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जब तक 'रोटी-बेटी' का रहेगा भेद, भारत से जाति की कुप्रथा खत्म होना मुश्किल

राष्ट्र निर्माण की बात तबतक बेमानी है जबतक जातीय दुराग्रहों से मुक्त नहीं हुआ जाता.

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बाबासाहेब अंबेडकर (B. R. Ambedkar) का मानना था कि जातीय संरचना में निहीत भेदभाव मुख्यतः दो बातों के इर्द-गिर्द घूमती है- ‘रोटी’ और ‘बेटी’. पूरा भेदभाव इन्हीं पर टिका होता है और इन्हीं से ऊर्जा पाता है. ‘रोटी’- मतलब खाने-पीने में दूरी या भेदभाव, इसलिए किसी के जातीय बहिष्कार के लिए जो प्रचलित मुहावरा है वह है- ‘हुक्का-पानी बंद करना’. ‘बेटी’- मतलब वैवाहिक संबंधों को बनाने से परहेज, विशेषकर बेटियों के मामलों में, क्योंकि बेटियां आज भी संपत्ति ही समझी जाती हैं, और जिसके लिए एक अन्य मुहावरा है- ‘बेटियां पराया धन होती हैं’.

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