खुद से मोहब्बत करना सिखाने वाला देश, समाज नहीं है यह. यहां संस्कार का अर्थ है अपने हिस्से की रोटी दूसरे को देकर सुख पाना. स्त्रियों के हिस्से तो यह इस कदर आया है कि यह उनकी रोजमर्रा की आदत में शामिल हो गया कि घंटों खाना बनाने के बाद पहले घर के पुरुषों को परोसना, खिलाना, उन्हें खाते देखने का सुख लेना और जो उनके खाने से जो बच जाय उसे खाकर अपना भाग्य सराहना.
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गुजरात की क्षमा ने खुद से शादी कर परंपरा तोड़ी,फिर रीति रिवाजों को क्यों निभाया?
विवाह की रीति-रिवाजों और शोशेबाजी का आकर्षण ऐसा है कि ये रिश्तों से भी अहम हो जाता है

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