जिन योगी आदित्यनाथ को विवादित छवि के कारण प्रधानमंत्री मोदी ने अपने केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह देने लायक नहीं समझा था, ढाई साल के बाद मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह उन्हें देश के सबसे बड़े सूबे की बागडोर सौंपने पर सहमत हो गए. सवाल ये है कि अब तक योगी के नाम पर ना-नुकुर करने वाले बीजेपी के एजेंडे में योगी सबसे ऊपर कैसे आ गए?
अब तक हर चुनावी नतीजों के बाद योगी की उग्र हिंदुत्व की छवि ही उनके सत्ता तक पहुचने के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा बन जाती थी और योगी सत्ता की दावेदारी से बाहर हो जाते थे. चाहे वो यूपी में कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह की सरकारें हों या वाजपेयी और मोदी का केन्द्रीय मंत्रिमंडल. बीजेपी के लिए योगी की अहमियत एक प्रचारक से ज्यादा कभी नहीं रही.
योगी चुनाव के समय ज्यादा टिकटों के लिए अपनी भुजाएं फड़काते. बीजेपी नेतृत्व उन्हें शांत कराता, पर नेतृत्व देने के नाम पर योगी अछूत बन जाते. सत्ता तो छोड़िए, प्रदेश और केन्द्रीय संगठन में भी कभी योगी को जगह नहीं दी गई. न महासचिव बने, न उपाध्यक्ष, न प्रदेश अध्यक्ष, सीधे बन गए देश के सबसे बड़े सूबे यूपी के मुख्यमंत्री.

