांत वितरण संघर्ष पर है—नौकरियों का नुकसान, असमानता, मजदूरी ठहराव और सांस्कृतिक डर. वैश्वीकरण ने कुल लाभ दिए लेकिन हारने वालों को संरक्षण नहीं दिया, इसलिए राजनीति में कल्याण राज्य मजबूत करने और बाजारों को सामाजिक रूप से अंतर्निहित रखने की असफलता जिम्मेदार है.

राज्य-पूंजी संबंधों में कोई मूलभूत बदलाव नहीं. दूसरा, अधिक संरचनात्मक सिद्धांत कहता है कि विरोध पूंजीवाद में गहरा परिवर्तन दर्शाता है, जहां एआई जैसी तकनीक ने पूंजी के हित बदल दिए हैं. पुराना वैश्वीकरण मॉडल—भौगोलिक वितरण, मजदूरी में अंतर का फायदा, आपूर्ति श्रृंखला में अवरोध —कम आकर्षक हो गया है.

मेहता लिखते हैं कि कृत्रिम बौद्धिकता यानी एआई पूंजी-गहन है. इसमें विशाल कम्प्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा और विशेष प्रतिभा की जरूरत है. एपल, गूगल जैसी प्रमुख कंपनियां अब हल्के प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर-आधारित एकाधिकार हैं.

डेटा सेंटर आदि स्थानीय बंधन पैदा करते हैं. एआई बाजार और प्रशासन के बीच भेद मिटाता है: सूचना मूल्य बन जाती है, एल्गोरिदम व्यक्तिगत नियंत्रण देते हैं. इससे राज्य-पूंजी का गहरा सहजीवन उभरता है—पूंजी डेटा लेती है, राज्य निगरानी पाता है.

उपभोक्ता सेवा और नागरिक निगरानी एक हो जाते हैं. वैश्वीकरण का विरोध असमानता से नहीं, बल्कि एआई द्वारा राज्य-पूंजी संरेखण की नई जरूरत से है. यह बाजारों का समाज में पुनः अंतर्निहित होना नहीं, बल्कि पूंजी का राज्य में पुनः अंतर्निहित होना है. लेख एआई के संस्थागत प्रभावों पर जोर देता है, जो वैश्विक राजनीति-आर्थिक व्यवस्था बदल रहे हैं.

ADVERTISEMENTREMOVE AD

एआई को मानव केंद्रित टूल बनाने की जरूरत

आनंद नीलकंठन ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में एआई के प्रति प्राचीन भय की तुलना असुरों की मायावी रचनाओं से की है. आज टेक भविष्यवक्ता एआई को सफेद कॉलर नौकरियों, कला और इंजीनियरिंग के लिए खतरा बता रहे हैं, लेकिन लेखक इसे सन् 2000 के डॉट-कॉम बबल से जोड़ते हैं जहां हाइप और पूर्व-निवारक डाउनसाइजिंग आम हैं.

वास्तव में, कोई पूर्ण एआई-निर्मित फीचर फिल्म या जटिल उत्पाद व्यावसायिक रूप से सफल नहीं हुआ. एआई-जनरेटेड विज्ञापनों में तकनीकी चमत्कार है, लेकिन “प्राण” गायब है. इसमें समृद्धि, जटिलता और आत्मा की कमी साफ दिखती है.

मानवीय रचनात्मकता अपूरणीय है क्योंकि यह कमजोरी, इतिहास और भावनाओं से उपजती है; एआई पैटर्न पहचानता है लेकिन “महसूस” नहीं करता. एआई का असली खतरा “मॉडल कोलैप्स” है—एआई-जनरेटेड डेटा पर ट्रेनिंग से डिजिटल इनब्रीडिंग, हैलुसिनेशन और प्रॉम्प्टर को खुश करने की प्रवृत्ति से गुणवत्ता घट रही है.

डॉट-कॉम बबल फूटा, लेकिन इंफ्रा ने भारतीय आईटी क्रांति दी. एआई भी धीरे-धीरे बदलेगा—तेज आएगा, धीमे बसेगा. आशा मानव की आंखों में है, जो अंतिम न्यायाधीश है. एआई सोच का विकल्प नहीं, नया व्याकरण है. यह साधारण काम सुलझाता है लेकिन रचनात्मकता को चोट भी पहुंचाता है.

भारत के लिए अवसर है: एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में केंद्र में हैं. एआई साक्षरता को कक्षा 3 से लागू किया जाना चाहिए—प्रॉम्प्टिंग और डिबगिंग सिखाना. इससे किसान, बुनकर, फिल्ममेकर लाभान्वित होंगे. एआई को मानव-केंद्रित टूल बनाने की आवश्यकता है.

गुरु नहीं मेंटर बनें

रामचंद्र गुहा का टेलीग्राफ में प्रकाशित यह लेख भारत में बौद्धिक संस्कृति की एक महत्वपूर्ण आलोचना प्रस्तुत करता है. वे लिखते हैं कि आध्यात्मिक मार्ग में गुरु-शिष्य संबंध आवश्यक है, जहाँ शिष्य गुरु का अंधानुकरण करता है. लेकिन विद्वत्तापूर्ण खोज के लिए गुरु की तलाश हानिकारक है, क्योंकि शोध के लिए स्वतंत्र चिंतन, आलोचनात्मक जांच और मौलिकता जरूरी है.

दुर्भाग्य से, भारत की अकादमिक संस्कृति सामंती बनी हुई है—वरिष्ठ और उच्च पद वाले लोग खुद को गुरु मानते हैं और अधीनस्थों से आज्ञाकारिता व श्रद्धा की अपेक्षा करते हैं. यह प्रवृत्ति विज्ञान और मानविकी दोनों में, सभी वैचारिक धाराओं में व्याप्त है.

गुहा का मानना है कि युवा शोधकर्ताओं को एकल गुरु नहीं, बल्कि अनुभवी विद्वानों से मार्गदर्शन, सलाह और आलोचनात्मक फीडबैक लेना चाहिए—वे मेंटर हो सकते हैं, गुरु नहीं.

अंतिम निर्णय शोध समस्या और विधि पर शोधकर्ता का ही होना चाहिए. पारिस्थितिकीविद् माधव गाडगिल और समाजशास्त्री आंद्रे बेटेल के संदर्भ में अपने अनुभवों को लेखक व्यक्त करते हैं, जो उनके युवाकाल के सबसे प्रभावशाली गुरु ही नहीं, बल्कि मित्र और मार्गदर्शक भी थे. दोनों अंतःविषयी, सैद्धांतिक व अनुभवजन्य शोध करने वाले, शिक्षण-संस्था निर्माण में समर्पित, जन-सुलभ लेखन करने वाले, पैन-इंडियन व अंतरराष्ट्रीयवादी, भारत में रहकर योगदान देने वाले देशभक्त थे—बिना प्रदर्शन के.

वे असमानताओं पर शर्म महसूस करते थे और कभी गुरु बनने की इच्छा नहीं रखते थे. लेखक निष्कर्ष निकालते हैं कि सच्चा शोध पारस्परिक सीखने, संवाद और विभिन्न पीढ़ियों के आदान-प्रदान से आगे बढ़ता है, न कि एकतरफा आज्ञाकारिता से. उन्होंने खुद गाडगिल-बेटेल से यह सीखा और अब युवाओं से भी सीखते रहते हैं.

Speaking truth to power requires allies like you.
Become a Member
Monthly
6-Monthly
Annual
Check Member Benefits
×
×