भारतीय सिनेमा (Indian Cinema) को अक्सर सामाजिक शिक्षा के उद्देश्य से दूर ही रखा जाता है. फिल्म निर्माता सिनेमा को मनोरंजन को ऐसे रूप के तौर पर लेते हैं जहां दिमाग की जरूरत नहीं पड़ती, न कि सामाजिक जटिलताओं पर मूलभूत बदलाव लाने के लिए एक उद्देश्यपूर्ण जुड़ाव के तौर पर.
उनके लिए दर्शक हिंसा, पुरुष प्रधान और अति भावनात्मक ड्रामा के ही उपभोक्ता हैं न कि आलोचनात्मक समूह.

