फ्रांसीसी विचारक टोकेविले (Tocqueville) ने एक बार कहा था कि "समानता की क्रमिक प्रगति नियति ही है." उनका मानना था कि मानव समाज समानता के आकर्षण को रोक नहीं पायेगा और उसके खिलाफ खड़ा नहीं हो पायेगा.
समानता फ्रांसीसी क्रांति से निकली तीन प्रमुख मूल्यों में से एक थी. यह फ्रांसीसी क्रांति के प्रसिद्ध आदर्श वाक्य - "स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व" से स्पष्ट है.
डॉ बीआर आंबेडकर ने तर्क दिया था कि ये तीन मूल्य इस अर्थ में एक त्रिमूर्ति का गठन करते हैं कि अन्य दो की गैरमौजूदगी में तीसरे का होना संभव नहीं है.
आधुनिक लोकतांत्रिक समाज समानता के विचार को गहराई से संजोते हैं और यह एक आम-समझदार धारणा बन गई है कि 'लोकतंत्र' के रूप में पहचाने जाने के लिए, आपके पास कुछ हद तक 'समानता' होनी चाहिए.
हालांकि, ऐसा बहुत कम होता है. अगर सारे नहीं तो अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में विभिन्न प्रकार की व्यापक असमानताएं होती हैं.
इसी आलोक में हमें देश में आज की सबसे प्रभावशाली पार्टी- बीजेपी के दिए और व्यवहार में लाए गए समानता के विचार का विश्लेषण और मूल्यांकन करने की आवश्यकता है.
धर्म, लिंग और 'समान व्यवहार' की राजनीति
बीजेपी ने अपनी स्थापना के बाद से, एक विशेष धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय को अलग से खास ट्रीटमेंट देने के विचार के खिलाफ लगातार अभियान चलाया है. पार्टी के नेता और प्रवक्ता 'सभी' के लिए काम करने का दावा करते हैं और किसी भी धार्मिक अल्पसंख्यक के लिए 'विशेष विशेषाधिकार' का पुरजोर विरोध करते हैं.
'समान व्यवहार' का विचार 'औपचारिक समानता' के दार्शनिक सिद्धांत से प्रेरित है. 'औपचारिक समानता' ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियों पर विचार किए बिना 'सभी के साथ समान व्यवहार' की आंख बंद करके वकालत करता है.
दूसरी ओर 'पर्याप्त समानता/सब्सटेंशियल इक्वलिटी' का विचार है, जो व्यापक रूप से लंबे समय से चले आ रहे नुकसान और अक्षमता की स्थिति को ध्यान में रखता है, जिसे किसी खास समुदाय को सहना पड़ा है.
जब हम 'पर्याप्त समानता/सब्सटेंशियल इक्वलिटी' के विचार को स्वीकारते हैं, तो हम उस खास समुदाय के लिए विभिन्न प्रकार की सकारात्मक कार्रवाई के लिए भी सहज होते हैं, जो उनके साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को कम करने में मदद कर सकते हैं.
उदाहरण के लिए अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण ने इस तरह के उद्देश्य को पूरा किया है.
विशेष रूप से मुसलमानों के मामले में, 'समान व्यवहार' का त्रुटिपूर्ण विचार समुदाय के सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ेपन (जैसा कि सच्चर समिति की रिपोर्ट, 2006 द्वारा उजागर किया गया है) को खत्म करने में सहायता नहीं करेगा.
भगवा पार्टी खुद को लैंगिक समानता के मसीहा के रूप में पेश करती है और लगातार ट्रिपल तलाक कानून (मुस्लिम महिला [विवाह पर अधिकारों का संरक्षण] अधिनियम, 2019) को लागू करने की बात करती है.
जब सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को संविधान का उल्लंघन करार दिया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था,
"तीन तलाक पर माननीय SC का फैसला ऐतिहासिक है. यह मुस्लिम महिलाओं को समानता प्रदान करता है और महिला सशक्तिकरण के लिए एक शक्तिशाली उपाय है."
यह सही है कि तीन तलाक की प्रथा स्वाभाविक रूप से अमानवीय है, लेकिन यह दावा कि इसके खिलाफ कानून ने लैंगिक समानता के आदर्श को आगे बढ़ाया है, तार्किकता के आधार पर नहीं टिकता है.
जैसा कि आलोचकों का दावा है, यह कानून मुस्लिम पुरुषों को अपराधी बनाने का एक उपकरण बन गया है. उन्हें जेल भेज दिया गया है और ऐसी स्थिति में वे अपनी पत्नी को मेंटेनेंस/गुजारा भत्ता करने में असमर्थ हैं. ऐसी खबरें सामने आईं हैं कि मुस्लिम महिलाओं को 'आधिकारिक' तलाक दिए बिना पति द्वारा छोड़ दिया जाता है, जिससे महिला और भी कमजोर स्थिति में चली जाती है. इसलिए, मुस्लिम महिलाओं की स्थिति अनिश्चित बनी हुई है.
जाति से डील करना
लंबे समय तक, बीजेपी को एक ब्राह्मण-बनिया पार्टी कहा जाता रहा, जो केवल 'उच्च-जाति' और शहरी-व्यापार मालिकों के हितों को पूरा करती थी.
हालांकि, पार्टी की सोच और दृष्टिकोण में कुछ बदलाव दिखाई देता है जिसमें उसने हाशिए के जाति समूहों को अपने पाले में लाने का प्रयास किया है. पार्टी ने उप-जाति समूहों को प्रतिनिधित्व देकर और उनके नेताओं को पद देकर उन्हें लुभाने और उनका समर्थन हासिल करने की कोशिश की है.
उत्तर प्रदेश में गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव एससी को लामबंद करने की इसकी रणनीति जाति के प्रति इसके समग्र/ओवरऑल दृष्टिकोण में एक बड़े बदलाव का संकेत है. भले ही जाति के संबंध में बीजेपी द्वारा अमल में लाई गयी भाषा और व्यवहार संरक्षक और उदार है, लेकिन यह परिवर्तनकारी नहीं है.
बीजेपी जाति व्यवस्था और इस व्यवस्था में मौजूद असमानता को कोई संरचनात्मक चुनौती नहीं देती है. यह केवल चुनाव जीतने के लिए जातिगत जोड़-तोड़ का उपयोग करती है.
आर्थिक समानता का क्या?
शायद, असमानता का सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाला रूप आर्थिक असमानता है. आसान भाषा में कहें तो बीजेपी आर्थिक समानता को गंभीरता से नहीं लेती है. पार्टी के नेता और सरकारों के प्रमुख शायद ही कभी आर्थिक समानता के मुद्दे को अपने नैरेटिव ने शामिल करते हैं. यह हमें मुख्य रूप से तीन कारणों से चिंतित करना चाहिए:
पहला, भारत में आर्थिक असमानताएं बढ़ रही हैं. ऑक्सफैम की एक नई रिपोर्ट हमें बताती है कि 5 प्रतिशत भारतीयों के पास देश की 60 प्रतिशत से अधिक संपत्ति है, जबकि नीचे की 50 प्रतिशत आबादी के हाथ में केवल 3 प्रतिशत धन है.
दूसरा, केंद्र और कई राज्यों में भी बीजेपी सत्ता में है. स्वाभाविक रूप से, यह आर्थिक समानता के मुद्दे को कितनी गंभीरता से लेती है, यह देश की समग्र आर्थिक प्रगति और समृद्धि के लिए बहुत अहम है.
तीसरा, यह ध्यान में रखना चाहिए कि भारत में आर्थिक असमानता कई स्तर पर है. यह जाति और लिंग की श्रेणियों में फैली है और एक जटिल तरीके से काम करती है.
आर्थिक असमानता से निपटने के लिए और 'समानता के युग' की शुरुआत करने के लिए एक सूक्ष्म दृष्टिकोण बिल्कुल अनिवार्य है. समानता के इसी युग को विचारक टोकेविले ने कहा था कि उसे टाला नहीं जा सकता.
(सर्वेश प्रताप सिंह सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली में पीएचडी के स्टूडेंट हैं. यह एक ओपिनियन पीस है और इसमें व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने हैं. द क्विंट का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है.)
