शुक्रवार दोपहर को हरियाणा विधानसभा एक अभूतपूर्व कार्यक्रम का गवाह बना. जो विधानसभा संविधान के नियमों के आधार पर चलती है और आम आदमी की जिंदगी से जुड़े मसलों पर चर्चा करती है, अचानक एक धार्मिक समारोह में बदल गई.
दिगम्बर जैन मुनि तरूण सागर महाराज ने सदन में ‘मन की शांति’ पर प्रवचन दिया.
जिस वक्त सोशल मीडिया पर इस बात की चर्चा हो रही है कि क्या बगैर कपड़े पहने एक व्यक्ति को विधान सभा में आने की अनुमति होनी चाहिए, ऐसे में और भी ज्यादा जरूरी सवाल हैं जो पूछे जाने चाहिए. किसी भी अन्य धार्मिक संत की तरह इनके लिए भी मेरे मन में पूरा सम्मान है. मुझे उनके कपड़े न पहनने को लेकर भी कोई ऐतराज नहीं है, क्योंकि यह उनकी धार्मिक भावनाओं को लेकर उनकी व्यक्तिगत पहचान है.
लेकिन, मुझे लगता है कि उन्हें प्रवचन के लिए सदन में नहीं बुलाया जाना चाहिए था.
इसमें प्रोटोकॉल का उल्लंघन नहीं हुआ था, क्योंकि प्रवचन दिन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद हुआ था. तकनीकी रूप से देखें तो संत ने चार दीवारी के बीच विधायकों की एक सभा को संबोधित किया. लेकिन व्यवहारिक तौर पर, जैसा कि हम सभी जानते हैं संत हरियाणा विधान सभा को संबोधित कर रहे थे.
ये हैं 10 कारण जिनके मुताबिक एक संत को प्रवचन के लिए राज्य की विधानसभा में नहीं बुलाया जाना चाहिए.
विचार करने के लिए 10 बिंदु
1. जनता की चुनी हुई विधान सभा में धार्मिक संत को प्रवचन के लिए निमंत्रण देना धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के खिलाफ है, जो संविधान की प्रस्तावना में भी दिया गया है. सभी को अपने धर्म का अनुपालन करने का पूरा अधिकार है, ऐसे में राज्य से किसी भी धर्म से भेद करने, उसे लोग उपलब्ध कराने और हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.
2. सिर्फ चुने हुए सदस्य, मंत्री और तय अधिकारियों को ही सदन में जाने की अनुमति होती है. बगैर चुने लोगों को सदन में आने और बोलने का अधिकार नहीं है. (कुछ अपवाद भी हैं, जैसे अटॉर्नी जनरल को सदन में बोलने का अधिकार है.)
3. अगर एक धर्म के संत को सदन में बोलने की अनुमति दी गई है, ऐसे में अन्य धर्मों के लोग भी अपने संत के विधान सभा में प्रवचन की मांग कर सकते हैं. क्या अन्य धर्मों के धार्मिक नेताओं को भी आमंत्रित किया जाएगा? यदि नहीं तो यह अन्य धर्मों के साथ भेदभाव होगा. यदि हां, तो यह कब तक चलेगा?
4. यदि अन्य धार्मिक संतों को भी बुलाया जाता है तो उसके क्या मानदंड होंगे? हजारों में किसी एक को चुनने की क्या प्रक्रिया होगी?
5. मीडिया रिपोर्ट कहती हैं कि संत चेयरमैन और गवर्नर से ऊपर बैठे थे. यदि यह सच है तो संवैधानिक पदों का हनन है.
6. बहुत से मामलों पर अपनी राय रखते हुए संत ने पाकिस्तान के मामले पर भी चुटकी ली. भारत-पाक संबंध इस समय बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहे हैं, ऐसे में जब एक संत सदन के अंदर इस मसले पर बोलता है तो यह और भी चिंता का विषय बन जाता है.
7. संत ने सदन में कहा था कि धर्म पति है तो राजनीति पत्नी है. पत्नी को पति की व्यवस्था को स्वीकार करना चाहिए. ऐसे में वह कहना चाहते हैं कि राजनेता धार्मिक नेताओं को सुनें. आज का भारत कतई भी इसे ऐसे उल्लेखित नहीं करेगा.
8. पत्नी को अपने पति की व्यवस्था को स्वीकार करना चाहिए’ एक विवादित कमेंट है. इस कमेंट से लिंग भेद को भी बढ़ावा मिलता है.
9. धार्मिक नेता राजनेता से ऊपर है. जिसका मतलब है कि हम वक्त में फिर से पीछे चले गए हैं, जैसा कि मध्यकालीन समय में होता था.
10. परेशान करने वाली बात यह है कि विपक्ष के नेता भी इस बात पर चुप हैं. हरियाणा कांग्रेस के नेता इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहते हैं.
इस बारे में संविधान क्या कहता है
सदन अपने विचारों को लेकर स्वतंत्र है. हम सदन की आजादी पर सवाल नहीं खड़ा कर सकते हैं. तकनीकी रूप से सदन की कार्यवाही पूरी हो चुकी थी, ऐसे में संवैधानिक प्रोटोकॉल का उल्लंघन का मामला नहीं है.डॉ. सुभाष कश्यप, संविधान विशेषज्ञ
भले ही सदन स्थगित हो गया था, जो कुछ भी हुआ वह गलत था और संविधान की भावना के खिलाफ था.डॉ. अशोक चौउसलकर, संविधान विशेषज्ञ
हरियाणा के बारे में पढ़ने के दौरान मुझे पता चला कि मध्यप्रदेश विधान सभा में ऐसे प्रवचन एक से ज्यादा बार हो चुके हैं. हरियाणा में हुआ संबोधन दूसरा था. अब तीसरा कौन सा होगा.
हाई स्पैरो याद हैं?
जो लोग फेमस सीरीज ‘गेम्स ऑफ थ्रोन्स’ देखते हैं वो काल्पनिक किरदार ‘हाई स्पैरो’ को जानते होंगे. वह एक न्याय प्रिय धार्मिक नेता है, जिसे राज परिवार से सम्मान मिला है, लेकिन एक समय के बाद वह राजा से ज्यादा प्रभावी बन जाता है और राज्य के बहुत से मामलों को उलझाकर समस्या बना देता है.
