दलितों और आदिवासियों की खबर मीडिया में तभी छपती है जब कोई उत्पीड़न होता है. जालोर में इंद्र कुमार मेघवाल की हत्या की ख़बर मीडिया में खूब रही. अब मध्य प्रदेश के सागर में जैन मंदिर में दलित बच्चे की पिटाई की खबर है. इतना स्थान मीडिया में इनके शिक्षा, विकास और नौकरी आदि के लिए मिला होता तो लाखों का उत्थान हो जाता. करोड़ों दलित बच्चों का वजीफा नहीं बढ़ा, मिलता है तो बहुत बाद में. लाखों बच्चों की स्कॉलरशिप का गबन हो जाता है. लाखों करोड़ के स्पेशल कॉम्पोमेंट प्लान और ट्राइबल सब प्लान के पैसे का दुरपयोग होता रहता है. लाखों सरकार में पद खाली हैं.
मीडिया में ऐसे मुद्दे को स्थान कहां मिलता है. जो मीडिया सामाजिक और राजनैतिक नेताओं के अच्छे काम को स्थान नहीं देती वही उत्पीड़न होने पर ही क्यों सक्रिय होती है?
