ADVERTISEMENTREMOVE AD
Members Only
lock close icon

ब्‍लॉग से | तीन तलाक की नाजायज जिद!

अगर तीन तलाक को बोर्ड ‘गुनाह’ मानता ही है, तो उसे पूरी तरह खारिज कर देने में उसे क्या ऐतराज?

Published: 
story-hero-img
i
Aa
Aa
Small
Aa
Medium
Aa
Large

मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तर्क बेहद हास्यास्पद है. एक तर्क यह है कि ‘पुरुषों में बेहतर निर्णय क्षमता होती है, वह भावनाओं पर क़ाबू रख सकते हैं. पुरुष को तलाक़ का अधिकार देना एक प्रकार से परोक्ष रूप में महिला को सुरक्षा प्रदान करना है. पुरुष शक्तिशाली होता है और महिला निर्बल. पुरुष महिला पर निर्भर नहीं है, लेकिन अपनी रक्षा के लिए पुरुष पर निर्भर है.’ बोर्ड का एक और तर्क देखिए. बोर्ड का कहना है कि महिला को मार डालने से अच्छा है कि उसे तलाक़ दे दो.

यह कॉमेडी है या ट्रेजेडी? या शायद एक साथ दोनों है! तीन तलाक़ पर मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड का हलफ़नामा कूढ़मग़ज़ी और नितान्त बचकाने तर्कों का एक शाहकार दस्तावेज़ है! कॉमेडी इसलिए कि इन तर्कों को पढ़ कर हँसी से लोटपोट हुआ जा सकता है और ट्रेजेडी इसलिए कि बोर्ड ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वह मुसलमानों में किसी भी प्रकार के सामाजिक सुधारों का कितना बड़ा विरोधी है. समझ में नहीं आता कि मुसलिम पर्सनल बोर्ड को किस बात का डर है कि वह मुसलिम समाज में सुधार की किसी भी कोशिश में अड़ंगा लगा देता है?

एक भी ठोस तर्क नहीं

और दिलचस्प बात यह है कि यह हलफ़नामा इस बात का खुला दस्तावेज़ है कि तीन तलाक़ की नाजायज़ ज़िद पर अड़े मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पास तीन तलाक़ को जायज़ ठहराने के लिए वाक़ई एक भी ठोस तर्क नहीं है. बोर्ड के पास तीन तलाक़ के पक्ष में अगर वाक़ई कुछ ठोस तर्क होते तो अपने हलफ़नामे में उसे ऐसी हास्यास्पद बातों का सहारा न लेना पड़ता!

क्या महिलाएँ बुद्धि और विचार से हीन हैं?

यह हलफ़नामा इस बात का भी दस्तावेज़ है कि मुसलिम पर्सनल बोर्ड किस हद तक पुरुष श्रेष्ठतावादी, पुरुष वर्चस्ववादी है और केवल पुरुष सत्तात्मक समाज की अवधारणा में ही विश्वास रखनेवाला है और वह महिलाओं को किस हद तक हेय, बुद्धि और विचार से हीन और अशक्त मानता है और उन्हें सदा ऐसा ही बनाये भी रखना चाहता है. उर्दू साप्ताहिक ‘नयी दुनिया’ के सम्पादक और पूर्व सांसद शाहिद सिद्दीक़ी ने इस मुद्दे पर अपनी टिप्पणी में सही लिखा है कि बोर्ड ने इसलामोफ़ोबिया फैलानेवालों के इस आरोप को सही साबित कर दिया है कि इसलाम में महिलाएँ शोषित और उत्पीड़ित हैं क्योंकि वहाँ महिलाओं को पुरुषों से कमतर माना जाता है.

पाकिस्तान, बांग्लादेश में तीन तलाक़ नहीं है

हो सकता है कि यह बात कम लोगों को पता हो कि पड़ोसी मुसलिम देश पाकिस्तान और बांग्लादेश में तीन तलाक़ जैसी कोई चीज़ नहीं है. पाकिस्तान आज से पचपन साल पहले (जी हाँ, आपने बिलकुल सही पढ़ा, आज से 55 साल पहले) यानी 1961 में क़ानून बना चुका है कि तलाक़ की पहली घोषणा के बाद पुरुष को ‘आर्बिट्रेशन काउंसिल’ और अपनी पत्नी को तलाक़ की लिखित नोटिस देनी होगी. इसके बाद पति-पत्नी के बीच मध्यस्थता कर मामले को समझने और सुलझाने की कोशिश की जायेगी और तलाक़ की पहली घोषणा के 90 दिन बीतने के बाद ही तलाक़ अमल में आ सकता है. इसका उल्लंघन करनेवाले को एक साल तक की जेल और जुरमाना या दोनों हो सकता है. बांग्लादेश में भी यही क़ानून लागू है.

Become a Member to unlock
  • Access to all paywalled content on site
  • Ad-free experience across The Quint
  • Listen to paywalled content
  • Early previews of our Special Projects
×
×