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भारत '5वीं सबसे बड़ी इकनॉमी' तो बना, लेकिन टॉप देशों से तुलना पर सच सामने आता है

1990 के दशक के बाद से भारत में कृषि, मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र पिछड़ गए, सेवा क्षेत्र में विकास हुआ

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कुछ महीने पहले, सितंबर 2022 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने घोषणा की थी कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने दुनिया में “पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था” बनकर यूके को भी पछाड़ दिया है. 3.535 ट्रिलियन डॉलर की मौजूदा जीडीपी के साथ, भारत 2022 की दूसरी तिमाही में आगे निकल गया है.

सरकार ने देश के इस नए हालात का खूब प्रचार किया और सोशल मीडिया पर इसे “असाधारण उपलब्धि” बताकर ढोल पीटे गए. भारत की केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस आंकड़े पर जोर दिया कि भारत केवल एक दशक में 11वीं पायदान से पांचवीं पायदान पर पहुंच गया है, और "भारतीयों को इसका श्रेय लेना चाहिए और इस पर गर्व करना चाहिए."

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हालांकि इस पर बहस की जा सकती है कि भारत के लिए पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का तमगा, क्या मायने रखता है, जैसा कि IMF ने अनुमान लगाया है. यूं भारत के विकास की तुलना अक्सर संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, जर्मनी और जापान जैसे देशों के साथ की जाती है. इस तथ्य के बावजूद कि उनमें से हरेक देश ने अपने नागरिकों की जिंदगी में सुधार के लिए भारत से बेहतर काम किया है और वे देश मानव क्षमता वृद्धि के मोर्चे पर भी भारत से ज्यादा 'विकसित' हैं. मार्था नुसबौम और अमर्त्य सेन भी यही दलील देते हैं.

भारत के विकास की तस्वीर

फिर भी बड़े पैमाने पर उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं में भारत का स्थान चीन के बाद दूसरे नंबर पर आता है, खासकर पिछले तीन दशकों के दौरान मैक्रो-इकनॉमिक परिदृश्य में दर्ज विकास को देखते हुए.

इस लेख को सेंटर फॉर न्यू इकनॉमिक्स स्टडीज़ (CNES) के रिसर्च एनालिसिस के आधार पर तैयार किया गया है. यह एनालिसिस टीम इंफोस्फेयर ने किया है. इसमें पिछले तीन दशकों में भारत के विकास का विश्लेषण किया गया है और मैन्यूफैक्चरिंग, सेवा, बैंकिंग इत्यादि क्षेत्रों में भारत के आर्थिक विकास की तुलना दूसरी औद्योगिक विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ की गई है. हम यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत के विकास में किन क्षेत्रों ने अपना योगदान दिया और किन क्षेत्रों ने कोई योगदान नहीं दिया.  

1990 के दशक के बाद के सुधार: कृषि, मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र पिछड़ गए

1990 के दशक से भारतीय अर्थव्यवस्था के मैक्रो-प्रदर्शन का विश्लेषण करते वक्त, उसके दो हिस्सों का विश्लेषण किया जाता है. उसका आय पक्ष और व्यय पक्ष. इस उपखंड में हम यह देख रहे हैं कि इन मोर्चों पर भारतीय इकनॉमी ने कैसा प्रदर्शन किया है.

जब हम सकल घरेलू उत्पाद के आय के घटकों को देखते हैं, तो हम पाते हैं कि सेवा क्षेत्र में 1990 के दशक के बाद से सबसे ज्यादा वृद्धि हुई है जिसकी दर 2020 में 15% रही. इस क्षेत्र में रोजगार और निवेश बढ़े. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भी इजाफा हुआ.

दूसरी तरफ आकार और वृद्धि दर के लिहाज से कृषि और मैन्यूफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों के प्रदर्शनों में गिरावट हुई है. मैन्यूफैक्चरिंग और कृषि क्षेत्रों में नकारात्मक विकास दर है (यहां दर -1.5% है) जोकि दर्शाता है कि कैसे जीडीपी में इन घटकों का हिस्सा संकुचित हुआ है.

यह प्रवृत्ति 'संरचनात्मक परिवर्तन के सिद्धांत' से भिन्न है (यानी कृषि से मैन्यूफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र में खिसकते विकास पर चर्चा करते समय यह तर्क दिया जाता है कि कोई देश विकास के एक चरण से दूसरे चरण में प्रवेश करता है).

आम तौर पर, जब देश तेजी से विकास करते हैं, तो हम देखते हैं कि कृषि क्षेत्र उस देश की आय का अकेला स्रोत नहीं रहता, बल्कि दूसरे क्षेत्र भी उसमें शामिल होते जाते हैं. इन ग्राफ्स से यह बात साफ होती है.

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अब हम व्यय पक्ष का विश्लेषण करते हैं; दो घटक वही रहते हैं: क) सरकारी खर्च और ख) शुद्ध निर्यात. जीडीपी में इन दोनों की दरों में बहुत बड़े बदलाव नहीं हुए हैं. (ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि उनकी क्षेत्रगत वृद्धि जीडीपी में उनके आकार के अनुपात में ही हुई हो).

हालांकि वक्त बीतते-बीतते शुद्ध निर्यात में जबरदस्त उतार-चढाव आया है और 2002 से 2012 के दौरान व्यापार घाटे की दर बदतर हुई है (यानी हम आयात ज्यादा कर रहे हैं, निर्यात कम). और हालत अब भी वही है (भारत के व्यापार की गति पर अधिक जानकारी के लिए यहां पढ़ें).

मैन्यूफैक्चरिंग की पहेली

भारत के विकास का मॉडल शहरों में केंद्रित सेवा क्षेत्र पर आधारित है, लेकिन यह समझने के लिए कि उसके विकास में किन क्षेत्रों का योगदान है, जरूरत इस बात की थी कि सभी क्षेत्रों पर गौर किया जाए. इसके लिए हमें ऑस्ट्रेलिया, चीन, जर्मनी, यूके जैसे औद्योगिक देशों और भारत के मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्रों का गहराई से अध्ययन करना पड़ा और हमने पाया कि जर्मनी और चीन की जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का सबसे बड़ा योगदान है.

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हमने देखा कि सभी देशों की समग्र जीडीपी वृद्धि में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का हिस्सा कम हो रहा है, चूंकि वे विश्वव्यापी अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ रहे हैं जोकि मुख्य रूप से सेवा और सूचना प्रौद्योगिकी पर आधारित है. भारत का मामला अलग है जिसे समय से पहले विऔद्योगिकरण का सामना करने वाला देश कहा जा सकता है, जैसा कि यहां स्पष्ट किया गया है.

हालांकि 1990 और 2000 के दशक की शुरुआत में चीन का मामला अनूठा था. उसकी जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग आधारित विकास का सबसे बड़ा योगदान था. जीडीपी का 30% अकेले उसी क्षेत्र से प्राप्त होता था. इसीलिए हाल के दिनों में उसने दूसरे देशों के मुकाबले ज्यादा मैन्चूफैक्चर्ड गुड्स का निर्यात किया (इस मामले में वियतनाम, बांग्लादेश उसके आस-पास भी नहीं फटकते).

भारत ने बुनियादी ढांचा आधारित निजी निवेश को नहीं बढ़ाया

एक कारक जो मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र के भीतर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, वह यह है कि कोई देश अचल पूंजी पर कितना खर्च कर रहा है, यानी बुनियादी ढांचे के विकास पर- जिससे अंततः किसी क्षेत्र  या देश में अधिक निवेश होता है. एक संकेतक के रूप में सकल अचल पूंजी निर्माण (GFCF) का उपयोग करते हुए, हमने विश्लेषण किया कि विकसित देशों में 2000 और 2021 के बीच अचल पूंजी पर होने वाले व्यय में क्या बदलाव हुआ. जीडीपी के % के रूप में उच्च GFCF का अर्थ है, बुनियादी ढांचे में अधिक निवेश किया गया.

चीन और भारत को छोड़कर, पिछले दो दशकों में अन्य सभी विकसित अर्थव्यवस्थाओं में अचल पूंजी में निवेश कम हुआ है. यहां समय भी मायने रखता है. यूके, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, यूएस, जापान जैसी अर्थव्यवस्थाओं में अलग-अलग समय पर औद्योगीकरण हुआ था.

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फिर भी, इनमें से हरेक देश में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की वृद्धि में गिरावट के साथ सकल अचल पूंजी निर्माण में गिरावट (जीडीपी के % के रूप में) हमें बताती है कि क्यों इनमें से हरेक देश ने अपनी मैन्यूफैक्चरिंग सप्लाई चेन्स को विश्वव्यापी बनाया, जोकि चीन और भारत जैसे देशों के लिए लागत लाभ का कारण हैं.

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन ने अचल पूंजी निर्माण में अपने निवेश को काफी बढ़ाया ताकि बुनियादी ढांचा आधारित निजी निवेश को बढाया जाए. लेकिन भारत इस संबंध में धीमा रहा है.

वित्तीय क्षेत्र- निजी क्षेत्र को घरेलू ऋण

वित्तीय क्षेत्र के भीतर एक महत्वपूर्ण बात यह है कि नए ऋण और निवेश चक्र के तहत अर्थव्यवस्था के भीतर कितना पैसा जुटाया जाता है. पूंजी जुटाने का एक प्रमुख स्रोत 'ऋण' और 'कर्ज' है.

जब अर्थव्यवस्था में अधिक पैसा आता है, तो निवेश का स्तर भी बढ़ता है. अपने विश्लेषण में हमने घरेलू ऋण का इस्तेमाल किया है जिसका मतलब है, कि निजी क्षेत्र को लोन, नॉन—इक्विटी सिक्योरिटी जैसे वित्तीय संसाधन प्रदान करना.

जैसा कि स्पष्ट है, यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें भारत ने विशेष रूप से अन्य विकसित देशों की तुलना में खराब प्रदर्शन किया है. एक तरफ संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन जैसे देशों की जीडीपी में घरेलू ऋण का अनुपात 180% से अधिक हो गया है, वहीं भारत की जीडीपी में घरेलू ऋण पिछले एक दशक से लगभग 50% पर स्थिर है. इससे पता चलता है कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में, भारत में निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त ऋण आधारित उधारियां नहीं ली गईं. इनके जरिए ही उत्पादन क्षमता का विस्तार किया जा सकता है.

यही वजह है कि पिछले दशक (2012-13 से) से भारत का विकास सामान्य से कम या इष्टतम से कम स्तर पर बरकरार है.
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निवेश की कमी को दूर करने के लिए विदेशी पूंजी

जब घरेलू निजी निवेश कम होता है, तो आर्थिक नीति का मकसद होता है, विदेशी पूंजी को ज्यादा से ज्यादा आकर्षित किया जाए ताकि बचत-निवेश के बीच का फर्क दूर हो. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश या FDI का मतलब है, जब अनिवासी निवेशक प्रत्यक्ष निवेश करें और पैसा अपने देश में आए.

पिछले दो दशकों में सिर्फ भारत, चीन और जापान में FDI के जरिए आने वाली दौलत में सकारात्मक वृद्धि देखी गई. संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे अधिकांश अन्य विकसित देशों में FDI में काफी गिरावट आई है, जिसका कारण निम्न घरेलू ब्याज दरें हैं.

इससे पता चलता है कि भारत विदेशी संस्थागत निवेश और विदेशी निवेशकों के प्रत्यक्ष निवेश के लिए एक हॉट मार्केट' है. हमारे घोर-आशावादी शेयर बाजार के रुझान इस 'तेजी' की प्रवृत्ति की तरफ भी इशारा करते हैं.
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निर्यात में गिरावट और व्यापार घाटे का बढ़ना

भारत का कुल निर्यात 275,488,744.93 USD है और आयात 367,980,363.48 USD, जिसकी वजह से -92,491,618.55 USD का नकारात्मक व्यापार संतुलन हुआ है. -3.91% की विश्वव्यापी नकारात्मक व्यापार वृद्धि की तुलना में भारत की व्यापार वृद्धि लगभग -8.75% रही है.

वर्तमान प्रवृत्तियों को समझने के लिए ऐतिहासिक संदर्भ महत्वपूर्ण हैं.

शुद्ध निर्यात का मतलब है, निर्यात से अर्जित राजस्व से आयातित वस्तुओं के व्यय को घटाया जाए. लंबे समय से भारत के शुद्ध आयात के कारण अन्य देशों की तुलना में उसका व्यापार घाटा बढ़ा है. जिन देशों से तुलना की गई है, उनमें से अधिकांश में शुद्ध सकारात्मक निर्यात हुआ है. इससे यह भी पता चलता है कि वहां अधिक व्यापार उनकी अर्थव्यवस्थाओं को बढ़ा रहा है, उनमें घटाव नहीं कर रहा.  

दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों में शुद्ध निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है जिससे विकास की संभावनाएं बढ़ी हैं. भारत की व्यापार नीति कैसी है, और सहयोगी देशों के साथ उसके व्यापारिक संबंध कैसे हैं, इसका विश्लेषण यहां किया गया है.  

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सेवा क्षेत्र का योगदान

विकास के नजरिए से सेवा क्षेत्र भारत के सबसे बड़े और सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है. सेवा क्षेत्र के विशिष्ट प्रभाव को समझने के लिए दो बातों पर ध्यान देना होगा- जीडीपी के प्रतिशत के रूप में, और सेवा क्षेत्र की वास्तविक मूल्य वृद्धि.

सेवा क्षेत्र की मूल्य वृद्धि के वास्तविक आंकड़े देखने पर हमें जीडीपी की तेज रफ्तार के मद्देनजर सेवाओं की वृद्धि प्रासंगिक लगती है और फिर विभिन्न देशों के साथ उसकी तुलना अधिक विस्तृत हो जाती है.

अगर हम वास्तविक आंकड़े देखें तो सेवा क्षेत्र से भारत की मूल्य वृद्धि अन्य देशों जैसे यूके, जापान, कोरिया वगैरह के मुकाबले तेजी से बढ़ी है. यहीं पर जीडीपी का संदर्भ महत्वपूर्ण हो जाता है. इसीलिए हमें सेवा क्षेत्र को जीडीपी के प्रतिशत के मद्देनजर देखना चाहिए. 

बेशक, भारत बाकी सभी देशों से ऊपर नहीं है. असल में वह पक्की तौर पर औसत है. 2021 में जीडीपी के प्रतिशत के रूप में सेवा क्षेत्र की मूल्य वृद्धि काफी कम रही है. 2013 में ही चीन ने उसकी जगह हथिया ली थी.

इससे हमें पता चलता है, जैसा कि हमने पहले भी कहा है, भारत के सेवा क्षेत्र की मूल्य वृद्धि का ताल्लुक उसकी जीडीपी की वृद्धि से है, न कि उसके सेवा क्षेत्र के प्रदर्शन में आनुपातिक वृद्धि से. कम शब्दों में कहें तो भारत की संभावित जीडीपी वृद्धि के लिए विभिन्न क्षेत्रों में सेवा क्षेत्र के योगदान को बढ़ाने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है.  
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भारत बनाम चीन- विकास का अलग-अलग रास्ता

1990 में भारत की वास्तविक जीडीपी चीन की तुलना में अधिक थी. अगले तीन दशकों में चीन न केवल भारत से आगे निकल गया, बल्कि यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया. उसने इस दुनिया के किसी भी देश की तुलना में ज्यादा लोगों को गरीबी की गर्त से बाहर निकाला.

यह अभी भी पेचीदा मामला है (और डेवलपमेंट स्टडीज़ के स्कॉलर्स के लिए विस्मय पैदा करने वाला भी) कि चीन ने आर्थिक समृद्धि के लिए यह तेज रास्ता कैसे चुना, और भारत की तुलना में आर्थिक वृद्धि की दर भी उच्च स्तर पर बनाए रखी.  हां, मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र ने इस सिलसिले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

2021 में चीन में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र ने 26.3% का योगदान दिया, जो कि भारतीय अर्थव्यवस्था में इस क्षेत्र के योगदान का लगभग दोगुना है.

इस जबरदस्त अंतर को समझने के लिए हमने दोनों देशों के जीएफसीएफ और घरेलू ऋण के बीच तुलना की. भारत की तुलना में 1990 से चीन की जीडीपी में घरेलू ऋण का अनुपात लगभग चार गुना ज्यादा बना हुआ है.  

निजी निवेश ने चीन में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ाया है, जबकि भारत में FDI प्रवाह बढ़ने के बावजूद घरेलू निजी निवेश सामान्य से कम बना हुआ है. “घरेलू ऋण” और संगठित बैकिंग क्षेत्र से सस्ते ऋण न मिलने की वजह से एमएसएमई और लघु उद्यम “छोटे” और “मंझोले” बने रहते हैं.

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ऋण के उच्च स्तर का मतलब यह है कि चीन के घरेलू निजी क्षेत्र को ज्यादा से ज्यादा लोन्स मिलते हैं.

हां, चीन में बैंकिंग क्षेत्र को सरकार रेगुलेट करती है, और इससे जुड़ी बहुत सारी समस्याएं हैं. जैसे ऋणग्रस्तता अधिक है, किसी कंपनी को लोन दिया जाता है, किसी को नहीं, और वहां सार्वजनिक-निजी भ्रष्टाचार भी है. लेकिन ऋण के जरिए वित्त पोषित विकास ने ही उसके लिए एक नए युग का सूत्रपात किया है. 

यह इसलिए भी साफ है कि क्योंकि पिछले 30 वर्षों में जीएफसीएफ में चीन की वृद्धि दर भारत से बहुत अधिक है. पिछले 30 वर्षों में भारत के मुकाबले चीन ने अचल पूंजी में पांच गुना अधिक निवेश किया है. इस निवेश से बड़े पैमाने पर उत्पादन हुआ है, और चीन के मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र ने अपनी अर्थव्यवस्था में भारत की तुलना में दोगुना योगदान दिया.

हालांकि जब तक उत्पादन को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कुशलता से पेश नहीं किया जाता, तब तक उत्पादन के उच्च स्तर का ज्यादा फायदा नहीं मिलता. लेकिन चीन सस्ते निर्यात के लिए भी मशहूर है. यहां हमने चीन और भारत के निर्यात की प्रवृत्तियों को समझा.

हमारी इंफोस्फेयर टीम ने आर्थिक जटिलता सूचकांक का विश्लेषण किया. इस सूचकांक में निर्यात के आंकड़े इस्तेमाल किए जाते हैं और विभिन्न देशों की निर्यात बास्केट में उत्पादों की विविधता और हर जगह उन उत्पादों की मौजूदगी के आधार पर उनकी रैंकिंग की जाती है. जिस देश की बास्केट ज्यादा विविध होती है और वह कई देशों में निर्यात करता है, उसे ज्यादा अंक मिलते हैं. शोध के लिए हमने तुलना की कि पिछले दो दशकों में भारत और चीन की रैंक किस तरह से बदली है.

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2000 के बाद से भारत और चीन का आर्थिक अंतराल लगातार बढ़ता गया. चीन टॉप 20 में शामिल हुआ, और इससे पता चलता है कि चीन अनगिनत किस्म के उत्पादों का निर्यात कर रहा है, साथ ही ज्यादा से ज्यादा देशों में निर्यात करता है. लेकिन भारत चीन के साथ कदमताल नहीं मिला पाया. वह सूचकांक में पिछड़ गया. स्पष्ट है, चीन के निर्यात स्तर और निर्यात राजस्व में जबरदस्त इजाफा हुआ, और उच्च वृद्धि हुई.

हालांकि अधिक निर्यात राजस्व का मतलब यह नहीं कि जीडीपी में अधिक मूल्य वृद्धि हुई (जैसा कि हमने पहले भी कहा है). हमें आयात के व्यय को भी देखना होगा, और कई मामलों में, कई देशों को उनके शुद्ध निर्यात पर घाटा होता है.

इसके लिए हमें यह तुलना भी करनी होगी कि पिछले तीन दशकों में दोनों देशों की जीडीपी के प्रतिशत के रूप में शुद्ध निर्यात कैसा रहा.

और, एक वर्ष को छोड़कर भारत की तुलना में चीन का शुद्ध निर्यात लगातार सकारात्मक रहा है.

दिलचस्प बात यह है कि चीन और भारत के मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्रों में सस्ते श्रम की हमेशा से दुहाई दी जाती है. हां, भारत के पास सस्ता श्रम उपलब्ध है. हमारा देश एक श्रम अधिशेष अर्थव्यवस्था है, लेकिन फिर भी भारत अपने सस्ते श्रम का दोहन करके, मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा नहीं बढ़ा पाया. चीन इस मामले में भी उससे अव्वल रहा.

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भारत के विकास का आकलन वास्तविक आंकड़ों के बजाय उसके मूल्य ‌के आधार पर किया जाता है

अपने शोध के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि भारत के तेज विकास में देश के सेवा क्षेत्र की मूल्य वृद्धि का सबसे बड़ा योगदान है. लेकिन फिर भी हम काफी पीछे हैं और मानव क्षमता के लिहाज से तो हमारी तुलना मुख्य चार देशों (सबसे तेजी से बढ़ते देश) से करना ही बेमानी है.

यूं सेवा क्षेत्र हमारी सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन वहां मूल्य वृद्धि गैर अनुपातिक है, क्योंकि यह पूंजी गहन, शहर आधारित, सेवा आधारित क्षेत्रों तक सीमित है जहां दूसरे देशों की तुलना में भारत के लिए  ‘मूल्य वृद्धि' पर आधारित विकास तेजी से कम होता जा रहा है.

सबसे अहम बात यह है कि उन लोगों के लिए रोजगार सृजन नहीं किया जा रहा जो श्रमशील आयु वर्ग में आते हैं. यानी समस्या दूर करने की किसी को फिक्र नहीं है. इन समस्याओं को अल्प, मध्यम और दीर्घावधि के नीतिगत हस्तक्षेपों के जरिए दूर करने की जरूरत है.

(यह अध्ययन जिंदल स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स एंड ह्यूमैनिटीज़, ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी की इंफोस्फेयर टीम ऑफ सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक स्टडीज़ (सीएनईएस) ने किया है. उनके काम को देखने के लिए उनकी वेबसाइट देखें.)

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