नागपुर के यशोधरा नगर की एक संकरी और धूल भरी गली में आज भी दो मंजिला मकान का मलबा बिखरा पड़ा है. नागपुर नगर निगम (NMC) ने साल भर पहले इस घर को ढहा दिया था, जो आज भी उस वाकये की कड़वी याद दिलाता है.
यह घर फहीम शमीम खान के माता-पिता का था. फहीम पर पिछले साल 17 मार्च को शिवाजी जयंती के दौरान नागपुर में हुई सांप्रदायिक हिंसा का मुख्य आरोपी होने का आरोप है.
उस वक्त फहीम 'माइनॉरिटीज डेमोक्रेटिक पार्टी' (MDP) के नेता थे. दंगों को भड़काने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया और उन पर कड़ा कानून UAPA लगाया गया. उनकी गिरफ्तारी के ठीक एक हफ्ते बाद, रविवार की एक सुबह नगर निगम का नोटिस उनके बुजुर्ग माता-पिता के हाथ में थमा दिया गया, जो उस घर में परिवार के बाकी सदस्यों के साथ रहते थे.
नोटिस में कहा गया था कि घर का करीब 90 मीटर हिस्सा सड़क पर अतिक्रमण है. परिवार को लगा कि शायद सिर्फ उतना ही हिस्सा ढाया जाएगा जितना सड़क पर आ रहा है. लेकिन अगले ही दिन जो हुआ, उसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी. अगली सुबह बुजुर्ग दंपत्ति सड़क पर आ गए. अपनी जिंदगी के 30 साल लगाकर, पाई-पाई जोड़कर उन्होंने जो आशियाना बनाया था, उसे पूरी तरह मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया गया.
जब बुलडोजर पहुंचा, तो फहीम की पत्नी अलीशा खान उसी इलाके के दूसरे घर में थीं. वह बेबस होकर अपना घर टूटता देखती रहीं.
उस दिन को याद करते हुए अलीशा ने 'द क्विंट' को बताया,
"हमने उनसे बुलडोजर कार्रवाई नहीं करने के लिए मिन्नतें की. आस-पड़ोस के लोगों ने भी बहुत गुजारिश की. हमने उन्हें रोकने की पूरी कोशिश की, लेकिन वे कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे. हम बहुत लाचार महसूस कर रहे थे. मेरे सास-ससुर का बनाया हुआ घर जमींदोज कर दिया गया. मेरी सास तो बेहोश हो गई थीं. उस दिन हमने जो झेला, उसे मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती.
एक साल बाद, ऊपर-ऊपर से देखने पर परिवार के हालात कुछ सुधरे हुए लग सकते हैं. फहीम को पिछले साल जुलाई में जमानत मिल गई थी. वहीं अलीशा अब उसी नगर निगम में पार्षद चुन ली गई हैं, जिसने उनके ससुराल का घर ढहाया था.
अदालती मोर्चे पर भी परिवार को एक बड़ी राहत मिली है. फहीम की मां ने अपने घर को ढहाए जाने के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. इस मामले में कोर्ट ने नगर निगम के अधिकारियों और राज्य प्रशासन को कई बार कड़ी फटकार लगाई है.
लेकिन अलीशा के लिए ये सारी बातें बस कुछ पल का सुकून देने वाली हैं. उनका दुख कहीं ज्यादा गहरा है. उनके लिए सदमा सिर्फ पति पर लगे आरोपों का नहीं है, बल्कि उससे भी ज्यादा उस घर को खो देने का है जिसे उन्होंने अपनी आंखों के सामने उजड़ते देखा.
दंगे और फिर बुलडोजर की कार्रवाई
पूरा विवाद पिछले साल 17 मार्च की सुबह करीब 11:30 बजे शुरू हुआ. बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद (VHP) के कार्यकर्ताओं ने एक राज्यव्यापी अभियान के तहत विरोध प्रदर्शन किया. वे छत्रपति संभाजी नगर में मुगल बादशाह औरंगजेब के मकबरे को हटाने की मांग कर रहे थे. यह प्रदर्शन बॉलीवुड फिल्म 'छावा' के रिलीज होने के बाद शुरू हुआ था.
हिंदूवादी संगठनों के इन प्रदर्शनों के तुरंत बाद, दोपहर 3:09 बजे पुलिस ने 'गैर-कानूनी ढंग से इकट्ठा होने' की धाराओं के तहत FIR दर्ज की. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने द क्विंट को बताया कि उसी शाम बाद में FIR में अतिरिक्त धाराएं जोड़ी गईं. यह कार्रवाई तब की गई, जब गणेशपेठ पुलिस स्टेशन में फहीम और उसके समर्थकों ने पुलिस का ध्यान चादर की ‘संभावित प्रकृति’ की ओर दिलाया.
पुलिस का कहना है कि उन्होंने दंगों के मुख्य आरोपी फहीम से तनाव न बढ़ाने के लिए कहा था. लेकिन तब तक, नागपुर में VHP के प्रदर्शन के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके थे, जिससे जमीनी हालात और ज्यादा तनावपूर्ण हो गए थे.
शाम करीब 7:00 बजे का वक्त था. महल इलाके में लोग शिवाजी जयंती मनाने की तैयारी कर रहे थे, तभी मुस्लिम युवाओं का एक गुट शिवाजी की मूर्ति के पास इकट्ठा हुआ और नारेबाजी करने लगा. पुलिस के साथ शुरू हुई मामूली बहस देखते ही देखते हिंसा में बदल गई. यह आग तेजी से 2 किलोमीटर के दायरे में फैल गई. चितनिस पार्क, गंजीपेठ, गीतांजलि चौक, भालदारपुरा और हंसापुरी जैसे घने इलाके इसकी चपेट में आ गए. इन इलाकों में हिंदू और मुस्लिम आबादी बरसों से साथ रहती आई है.
इस हिंसा के बाद नागपुर पुलिस ने 13 से ज्यादा FIR दर्ज की और जांच के लिए कई टीमें गठित की गई. ये टीमें न सिर्फ सड़क पर हुई हिंसा की जांच कर रही थीं, बल्कि सोशल मीडिया पर चल रही गतिविधियों पर भी नजर रख रही थी.
पुलिस की पहली FIR में फहीम की कथित भूमिका का जिक्र किया गया और उसके साथ 51 अन्य लोगों को भी नामजद किया गया.
जहां 19 मार्च को फहीम की गिरफ्तारी हुई, वहीं इसके कुछ ही दिनों बाद 24 मार्च को उसके परिवार के घर पर बुलडोजर चला दिया गया.
कोर्ट में कैसे कमजोर पड़ा नगर निगम का मामला
इस मामले में फहीम के परिवार का पक्ष रख रहे वकील अश्विन इंगोले ने द क्विंट को बताया कि अब तक इस केस में चार सुनवाई हो चुकी है. पहली सुनवाई पिछले साल 24 मार्च को हुई थी. ठीक उसी दिन, जब फहीम के घर पर बुलडोजर चलाया गया.
हुआ यह था कि नगर निगम का नोटिस मिलते ही फहीम की मां ने कार्रवाई पर रोक लगाने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.
लेकिन अदालत कोई आदेश दे पाती, उससे पहले ही नगर निगम ने फुर्ती दिखाते हुए घर को जमींदोज कर दिया.
उस दिन सिर्फ फहीम का घर ही नहीं टूटा, बल्कि पड़ोस में रहने वाले अब्दुल हफीज शेख लाल के घर का भी एक हिस्सा ढहा दिया गया.
पहली सुनवाई: 24 मार्च 2025- कोर्ट की सुनवाई से पहले ही गिर गया घर
हाई कोर्ट ने इस मामले में म्युनिसिपल कमिश्नर, जिला कलेक्टर और राज्य के मुख्य सचिव को नोटिस जारी किया. कोर्ट ने कड़ा सवाल पूछा कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही घरों को ढहाने के खिलाफ आदेश दे चुका है, तो उसका पालन क्यों नहीं किया गया? प्रशासन को निर्देश दिया गया कि वे इस पर अदालत में अपना जवाब पेश करें.
दूसरी सुनवाई: 15 अप्रैल 2025- अधिकारियों ने कहा कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की 'जानकारी नहीं' थी
सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2024 की अपनी गाइडलाइन्स में साफ कर दिया था कि सिर्फ इसलिए किसी का घर नहीं गिराया जा सकता कि वह किसी अपराध का आरोपी है. बुलडोजर कार्रवाई को 'इंस्टेंट पनिशमेंट' के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और इसमें कानूनी प्रक्रिया का पालन होना जरूरी है.
गाइडलाइंस के मुताबिक:
कार्रवाई से कम से कम 15 दिन पहले स्पष्ट नोटिस देना होगा.
प्रभावित व्यक्ति को अपनी बात रखने का पूरा मौका मिलना चाहिए.
प्रशासन को लिखित में ठोस कारण बताना होगा कि घर गिराना क्यों जरूरी है.
नोटिस के बाद भी व्यक्ति को अपील करने या खुद अतिक्रमण हटाने का वक्त मिलना चाहिए.
कोर्ट ने यह भी कहा था कि केवल 'अवैध' हिस्सा ही गिराया जाए और पूरी कार्रवाई की वीडियोग्राफी हो.
सुनवाई के दौरान म्युनिसिपल कमिश्नर ने हलफनामा देकर कहा कि जिन अधिकारियों ने घर गिराया, उन्हें सुप्रीम कोर्ट की इन गाइडलाइन्स की 'जानकारी नहीं थी'. तत्कालीन म्युनिसिपल कमिश्नर अभिजीत चौधरी ने अपने हलफनामे में कोर्ट से बिना शर्त माफी भी मांगी. उन्होंने कहा,
"टाउन प्लानिंग विभाग और नगर निगम को सुप्रीम कोर्ट की नई गाइडलाइंस की जानकारी नहीं थी. मुख्य सचिव की ओर से इन नए नियमों को लेकर नगर निगम को कोई सर्कुलर भी जारी नहीं किया गया था. यह कार्रवाई 'स्लम एक्ट 1971' के तहत की गई थी और नगर निगम के अधिकारियों की कोई गलत मंशा नहीं थी. हम अब से सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पूरी तरह पालन करेंगे."
अभिजीत चौधरी ने कोर्ट को यह भी बताया कि नागपुर पुलिस कमिश्नर ने हिंसा के आरोपियों की संपत्तियों के बारे में जानकारी मांगी थी. उसी अनुरोध के आधार पर नगर निगम ने यह बुलडोजर कार्रवाई की. इसके बाद कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को दो हफ्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया.
तीसरी सुनवाई: मई 2025
मई 2025 में महाराष्ट्र की तत्कालीन मुख्य सचिव सुजाता सौनिक ने कोर्ट में हलफनामा पेश किया. उन्होंने स्वीकार किया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार 'जीआर' (सरकारी संकल्प) जारी करने में विफल रही थी, जिसकी वजह से नगर निगम के अधिकारियों को नई गाइडलाइंस का पता नहीं चला. उन्होंने कहा कि अब यह जीआर जारी कर दिया गया है. हालांकि, कोर्ट ने सुजाता सौनिक के इस हलफनामे को खारिज कर दिया.
चौथी सुनवाई: फरवरी 2026
फरवरी 2026 में हुई सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया. कोर्ट ने नगर निगम को निर्देश दिया कि या तो वह परिवार का घर दोबारा बनाकर दे या फिर उन्हें उचित मुआवजा दे. अदालत ने निगम से पूछा कि वे इन दोनों में से क्या चुनेंगे, इस पर अपना जवाब दाखिल करें.
इस मामले में अगली सुनवाई 4 मार्च को होनी थी, लेकिन वह नहीं हो सकी. इसके बाद 13 मार्च की तारीख तय थी, पर उस दिन भी मामला सुनवाई के लिए लिस्ट नहीं हुआ. अब देखना यह है कि हाई कोर्ट के इस कड़े निर्देश पर नगर निगम का क्या जवाब आता है.
"पूरा परिवार बिखर गया"
फहीम के जेल जाने और पूरे परिवार के बेघर हो जाने के बाद, उसकी पत्नी अलीशा ने हालात संभालने की जिम्मेदारी खुद उठाई.
उस दिन को याद करते हुए अलीशा कहती हैं, "पिछले साल रमजान के 23वें रोजे को हमारा घर ढहाया गया था. आज (शुक्रवार, 13 मार्च) भी 23वां रोजा ही है. एक साल बीत गया, लेकिन उस दिन की एक-एक बात आज भी आंखों के सामने आ जाती है. इस एक साल में हमारा पूरा परिवार बिखर गया. मेरे बुजुर्ग सास-ससुर अब अपनी बेटी के साथ रहते हैं. जेठ और उनका परिवार एक मस्जिद में रह रहा है. और हम? हम इस चिलचिलाती गर्मी में टिन शेड के नीचे रहने को मजबूर हैं. मेरे छोटे बच्चे तो जैसे अपनी खुशी ही भूल गए हैं."
हालांकि, दंगों के मामले में पति पर लगे आपराधिक आरोपों का साया आज भी परिवार का पीछा नहीं छोड़ रहा है. हिंसा के आरोपों में फहीम ने चार महीने जेल में काटे. सेशन कोर्ट ने इस आधार पर उन्हें जमानत दे दी कि चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और अब जांच के लिए उन्हें हिरासत में रखने की जरूरत नहीं है.
द क्विंट से बात करते हुए फहीम ने खुद को बेगुनाह बताया. फहीम कहते हैं,
"मुझ पर लगाए गए आरोप झूठे हैं और मीडिया ने उन्हें बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया. मुझे सबूतों के आधार पर ही जमानत मिली है."
'द क्विंट' से बात करते हुए फहीम आगे कहते हैं, "मेरा परिवार अलग-थलग हो गया है. प्रशासन ने घर तोड़ने के लिए माफी तो मांग ली, लेकिन इससे मेरा परिवार फिर से एक नहीं हो जाएगा. घर गिराने के मामले में कोर्ट का आखिरी फैसला आना अभी बाकी है. क्या वे हमें मुआवजा देंगे? क्या वे हमारा घर फिर से बनाएंगे? हमें नहीं पता कि इसमें अभी और कितना वक्त लगेगा."
फहीम का यह भी आरोप है कि उनके पूरे घर को जमींदोज करने का आदेश "ऊपर" से आया था.
फहीम ने बताया, "वह घर मेरी मां के नाम पर था. सब कुछ कायदे से था, हमारे पास सारे कागजात थे. बस कुछ टैक्स बकाया था, इसके अलावा और कुछ नहीं. मेरी मां के घर को गिराने के लिए किन कानूनों का हवाला दिया गया और यह किसके आदेश पर हुआ, यह वही (प्रशासन) बेहतर जानते हैं."
"घर गिराने का नोटिस सिर्फ एक दिन पहले, रविवार को दिया गया था. अगले दिन सुबह 10 बजे से पहले ही पुलिस वहां पहुंच गई. सभी पड़ोसियों को धमकाया गया कि वे अपने घरों से बाहर न निकलें. उन्होंने एक तरह का 'लॉकडाउन' लगा दिया था. सुबह 10:30 बजे तक पूरा घर मलबे में तब्दील कर दिया गया. नोटिस में लिखा था कि 90 मीटर हिस्सा सड़क पर है और अवैध है. लेकिन हमें नहीं पता कि पूरी बिल्डिंग गिराने का हुक्म किसने दिया. हमने अपना सारा सामान खो दिया क्योंकि हमें लगा था कि सिर्फ उतना ही हिस्सा टूटेगा जितना नोटिस में बताया गया है. इसीलिए हमने पूरा घर खाली नहीं किया था. लेकिन आखिर में उन्होंने कुछ भी नहीं छोड़ा," वह आगे कहते हैं.
राजनीति बना सहारा
पिछले एक साल में इस परिवार ने कई उतार-चढ़ाव देखे. अलीशा बताती हैं कि दंगों के आरोपों के बाद कोई उन्हें किराये पर मकान देने को भी तैयार नहीं था. लेकिन चुनाव ने समाज में उनकी खोई हुई साख वापस दिलाने में मदद की.
हाल ही में हुए नागपुर नगर निगम चुनाव में अलीशा अपने इलाके से पार्षद चुनी गईं. उन्होंने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के टिकट पर चुनाव लड़ा था. अलीशा अपनी इस जीत का श्रेय उस 'अन्याय' को देती हैं, जो उनके घर पर बुलडोजर चलाकर किया गया था. दरअसल, घर टूटने के उस वाकये ने ही उन्हें राजनीति में आने के लिए मजबूर किया.
वह कहती हैं, "इलाके के लोगों ने भी हमारा साथ दिया ताकि हम यह चुनाव लड़ सकें. हम चाहते थे कि जैसा अन्याय हमारे साथ हुआ बिना किसी जांच के हमारे घर पर बुलडोजर चला दिया गया. वैसा किसी और के साथ न हो. हमने इसी मुद्दे पर चुनाव लड़ा और जीता, ताकि भविष्य में कोई और बेघर न हो."
दिलचस्प बात यह है कि अलीशा अब उसी नगर निगम में पार्षद हैं जिसने उनका घर ढहाया था. वह कहती हैं कि अब वह इस लड़ाई को सदन के भीतर ले जाएंगी. वह नगर निगम की बैठक में 'बुलडोजर न्याय' के खिलाफ आवाज उठाने की योजना बना रही हैं.
अलीशा का कहना है,
"जिस तरह नगर निगम ने अवैध रूप से हमारा घर तोड़ा, उसे फिर से बनाया जाना चाहिए. या तो वे हमें मुआवजा दें या घर बनाकर दें. हमारे साथ जो हुआ वह गलत था और हम इंसाफ के हकदार हैं. हमने बहुत कुछ खोया है, लेकिन मैं यह सुनिश्चित करुंगी कि किसी और को दर-दर की ठोकरें न खानी पड़ें."
वहीं दूसरी ओर फहीम भले ही खुद को बेगुनाह बता रहे हों, लेकिन नागपुर पुलिस ने चार्जशीट में उन पर जो गंभीर आरोप लगाए हैं, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
फहीम कहते हैं, "जेल की सलाखों के पीछे मुझे उतनी तकलीफ नहीं हुई, जितनी मेरे परिवार को घर टूटने की वजह से झेलनी पड़ी है."
(ट्रांसलेशन: नौशाद मलूक)
