ऐसा कहा जाता है कि अगर कुछ होना तय है तो वह होकर ही रहेगा, तुरंत नहीं तो बाद में होगा ही. वर्ष 1991 में भारतीय साहित्य (साहित्य अकादमी की पत्रिका) के संपादक डॉ राव से मिलने का मौका मुझे मिला था, यह मुलाकात न केवल अप्रत्याशित थी बल्कि इसके परिणाम अनुमान से कहीं ज्यादा रहे.
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