बाबा साहेब की जयंती पर एक सवाल पूछा गया- “मुख्यधारा के जन संवाद यानी पब्लिक डिसकोर्स में दलित विमर्श गायब क्यों है?” लेकिन इस सवाल के जवाब से पहले कुछ और बुनियादी सवाल हैं, जिनके जवाब तलाशने की जरूरत है. इस सिलसिले में पहला सवाल यह है कि यह मुख्यधारा किसकी है, और इसकी कमान किसके हाथ में है. हम लोग मुख्यधारा को किस तरह परिभाषित करते हैं? क्योंकि मुख्यधारा की कमान जिसके पास होगी, वही उसे परिभाषित भी करता रहेगा.
इस सवाल के जवाब में हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि पब्लिक डिसकोर्स को तैयार करने वाली जगहों पर सवर्ण काबिज हैं- बहुत बड़ी संख्या में. पब्लिक डिसकोर्स तैयार करने में मीडिया से लेकर एकैडमिया और पापुलर कल्चर बड़ी भूमिका निभाते हैं. मीडिया में अखबार से लेकर इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया, एकैडमिया में यूनिवर्सिटी, कॉलेज और पॉपुलर कल्चर में फिल्म और आर्ट शामिल है.
चूंकि इन सभी जगहों पर अपर कास्ट का ओवर रिप्रेजेंटेशन है, इसीलिए वे ही तय करते हैं कि जन विमर्श क्या होगा. किन मुद्दों पर बातचीत होगी. बातचीत की दिशा क्या होगी.

