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क्या देश के टीवी एंकर्स कुछ ज्‍यादा ही प्रभावशाली हो गए हैं?

‘अर्नब गोस्वामी जैसे टीवी एंकर के पास जो ये ताकत है, वो काफी हद तक नकारात्मक है.’

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ऊपर दिया गया सवाल अगर मुझसे पूछा जाए, तो मेरा जवाब होगा ‘हां’, खासकर ‘टाइम्स नाउ’ जैसे अंग्रेजी चैनल के एंकर अर्नब गोस्वामी. यहां प्रभावशाली कहने से मतलब यह है कि ये वे लोग हैं, जो ये तय करते हैं कि रोज रात को नौ बजे टीवी पर किस मुद्दे पर बहस होनी चाहिए.

इसका चुनाव करने का अधिकार कहीं न कहीं उनके पास है. ये भी कि कौन-सा मुद्दा आज के दिन महत्वपूर्ण है. इसे प्रिंट में ‘पावर जर्नलिस्ट’ कहा जाता था और इंटरनेट के पास इतनी सत्ता अभी तक आई ही नहीं है.

मैं ये भी कहता चाहता हूं कि अर्नब गोस्वामी जैसे टीवी एंकर के पास जो ये ताकत है, वो काफी हद तक नकारात्मक है, क्योंकि उनका फोकस ज्यादातर उन मुद्दों पर होता है, जो उच्च वर्ग की प्राथमिकता होती है या वो जो इस वर्ग को परेशान करता है. वो मुद्दे जो एक आम भारतीय को परेशान करते हैं, जो लाखों-करोड़ों भारतीयों के जीवन से जुड़े हैं, जैसे स्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा और पोषण, उसकी बात उनके कार्यक्रमों में होती ही नहीं है. इसकी वजह ये भी नहीं है कि ये एंकर किसी का बुरा चाहते हैं या किसी को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं.

भाषा का बड़ा रोल

ऐसा होने की वजह काफी हद तक संरचानात्मक है और ये आसानी से बदल भी नहीं सकता. आइए अब हम एक नजर इस बात पर डालें. सबसे पहले भारत भाषा के स्तर पर एक असामान्य देश है. ये एकमात्र ऐसा देश है, जहां अभिजात्य वर्ग की पहली भाषा एक विदेशी भाषा यानी अंग्रेजी है. इसका हमारी सांस्कृतिक टूटन पर काफी गंभीर असर पड़ा है, जिसके बारे में हम बाद में बात कर सकते हैं. ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि तकरीबन 10 प्रतिशत भारतीय किसी न किसी रूप में अंग्रेजी भाषा बोल और समझ सकते हैं.

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