पिछले तीन दिनों में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने बहुत कुछ ऐसा कहा है, जिससे ये धारणा बन सकती है कि संघ में बदलाव आ रहा है. वो अपनी मूल धारणाओं में परिवर्तन कर रहा है. संघ अब वो नहीं रहा जिसको लेकर ये कहा जाता है कि वो एक सांप्रदायिक संगठन है. वो मुसलमानों से नफरत नहीं करता और न ही ईसाइयों और वामपंथ को देश का दुश्मन मानता है. वो एक ऐसा संगठन है जो सबको साथ लेकर चलना चाहता है. लेकिन ये शब्द हैं.
इन शब्दों में अच्छी गूंज सुनाई देती है. और संघ को लेकर बहुत सारी जो भ्रांतियां हैं वो टूट सकती हैं. ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर संघ प्रमुख को ये सब कुछ कहने की आवश्यकता क्यों पड़ी? मेरा अपना मानना है कि भागवत की बातों पर कोई नतीजा निकालने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. इंतजार करना चाहिए, इसके कारण हैं.
आशुतोष की ही आवाज में सुनिए उनका ये आर्टिकल
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