सियाचिन ग्लेशियर में अपने कार्यकाल के बाद में मैं 1995 में पूर्वी लद्दाख के दरबुक के पास तंगसे में गढ़वाल राइफल्स को कमांड कर रहा था. मेरी टुकड़ी पैंगोंग त्सो के शुरुआती बिंदु लुकुंग और और चुरशुल में तैनात थी. सर्दियां उतरने के बाद अप्रैल 1996 में मुझे एक जरूरी काम के लिए लेह जाना था. बर्फीले पहाड़ के गिरने की चेतावनी और भारी बर्फबारी की वजह से पूर्वी लद्दाख के प्रवेश द्वार चांग ला को बंद कर दिया गया था. इसलिए मैंने ड्राइव करके चुरशुल और दुंगती होते हुए, फिर इंडस हाईवे पकड़कर लेह जाने का जोखिम उठाया. वैसे उन परिस्थितियों में इसे कोई भी मूर्खतापूर्ण और जोखिम भरा साहस कह सकता है.
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भारतीय सेना से बर्फीले मौसम में पंगा लेना चीन को पड़ सकता है भारी
सियाचिन में दिलेरी दिखा चुकी भारतीय सेना के लिए लद्दाख कोई मुश्किल जगह नहीं है.

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