"अफसोस.. 30 साल में ये पहली बार है जब हम लोगों को रमजान में तरावीह की नमाज नहीं पढ़ने दी गई. हम लोग किसी और की जमीन या घर में नहीं बल्कि अपने निजी घरों या जगहों पर नमाज पढ़ते रहे हैं. अदालत ने भी नमाज पढ़ने पर कोई रोक नहीं लगाई है फिर भी हमें अपने घरों में सामूहिक नमाज पढ़ने नहीं दिया जा रहा."
उत्तर प्रदेश के बरेली के मोहम्मदगंज गांव के रहने वाले सैफ (बदला हुआ नाम) कहते हैं कि रमजान का महीना शुरू हो चुका है, लेकिन हम इबादत नहीं कर सकते हैं, क्योंकि गांव के लोगों और प्रशासन को हमारे अपने घरों में हमारी इबादत से दिक्कत है.
बता दें कि ये विवाद पहली बार 16 जनवरी को खबरों में आया था जब मोहम्मदगंज गांव के कुछ मुसलमान जुमे की नमाज के लिए एक निजी खाली पड़े घर में नमाज के लिए जमा हुए थे. इसी दौरान गांव के कुछ लोगों ने पुलिस को अवैध मस्जिद और मदरसे बनने की शिकायत की. पुलिस ने शिकायत के आधार पर करीब 12 लोगों को हिरासत में लिया और फिर मजिसट्रेट के सामने 151 में चालान हुआ.
(धारा 151 में चालान का मतलब होता है कि पुलिस किसी व्यक्ति को संभावित झगड़ा या शांति भंग होने की आशंका के आधार पर पहले ही पकड़कर मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर देती है. यानी अभी कोई बड़ा अपराध हुआ नहीं है, लेकिन पुलिस को लगता है कि आगे लड़ाई-झगड़ा हो सकता है, इसलिए एहतियात के तौर पर कार्रवाई की जाती है. इसे सजा नहीं बल्कि प्रिवेंटिव (रोकथाम वाली) कार्रवाई माना जाता है.)
नमाज पर रोक और चालान को लेकर मोहम्मदगंज गांव के रहने तारिक खान ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी. हाइकोर्ट ने इस मामले पर बरेली के डीएम रविंद्र कुमार और एसएसपी अनुराग आर्य के खिलाफ अवमानना का नोटिस जारी किया है.
तारिक खान का कहना है कि रमजान को देखते हुए उन्होंने नमाज की इजाजत के लिए प्रशासन से इजाजत मांगी थी, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला और गांव में पुलिस ने सामूहिक नमाज पर रोक लगा रखी थी. तारिक खान कहते हैं, जब हमें प्रशासन से कोई जवाब या इजाजत नहीं मिली तो हमने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा?
याचिकाकर्ता तारिक खान की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की डिवीजन बेंच ने कहा कि हाल ही के एक फैसले में कोर्ट पहले ही साफ कर चुका है कि निजी जगह (घर या निजी परिसर) में धार्मिक प्रार्थना के लिए पहले से प्रशासन से इजाजत लेना जरूरी नहीं है. यह फैसला मरानाथ फुल गास्पेल मिनिस्ट्रीज और इम्मानुएल ग्रेस चैरिटेबल ट्रस्ट की याचिकाओं पर दिया गया था.
कोर्ट ने बताय कि संविधान के आर्टिकल 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता में निजी संपत्ति पर प्रार्थना करना शामिल है, बस यह प्रार्थना सार्वजनिक सड़क या सरकारी जगह तक नहीं फैलनी चाहिए.
बेंच ने कहा कि यही नियम इस मामले में भी लागू होता है. इसलिए डीएम और एसएसपी की कार्रवाई पहली नजर में कोर्ट के पहले के आदेश की अवमानना लगती है. 12 फरवरी 2026 को कोर्ट ने अवमानना की कार्यवाही शुरू करते हुए याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी तरह की जबरदस्ती या प्रताड़ना पर रोक लगा दी. साथ ही दोनों अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है. इस मामले की अगली सुनवाई 11 मार्च को होगी.
30 साल पुराना विवाद?
क्विंट से बात करते हुए तारिक खान कहते हैं, "हम लोग 30 साल से बिना किसी दिक्कत के अपने निजी जगहों पर नमाज पढ़ते रहे हैं, लेकिन अब अचानक गांव के लोग विरोध करने लगे."
तारिक कहते हैं कि 1995 में भी इसी तरह का मामला आया था, तब ग्राम सभा की जमीन पर नमाज को लेकर कोई विवाद हुआ था, जिसकी जानकारी भी ठीक से हमें नहीं है. तब से हम लोग सरकारी या किसी और की जमान नहीं बल्कि निजी जगहों पर नमाज पढ़ते रहे हैं.
गांव के रहने वाले कमल किशोर कहते हैं, "1995 में भी मुसलमान लोग सरकारी जमीन पर रमजान में नमाज पढ़ने लगे थे, गांव में आजान, नमाज कुछ नहीं होता था, लेकिन ये लोग कब्जा करना चाहते थे. तब हमारे समाज के लोगों ने जिला प्रशासन और पुलिस को शिकायत की थी. जिसके बाद से ग्राम सभा की जमीन पर नमाज रोक दी गई."
क्विंट को 1995 में थाने में की गई शिकायत की कॉपी मिली है. जिसमें जिलाधिकारी से यह मांग की गई है कि तुरंत कार्रवाई करके ग्राम सभा की सार्वजनिक भूमि पर अवैध रूप से नमाज पढ़ने, अजान देने और मस्जिद निर्माण करने पर रोक लगाई जाए ताकि गांव में शांति कायम रह सके."
इफ्को प्लांट में काम करने वाले कमल किशोर कहते हैं,
"अवैध रूप से मदरसा बनाया है इन लोगों ने गांव में. और ये लोग छिप-छिपकर इकट्ठे होकर सामूहिक नमाज पढ़ते हैं. इसी को लेकर विरोध चल रहा है गांव में. आगे चलकर मदरसा को संचालित करेंगे. दो बार इन्हें पकड़ा गया. एक बार कार्रवाई की पुलिस ने दोबारा कार्रवाई नहीं की. जब लोगों ने विरोध किया तब पुलिस ने आकर मामला शांत कराया. अब ये लोग हाई कोर्ट चले गए हैं. 11 मार्च की तारीख है, तब तक कोई कार्रवाई नहीं होगी इन लोगों पर पुलिस ने कहा है."
क्विंट ने मदरसा बनाने को लेकर तारिक खान से सवाल पूछा तो उन्होंने इससे इनकार किया.
तारिक खान का कहना है कि अभी जो विवाद शुरू हुआ है उसकी शुरूआत 20 दिसंबर 2025 से हई है. तारिक कहते हैं, "हम अपने गाय-भैंस के लिए मकान बना रहे थे, तब हिंदू पक्ष ने विरोध किया और कहा कि हम मदरसा बना रहे हैं. 20 दिसंबर को हम लिंटर ढलाई करवा रहे थे. इसमें मजदूर और मिस्त्री सब हिंदू ही थे. लेकिन इसी दिन विशारतगंज थाने में हिंदू पक्ष के कुछ लोगों ने शिकायत कर दी कि हम लोग मस्जिद बना रहे हैं. थाने के एसएचओ ने मुझे थाने बुलाया. मैं अकेला था और थाने पर हिंदू पक्ष के करीब 20 लोग थे. वहां जाकर मैंने बता दिया कि हम मकान बना रहे हैं. एसएचओ ने हिंदू पक्ष के लोगों से पूछा कि उन्हें कैसे पता कि मस्जिद बन रहा है, जिसके जवाब में लोगों ने कहा कि जिस टांगे से ईंट आई थी, उसने कहा था मस्जिद बन रही है. हमने साफ कहा कि आप जांच कर लें और पूछताछ कर लें. लेकिन कोई भी टांगे वाले को नहीं जानता था. उस दिन थाने पर दोनों पक्ष को लेकर एक चालान कर दिया गया ताकि किसी भी तरह की कोई घटना न हो. फिर हम घर आ गए और फिर लिंटर की ढ़लाई हो गई."
तारिक खान कहते हैं कि फिर 24 दिसंबर को हिंदू समाज के लोगों ने धरना दिया, जिसके बाद दरोगा ने बुलाया और फिर 151 में न्यायिक मजिसट्रेट आंवला के यहां शांति भंग न हो इसके लिए चालान हुआ.
तारिक खान कहते हैं,
"16 जनवरी को जब गांव के कुछ हिंदू पक्ष ने पुलिस को बुलाया था तब हम लोग एक खाली पड़े घर में मकान मालिक की इजाजत से नमाज पढ़ रहे थे. हमारे गांव में मस्जिद नहीं है तो हम लोग इसी तरह जुमे की नमाज किसी किसी के घर या खाली जगहों पर पढ़ते रहे हैं. कभी प्रशासन से इजाजत की बात नहीं उठी थी, लेकिन इस बार प्रशासन ने भी कहा कि बिना इजाजत सामूहिक नमाज नहीं पढ़ना है."
वहीं गांव के रहने वाले अशफाक बताते हैं कि 16 जनवरी को जुमे की नमाज पढ़ने की वजह से उनका भी चालान हआ था. अशफाक कहते हैं, "तरावीह की नमाज के लिए रात में लोग दूसरे गांव में लोग कैसे जाएं, बूढ़े और बच्चों की तरावीह की नमाज छूट रही है."
"गांव में मस्जिद नहीं है, इसलिए हम लोग जुमा की नमाज सालों से अलग-अलग लोगों के घरों में मकान मालिक से इजाजत लेकर पढ़ते रहे हैं. हम नमाज पढ़ रहे थे कोई जुर्म नहीं कर रहे थे, फिर भी हम लोगों को पुलिस थाने ले गई थी और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया.अशफाक, निवासी
तारिक खान की याचिका दायर करने वाले वकील राजेश कुमार गौतम कहते हैं, "रमजान शुरू हो रहा है तो गांव के लोगों ने एसपी और डीएम को आवेदन दिया कि हमें नमाज की इजाजत दें, लेकिन दोनों ने इसका जवाब नहीं दिया. डीएम और एसपी को रेजिस्ट्री के माध्यम से भी आवेदन दिया गया, लेकिन उन्होंने इसका भी जवाब नहीं दिया. जिसके बाद हम हाईकोर्ट गए. "हाईकोर्ट ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि निजी संपत्ति पर धार्मिक कार्य का अधिकार संविधान का आर्टिकल 25 देता है तो आप कैसे किसी को रोक सकते हैं."
इलाहाबाद हाई कोर्ट के वकील गौतम कहते हैं,
कोई अपने घर में अखंड रामायण का पाठ कराएगा तो क्या कोई पुलिस वाला उनसे परमीशन दिखाने को बोलेगा? इसी तरह का एक मामला एक ईसाई समुदाय के लोगों के साथ आया था जिसपर अदालत ने यूपी सरकार से पूछा था कि क्या आपके कानून में इस तरह का कोई रोक है, तो सरकार ने जवाब दिया था कि नहीं, रोक नहीं है. इसी पर अदालत ने फैसला दिया था कि निजी संपत्ति पर प्रेयर के लिए किसी इजाजत की जरूरत नहीं है.
पुलिस ने क्या कहा?
द क्विंट ने आंवला, बरेली में क्षेत्राधिकारी (सीओ) नितिन कुमार से बात की. क्विंट के पत्रकार ने पूछा कि रमजान है तो क्या अब नमाज होगी, जिसपर उन्होंने कहा, प्राशासन का कोई निर्देश नहीं है, माननीय हाईकोर्ट के निर्देश पर जो भी चीजें हैं वो की जाएगी.
क्विंट ने जब सीओ नितिन से कहा कि अदालत ने नमाज पढ़ने पर कोई रोक नहीं लगाई है, तो उन्होंने कहा कि जवाब देने के लिए हम बाध्य नहीं हैं, लेकिन आपको खबर चाहिए तो खबर ले लीजिए कि गांव में पूरी तरह शांति है, माननीय हाईकोर्ट के निर्देश के क्रम में सभी लोग प्यार मोहब्बत से रह रहे हैं, जो भी चीज होगी हाईकोर्ट के निर्देश के अनुपालन में होंगी."
इसके बाद द क्विंट ने बरेली के एसपी अनुराग आर्या से भी संपर्क करने की कोशिश की. 18 फरवरी को एसपी का फोन उनके पीए ने उठाया था और थोड़ी देर में बात हो जाएगी ऐसा कहा था, लेकिन कई बार कॉल करने पर भी बात नहीं हो सकी. हालांकि 20 फरवरी को जब दोबारा एसपी अनुराग आर्या को कॉल किया गया तो पता चला कि वो छुट्टी पर हैं, और उन्होंने कहा कि इस मामले में वो पुलिस अधीक्षक (एसपी) दक्षिणी अंशिका वर्मा से बात कीजिए. अंशिका वर्मा से द क्विंट से जब संपर्क किया तो उनके पीए ने फोन पर कहा कि मैडम अभी बहुत व्यस्त हैं, फ्री होने पर बात होगी. अंशिका वर्मा से संपर्क होने पर उनका पक्ष जानने के बाद खबर को अपडेट किया जाएगा.
बता दें कि इससे पहले इस मामले पर हिंदू पक्ष की शिकायत के आधार पर पुलिस ने कहा था कि सार्वजनिक या निजी स्थान पर सामूहिक धार्मिक गतिविधियों के लिए आवश्यक अनुमति नहीं ली गई थी.
बरेली के पुलिस अधीक्षक (साउथ) अंशिका वर्मा ने तब मामले की जानकारी देते हुए कहा कि एक खाली मकान को अस्थायी मदरसे के रूप में इस्तेमाल कर वहां कई हफ्तों से जुमे की सामूहिक नमाज अदा की जा रही थी.
हालांकि गांव के लोगों का कहना है कि वहां कोई अस्थायी मदरसा नहीं है, न ही उस घर में हफ्तों से नमाज पढ़ी जा रही थी. और नमाज जब भी जहां पढ़ी गई है वो मकान मालिक से पूछकर शांति के साथ नमाज होती रही है.
हिंदू परिवारों ने लगाया 'मकान बिकाऊ है' का बोर्ड
मोहम्मदगंज गांव में सामूहिक नमाज पढ़े जाने को लेकर बढ़े विवाद के बीच ही गांव के कुछ हिंदू परिवारों ने पलायन की चेतावनी दी थी और अपने अपने घर के बाहर मकान बिकाऊ है लिख दिया. गांव के रहने वाले कमल से जब क्विंट ने बात की तो उन्होंने कहा कि हां 4-5 घर वालों ने मकान बिकाऊ है लिखा था, लेकिन प्रशासन के आश्वासन के बाद उसे मिटा दिया गया है.
कमल का कहना है, "एसडीएम और सीओ आए थे, उन्होंने आश्वासन दिया और कहा कि कुछ मत करो, 11 मार्च को सुनवाई है, कोर्ट जो फैसला देता है फिर हम कार्रवाई करेंगे. अब अदालत नमाज पढ़ने की इजाजत देगा तो पढ़ी जाएगी, कोर्ट नहीं देगा तो नहीं पढ़ी जाएगी."
कमल ने आगे कहा कि गांव में मस्जिद-मंदिर नहीं है, लेकिन एक देवी स्थान है हिंदुओं का, हम लोग वहीं पूजा पाठ करते हैं.
जब क्विंट ने पूछा कि अपनी निजी जगह पर कोई सामूहिक नमाज पढ़ रहा तो क्या दिक्कत है, इसपर कमल ने कहा, "अपने घर में अकेले पढ़ सकते हो, मदरसा का निर्माण नहीं कर सकते. हमें दिक्कत ये है कि इन लोगों ने मदरसा तैयार कर लिया है. आगे चलकर मस्जिद बना लेंगे."
इसी सवाल को लेकर हमने गांव के रहने वाले सादिक (बदला हुआ नाम) से बात की. सादिक 16 जनवरी को गांव में जुमा की नमाज पढ़ने वालों में शामिल थे और इन्हें भी पुलिस ने हिरासत में लिया था. सादिक कहते हैं, "न कोई मस्जिद बनी है न मदरसा, बस किसी के प्राइवेट जगह पर हम लोग नमाज पढते रहे हैं, लेकिन अब रमजान का पहला जुमा भी गुजर गया और आज भी हम लोगों को नमाज नहीं पढ़ने दी गई."