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प्रतियोगी परीक्षाओं में जाति का दोहरा रोल, रिसर्च में पोल खोल

एक स्टडी बताती है कि किस तरह से सिर्फ उच्च जाति का नाम रहने से ही किसी को नौकरी मिलने की संभावना बढ़ जाती है.

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इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जाति व्यवस्था (Caste System) भारतीय समाज में इतनी गहराई तक पैठ बना चुकी है कि यह लगभग पूरे समाज की नींव बन गई है. जाति की राजनीतिक भूमिका इतनी अधिक है, यह इस कदर भीतर तक घुसी हुई है कि अक्सर सामाजिक संरचनाओं को बनाए रखने वाले भी इसे ठीक से देख नहीं पाते हैं.

इस आर्टिकल का लक्ष्य प्रतियोगी यानी कंपीटिटिव परीक्षाओं के प्रति समाज के ऐसे ही जातिवादी नजरिए पर रोशनी डालना है. अभी जो UPSC सिविल सेवा परीक्षा के नतीजे आए हैं उसके संदर्भ में भी.

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