सदियों से अगर किसी समाज ने लगातार मुश्किलों और अन्याय का सामना किया है, फिर भी धीरज बनाए रखा है और हास्य बोध भी, तो वे रूसी लोग हैं. वे सबसे स्वाभिमानी लोग हैं, कम से कम इस लेखक ने इस विशाल देश में अपने सेवा काल के दौरान यही एहसास किया है. यह देश दो महाद्वीपों में और ग्यारह टाइम जोन्स में फैला हुआ है. वहां प्राकृतिक संसाधन बड़ी मात्रा में मौजूद हैं. वह न्यूक्लियर, स्पेस और सैन्य ताकत वाला देश है, साथ ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य भी है.
फिर भी रूस कुछ हद तक भटक रहा है. 1991 में USSR के विघटन के बाद रूस अपनी पहचान के संकट से जूझ रहा है.
विघटन के बाद पश्चिम ने उससे किनारा कर लिया. उसे बराबर निशाना बनाता रहा. इसके चलते रूस का असर धीरे-धीरे कम हुआ है और घेरेबंदी की भावना भी. उसे 1998 में जी7 समूह का हिस्सा बनने का न्योता दिया गया पर 2014 में बाहर निकाल दिया गया. आखिरी दांव था, यूरोपीय संघ (ईयू) और नाटो का यूक्रेन के करीब आना. इसके बाद कीव ईयू का ‘प्रायॉरिटी पार्टनर’ और नाटो का ‘एनहांस्ड ऑपरचुनिटी पार्टनर’ बन गया. नतीजा यह हुआ कि परेशान और अलग थलग पड़े रूस ने चीन के गलबहियां डाल दीं और उसके समर्थन में खड़ा हो गया.
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