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कैसे सियासत का ‘राम’ बना चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’   

सियासी गलियारों के अंदरखाने में एक नारा सुनाई देता है, ‘हर दल की मजबूरी है भीम आर्मी जरूरी है’.

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वो नब्बे का दशक था. कानपुर की एक रैली में दलितों के मसीहा कहे जाने वाले कांशीराम जी से मेरी मुलाकात हुई. मेरा सीधा सवाल था, 'इन सीधे सादे लोगों को मुठ्ठी बांधकर हल्ला बोलना कैसे सिखाएंगे?' कांशीराम ने तपाक से जवाब दिया, 'इस रैली का तंबू एक बांस पर टिका है. बांस, एक रस्सी के सहारे खड़ा है और रस्सी एक खूंटे में बंधी है. अगर ये खूंटा उखड़ जाए तो रस्सी, बांस और पूरा का पूरा तंबू भरभरा कर गिर जाएगा. ये खूंटा दलित है और इस खूंटे को बस याद दिलाना है कि सबकुछ तुम पर टिका है.'

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