हिंदी पखवाड़ा चल रहा है. और हर साल की तरह गैर हिंदी, गैर संस्कृत मूल के विदेशी शब्दों की हिंदी में भारी आवक पर बदस्तूर शोक और चिंता जताई जा रही है. यह शोक हर बार महज एक नाटक हो ऐसा भी नहीं.
हिंदी हितैषी हैं तो दो बातें समझ लीजिए
हिंदी के तमाम हितैषी दो बातें साफ समझ लें. एक, कि गंगा की तरह हिंदी की धारा भी सारी हिंदी पट्टी से कई अन्य छोटी नदियों नालों, घाटों से अनेक किस्म का जल और जैविक तत्व बटोरती हुई बहती रही हैं, और उसमें लगातार इलाके की बोलियों, उर्दू, फारसी या अंग्रेज़ी की धारायें आ कर मिलती रही हैं. यह संकरण हिंदी को प्रदूषित नहीं करता, उसे समृद्ध और व्यापक बनाता है.
दूसरा, जैसे-जैसे 11 राज्यों में फैली विशाल हिंदी पट्टी में साक्षरता बढ़ रही है, और मतदाता अपनी बोली में राजनीति और अर्थनीति समझना चाहते हैं, तो उस जानकारी के लिये हिंदी के अनेक इलाकाई प्रकार भी परदेसी शब्दों को समेटते हुए सामने आ रहे हैं. खासकर क्षेत्रीय मीडिया में.
व्यापक भाषा है हिंदी
यह स्थिति भी कोई नई नहीं है. यह तो आज से डेढ़ सौ बरस पहले भी मौजूद थी जब भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपने एक लेख में एक-दो नहीं, 12 प्रकार की हिंदियां गिनाईं थीं, जैसे सरकारी हिंदी, अंग्रेज़ी मिश्रित हिंदी और रेलवे की हिंदी.
वली दकनी जैसे शायरों की अलबेली दकनी हिंदी भी सौ से अधिक बरसों से फलफूल रही है :
तेरी भंवां कूं देख के कैते हैं आशिकां, है शाह जिसके नाम चढी है कमान आज.

