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गोपाल कृष्ण गोखलेःकांग्रेस का वो नेता,जिसे गांधीजी कहते थे महात्मा

गोखले ने कानूनी बदलावों के जरिये मजदूरों के हालात में सुधार के लिए भी लगातार प्रयास किए

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“गोखले की बात निराली है. उन्होंने मेरे हृदय में मेरे राजनीतिक गुरु की तरह निवास किया. उनसे मिलने से पहले मेरे मन में भय था. लेकिन उन्होंने एक क्षण में मेरे मन का सारा भय दूर कर दिया...और जब मैंने उनसे विदा ली, उस समय मेरे मन से एक ही आवाज आई - यही है मेरा गुरु.”

ये शब्द हैं महात्मा गांधी के, जो उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले से पहली मुलाकात के बारे में लिखे थे. गोखले से गांधी की ये मुलाकात पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज में हुई थी. गांधी, फिरोजशाह मेहता की सलाह पर मुंबई से पुणे गए थे, जहां वो गोखले के अलावा लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से भी मिले थे.

इस मुलाकात के बाद गांधीजी ने तीनों महान नेताओं की खासियत बताते हुए लिखा :

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“फिरोजशाह मेहता मुझे हिमालय जैसे लगे, लोकमान्य समुद्र के समान, तो गोखले गंगा जैसे जान पड़े, जिसमें आप नहा सकते हैं. हिमालय पर चढ़ा नहीं जा सकता, समुद्र में डूबने का खतरा रहता है, पर गंगा की गोद में तो क्रीड़ा की जा सकती है.”

सारी दुनिया ने गांधी को महात्मा कहा, लेकिन वो खुद गोपाल कृष्ण गोखले को महात्मा मानते थे. गांधी जी का कहना था कि उन्होंने राजनीति के क्षेत्र में गोखले से ज्यादा सर्वगुण संपन्न दूसरा व्यक्ति नहीं देखा.

महाराष्ट्र के गरीब परिवार में जन्म

गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई 1866 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के कोतलुक गांव के एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके पिता कम उम्र में चल बसे. लेकिन गरीबी के बावजूद बड़े भाई ने उन्हें ऊंची शिक्षा हासिल करने में पूरी मदद की. गोखले 1884 में मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज से ग्रेजुएशन करने वाले कुछ गिने-चुने भारतीयों में शामिल थे. ग्रेजुएशन के बाद ही वो पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज में पढ़ाने लगे, जहां वो बाद में प्रिंसिपल भी बने.

जस्टिस रानाडे से मुलाकात

पुणे में ही उनकी मुलाकात कांग्रेस के बड़े नेता, समाज सुधारक और कानूनविद जस्टिस महादेव गोविंद रानाडे से हुई थी. रानाडे इंडियन नेशनल कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में थे. उन्होंने गोखले की प्रतिभा को पहचानकर सामाजिक-राजनीतिक जीवन में उतरने के लिए प्रेरित किया. रानाडे को गोखले अपना गुरु मानते थे. रानाडे ने ही 1989 में गोखले को कांग्रेस का सदस्य बनाया.

कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष

कांग्रेस में गोखले का नाम जल्द ही लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों की कतार में शामिल हो गया. 1905 में गोखले को महज 39 साल की उम्र में कांग्रेस का अध्यक्ष भी बनाया गया. गोखले ये जिम्मेदारी संभालने वाले शायद सबसे कम उम्र के नेता थे.

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लोकमान्य तिलक से वैचारिक मतभेद

इस दौरान कांग्रेस के भीतर आपसी वैचारिक मतभेदों की वजह से नरम दल और गरम दल के नाम से दो गुट बन गए थे. इनमें गोखले नरम दल और तिलक गरम दल के नेता थे. दोनों गुटों के बीच मुख्य विरोध देशहित के लिए संघर्ष करने के तरीकों को लेकर था. गोखले का नरम दल सिर्फ संवैधानिक रास्तों के इस्तेमाल का हिमायती था, जबकि तिलक का गरम दल आजादी हासिल करने के लिए हर तरह के आंदोलन और संघर्ष को सही मानता था.

बाल विवाह, जातीय भेदभाव का विरोध

गोखले और तिलक के बीच राजनीति के अलावा समाज सुधार और शिक्षा के मुद्दे पर भी गंभीर मतभेद थे. अपने गुरु रानाडे की तरह ही गोखले भी भारतीय समाज की कुरीतियों को दूर करने के हक में थे. मिसाल के तौर पर अंग्रेजों ने जब बाल विवाह के खिलाफ कानून बनाने की पहल की तो तिलक ने इसे भारतीय समाज में अंग्रेजों की दखलअंदाजी मानकर उसका विरोध किया. लेकिन गोखले ने बाल विवाह को गंभीर सामाजिक बुराई बताते हुए उसके खिलाफ बनने वाले कानून का समर्थन किया.

बाल विवाह की तरह ही, गोखले जातिप्रथा को भी भारतीय समाज की बड़ी बुराई मानते थे और छुआछूत के सख्त खिलाफ थे. तथाकथित निचली जातियों के लोगों के साथ होने वाले बुरे बर्ताव की उन्होंने बेहद कड़े शब्दों में निंदा की थी.

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“निचली जातियों के लोगों की हालत (जिन्हें निचली जाति का कहने में तकलीफ होती है), सिर्फ असंतोषजनक नहीं है. ये इतनी खराब है कि इसे हमारी सामाजिक व्यवस्था पर एक बड़ा दाग कहना चाहिए. कोई भी इंसाफ पसंद व्यक्ति मानेगा कि इंसानों के एक तबके को, जो शरीर, बुद्धि और मन से हम जैसे ही हैं, अनंतकाल के लिए दरिद्रता, अभाव, अपमान और गुलामी की जिंदगी जीने के लिए मजबूर करना पूरी तरह राक्षसी काम है. इतना ही नहीं, उनके विकास के रास्ते में ऐसी अड़चनें खड़ी की गई हैं कि वो अपनी हालत में कभी सुधार ही न कर सकें. ये स्थिति इंसाफ की भावना के बिलकुल खिलाफ है. अगर हमारे देशवासियों की बड़ी आबादी इन हालात में रहने को मजबूर होगी, तो हम अपनी राष्ट्रीय आकांक्षाओं को पूरा करने और दुनिया के देशों में सम्मानजनक जगह बनाने में कामयाब कैसे हो सकते हैं?”

गोखले ने कानूनी बदलावों के जरिये मजदूरों के हालात में सुधार के लिए भी लगातार प्रयास किए. दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी के सत्याग्रह के दौरान गोखले ने नाटाल के मजदूरों की भलाई के लिए भी एक बिल तैयार किया था.

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मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की वकालत

गोखले एक शिक्षाविद होने के नाते पढ़ाई-लिखाई के महत्व को अच्छी तरह समझते थे. यही वजह थी कि उन्होंने ज्ञान की रौशनी को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसायटी की स्‍थापना की.

उन्होंने देश के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए, बिना किसी भेदभाव के सभी वर्गों के बच्चों को मुफ्त प्राथमिक शिक्षा देने की वकालत की. इसके लिए वो 1911 में इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में एक बिल भी लेकर आए थे. इस बिल में उन्होंने प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त, अनिवार्य और सेकुलर बनाने की वकालत की थी.

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अपनों का विरोध भी झेला

लिबरल यानी उदारवादी विचारधारा में यकीन करने वाले गोखले ने शिक्षा और समाज में गैर-बराबरी दूर करने के लिए लगातार कोशिशें कीं. लेकिन अपनी इन कोशिशों की वजह से उन्हें अपने ही देश के कुछ लोगों का कड़ा विरोध भी झेलना पड़ा. इनमें ऐसे लोग भी थे, जो भारत को अंग्रेजों की गुलामी से तो आजाद कराना चाहते थे, लेकिन भारतीय समाज के भीतर मौजूद सामाजिक और आर्थिक गैर-बराबरी, गुलामी और शोषण पर होने वाला प्रहार उन्हें तिलमिला देता था. ऐसे लोगों ने कई बार गोखले को अंग्रेजों के प्रति उदार बताते हुए उनके खिलाफ दुर्भावनापूर्ण दुष्प्रचार अभियान भी चलाए.

लेकिन 1905 में कांग्रेस के बनारस सम्मेलन में अध्यक्ष के तौर पर दिया गया उनका भाषण बताता है ये आरोप कितने गलत थे. इस भाषण में उन्होंने कहा था-

“सात सालों तक रहे लॉर्ड कर्जन के शासन का अंत हुआ है... मैं इसकी तुलना औरंगजेब के शासन से करता हूं. इन दोनों शासकों में अनेक समानताएं हैं. जैसे अत्यधिक केंद्रीकृत शासन, स्वेछाचारी व्यक्तिगत फैसले, अविश्वास और दमन. सौ सालों से भी अधिक समय से भारत इंग्लैंड के लिए ऐसा देश बन गया है, जिसकी अपार दौलत देश से बाहर ले जाई गयी है.”
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विरोधियों को हराने नहीं, जीतने पर भरोसा

गोखले भले ही हिंसा या दूसरे उग्र तरीकों के पक्षधर नहीं थे, लेकिन उनकी जिंदगी का हर एक पल देश के लिए समर्पित था. पट्टाभि सीतारामैय्या ने उनके लिए कहा था, ‘गोखले विरोधियों को हराने में नहीं, उन्हें जीतने में यकीन रखते थे.’

भारत की आजादी का लक्ष्य गोखले के लिए कितना अहम था, इसका जिक्र करते हुए गांधी जी ने लिखा है:

“उन्हें लोग तरह-तरह के कामों में शामिल होने के लिए बुलाते थे, लेकिन उनका जवाब हमेशा एक ही होता था - “मुझे अपना काम करने दें. मुझे अपने देश के लिए आजादी चाहिए. वो मिल जाए, तभी हम दूसरी चीजों के बारे में सोच सकते हैं. अभी तो मेरा सारा वक्त और ताकत सिर्फ इसी एक काम के लिए है.”

देश प्रेम की इस निस्वार्थ भावना की वजह से ही गहरे वैचारिक मतभेदों के बावजूद तिलक और गोखले एक-दूसरे का दिल से सम्मान करते थे. 19 फरवरी 1915 को महज 49 साल की उम्र में गोखले का निधन हो गया. तिलक ने तब उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा था :

"भारत का ये नगीना, महाराष्ट्र का ये रत्न, कामगारों का ये राजकुमार आज चिरनिद्रा में सो रहा है. इसकी तरफ देखो और इसके जैसा बनने की कोशिश करो."

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